ज्ञान भारतम मिशन के सर्वे में मिली मुगलकालीन सोने की तलवार और 50 फरमान
समझें क्या है पूरा मामला
- शिवपुरी के करैरा में पुरानी पांडुलिपियों का सर्वे चल रहा था।
- सर्वे टीम को शाहजहां के दौर की सोने के हत्थे वाली तलवार मिली।
- तलवार पर फारसी भाषा में सोने से खास इबारत लिखी है।
- साथ ही मुगल काल के करीब पचास शाही फरमान भी मिले हैं।
- एक हस्तलिखित कुरान शरीफ भी इसी संग्रह में मिली है।
मध्य प्रदेश के शिवपुरी जिले से इतिहास से जुड़ी बड़ी खबर आई है। जिले के करैरा इलाके में एक सर्वे चल रहा था। यह सर्वे ज्ञान भारतम मिशन (Gyan Bharatam Mission) के तहत हो रहा था। मिशन का मकसद पुरानी पांडुलिपियों और दस्तावेजों को खोजना है।
इसी दौरान सर्वे टीम को एक अनमोल तलवार मिली। यह तलवार मुगल बादशाह शाहजहां के दौर की है। तलवार का हत्था शुद्ध सोने का बना है। इस पर फारसी भाषा में खास इबारत भी लिखी है। यह खोज इतिहासकारों के लिए भी हैरान करने वाली है।
यह तलवार करैरा किले के पुराने कमांडेंट के परिवार में मिली। कमांडेंट का नाम सैयद सालार था। तलवार अब उनकी नौवीं पीढ़ी के पास सुरक्षित है। परिवार के वकील इत्रत जैदी ने इसे संभाल कर रखा था। सालों तक यह तलवार परिवार के निजी संग्रह में रही। पुरातत्वविदों का मानना है कि यह बेहद दुर्लभ हथियार है। यह मुगलकालीन बचे हथियारों में सबसे खास मानी जा रही है।
तलवार पर फारसी में इबारत
सर्वे टीम का नेतृत्व वसीम खान ने किया। उनके मुताबिक तलवार की सबसे बड़ी खासियत उस पर लिखी इबारत है। यह इबारत फारसी भाषा में सोने से लिखी गई है। इसमें साफ दर्ज है कि यह तलवार किसने और किसे दी थी।
लिखावट के अनुसार शाहजहां ने खुद यह तलवार भेंट की थी। यह तलवार करैरा किले के कमांडर सैयद सालार को दी गई थी। यह भेंट एक शाही इनाम के तौर पर दी गई थी। उस दौर में ऐसे इनाम बड़ी उपलब्धि माने जाते थे। यह सम्मान सैन्य सेवा और वफादारी के बदले दिया जाता था। इस लिखावट ने तलवार की असली पहचान भी साबित कर दी है।
सोथबी की तलवार से मेल
इतिहासकारों ने इस तलवार की बनावट पर भी गौर किया है। उनके अनुसार यह डिजाइन एक पुरानी तलवार से काफी मिलता है। साल 2007 में एक तलवार सोथबी (Sotheby's) की नीलामी में बिकी थी। वह तलवार खुद शाहजहां के निजी इस्तेमाल की मानी जाती थी। उसे भारी कीमत देकर कतर के दोहा में खरीदा गया था। वहां वह म्यूजियम ऑफ इस्लामिक आर्ट में रखी गई है। करैरा में मिली तलवार की बनावट भी वैसी ही है। इससे इतिहासकारों को नई खोज पर भरोसा बढ़ गया है। शिलालेख से यह भी साबित होता है कि यह असली शाही तोहफा है। यह सिर्फ एक साधारण हथियार नहीं बल्कि ऐतिहासिक दस्तावेज जैसा है।
50 मुगलकालीन फरमान मिले
तलवार अकेली नहीं थी जो इस सर्वे में मिली। इसके साथ मुगल काल के करीब पचास शाही फरमान भी मिले हैं। इनमें शाहजहां के शासनकाल के मूल शाही आदेश शामिल हैं। कुछ फरमान दारा शिकोह के दौर के भी हैं। कुछ आदेश औरंगजेब के शासनकाल में जारी हुए थे। साथ ही कुरान शरीफ की एक हस्तलिखित प्रति भी मिली है। यह प्रति भी काफी पुरानी और दुर्लभ मानी जा रही है।
जानकारों का कहना है कि ये दस्तावेज बहुत खास गवाही देते हैं। इनसे पता चलता है कि मुगल दरबार कैसे काम करता था। इनसे यह भी साफ होता है कि प्रांतीय इलाकों में हुकूमत कैसे चलती थी। दिल्ली दरबार से दूर इलाकों तक प्रशासन कैसे पहुंचता था। यह बात भी इन फरमानों से समझ आती है।
परिवार ने नहीं बेची विरासत
इस पूरे संग्रह के साथ परिवार का पुराना नाता जुड़ा है। परिवार का कहना है कि कई बड़े खरीदार इसे खरीदना चाहते थे। कुछ खरीदारों ने भारी रकम का लालच भी दिया। लेकिन परिवार के बुजुर्गों ने इसे कभी नहीं बेचा। उनके लिए यह सिर्फ पैसा नहीं बल्कि पुरखों की निशानी थी। यही वजह है कि यह खजाना आज तक सुरक्षित बचा रहा। अब यह विरासत आम लोगों और शोधकर्ताओं के सामने आ गई है। यह मध्य प्रदेश के इतिहास के लिए भी बड़ी बात है।
अब होगा संरक्षण, डिजिटलाइजेशन
इन सभी ऐतिहासिक चीजों को अब सहेजा जाएगा। यह काम ज्ञान भारतम मिशन के तहत किया जाएगा। सबसे पहले तलवार और फरमान का संरक्षण होगा। इसके बाद इनका डिजिटलाइजेशन भी किया जाएगा। साथ ही इन पर विस्तृत एपिग्राफिक (epigraphic) अध्ययन भी होगा।
एपिग्राफिक अध्ययन का मतलब है पुरानी लिखावट का गहराई से अध्ययन। इससे इतिहासकारों को मुगल काल को समझने में मदद मिलेगी। शिवपुरी की यह खोज आने वाले समय में और जानकारी दे सकती है। फिलहाल यह पूरा संग्रह विशेषज्ञों की निगरानी में है।
जानकारों के अनुसार ऐसी खोजें आम तौर पर बहुत कम होती हैं। इसीलिए करैरा की यह खोज देशभर में चर्चा का विषय बनी हुई है। आने वाले दिनों में इस पर और शोध होने की उम्मीद है। इतिहास प्रेमियों के लिए यह खबर बेहद दिलचस्प मानी जा रही है। मध्य प्रदेश के इतिहास जगत के लिए भी यह गर्व की बात है।
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