साहब मैं जिंदा हूं, सरकारी रिकॉर्ड में मृत घोषित दिव्यांग की सिस्टम से जंग

Anjali Dwivedi | May 14, 2026, 17:21 IST
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मध्य प्रदेश के सीधी में सरकारी लापरवाही का बड़ा मामला आया है। दिव्यांग बाबूलाल को रिकॉर्ड में मृत बताकर उसकी पेंशन और राशन बंद कर दिया गया। एक साल से खुद को जिंदा साबित करने की कोशिश में बाबूलाल सरकारी दफ्तरों के चक्कर काट रहै है।

शॉर्ट में समझें क्या है पूरा मामला

  • सीधी जिले में बाबूलाल कोल नाम के दिव्यांग को सरकारी रिकॉर्ड में मृत घोषित कर दिया गया है।
  • पिछले एक साल से बाबूलाल खुद को जिंदा साबित करने के लिए सरकारी दफ्तर के चक्कर काट रहा है।
  • मृत घोषित होने की वजह से बाबूलाल का राशन, पेंशन और अन्य सरकारी सुविधाओं का लाभ बंद हो गया है।
  • कलेक्टर ने लापरवाही बरतने वाले जनपद सीईओ और रोजगार सहायक पर कड़ी कार्रवाई के आदेश दिए हैं।
  • बाबूलाल का परिवार अब भी अपनी रुकी हुई सुविधाओं को जल्द से जल्द शुरू करने की मांग कर रहा है।

मध्य प्रदेश के सीधी जिले के बाबूलाल कोल की कहानी फिल्मी पटकथा जैसी लगती है, लेकिन यह हकीकत का दर्द है। बाबूलाल एक दिव्यांग आदिवासी युवक है, जिसे प्रशासन ने सरकारी फाइलों में मृत घोषित कर दिया है। पिछले एक साल से यह युवक सरकारी दफ्तरों के चक्कर काट रहा है और बस यही कह रहा है- साहब, मैं जिंदा हूं।



पेंशन बंद, राशन बंद… दिव्यांग युवक को मरा बताकर रोक दी गई सरकारी मदद


जिंदा होकर भी सरकारी रिकॉर्ड में मृत दिव्यांग

सरकारी दस्तावेजों में बाबूलाल को जैसे ही मरा हुआ दिखाया गया, उसकी जिंदगी में मुश्किलों का पहाड़ टूट पड़ा। सबसे पहले उसकी दिव्यांग पेंशन बंद कर दी गई। इसके बाद उसे मिलने वाला राशन भी रोक दिया गया। सरकार की वे तमाम योजनाएं जो गरीबों का सहारा होती हैं, बाबूलाल के लिए वह सब कागजी मौत के साथ ही खत्म हो गईं।



बाबूलाल की हालत पहले ही दयनीय थी। वह एक टूटे-फूटे कच्चे मकान में रहता है, जहां मौसम की हर मार सीधे परिवार पर पड़ती है। घर की दीवारें गर्मी में तपती हैं और बरसात में छत से पानी टपकता है। मजदूरी का कोई पक्का साधन नहीं है और ऊपर से उसके बुजुर्ग माता-पिता को भी अभी तक वृद्धावस्था पेंशन का लाभ नहीं मिल पाया है। सरकारी राशन बंद होने से अब दो वक्त की रोटी जुटाना भी दूभर हो गया है।



बाबूलाल ने अधिकारियों से क्या कहा

बाबूलाल के पिता ने बताया कि उन्होंने कई बार बड़े अधिकारियों से शिकायत की, लेकिन सिर्फ खोखले आश्वासन ही मिले। जब थक-हारकर बाबूलाल कलेक्ट्रेट पहुंचा और उसे वे कागज दिखाए गए जिनमें उसे मृत बताया गया था, तो उसका सब्र जवाब दे गया। भरे दफ्तर में उसने गुस्से और मायूसी के साथ उन कागजों को फाड़ दिया। यह उसका व्यवस्था के खिलाफ एक मूक विद्रोह था।



मामला जब नए कलेक्टर विकास मिश्रा के संज्ञान में आया, तब जाकर प्रशासन की नींद टूटी। जांच में लापरवाही साबित होने पर कलेक्टर ने जनपद पंचायत सीईओ चंदू लाल पनिका की एक वेतन वृद्धि रोकने के आदेश दिए। साथ ही, ग्राम रोजगार सहायक के खिलाफ भी विभागीय कार्रवाई के निर्देश जारी किए गए हैं।



अब आगे क्या कार्रवाई होगी?

भले ही अधिकारियों पर कार्रवाई शुरू हो गई हो, लेकिन बाबूलाल का परिवार इससे खुश नहीं है। उनका कहना है कि सजा मिलने से उनका पेट नहीं भरेगा। उनकी मांग है कि बाबूलाल का नाम तुरंत रिकॉर्ड में जीवित दर्ज किया जाए और उसकी रुकी हुई पेंशन व राशन की सुविधा बहाल की जाए। आज भी बाबूलाल की एक ही पुकार है- साहब, मुझे मेरा हक वापस दिला दीजिए।



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