News in short
हाईकोर्ट ने प्राथमिक शिक्षक भर्ती की मेरिट लिस्ट रद्द की
13089 चयनित शिक्षकों को लगा बड़ा झटका
गैर-RCI अभ्यर्थियों को चयन प्रक्रिया से बाहर करने के निर्देश
फर्जी बोनस अंक लेने वालों पर कोर्ट की सख्त टिप्पणी
नई मेरिट सूची तैयार करने के आदेश जारी
Intro
जैसा कि द सूत्र ने पहले ही संकेत दिया था, वैसा ही फैसला अब जबलपुर हाईकोर्ट ने सुना दिया है। प्राथमिक शिक्षक चयन परीक्षा 2025 में 5% बोनस अंक विवाद पर जस्टिस विशाल धगत ने पूरी मेरिट लिस्ट दोबारा तैयार करने के निर्देश दिए हैं। कोर्ट ने गैर-RCI अभ्यर्थियों को चयन प्रक्रिया से बाहर करने का आदेश भी दिया है।
News in detail
द सूत्र की खबर पर लगी मुहर, हाईकोर्ट ने दिया बड़ा फैसला
प्राथमिक शिक्षक चयन परीक्षा 2025 में कथित फर्जी बोनस अंक विवाद पर आखिरकार जबलपुर हाईकोर्ट का बड़ा फैसला सामने आ गया है। जिस आशंका और कानूनी संभावना की जानकारी द सूत्र ने पहले ही अपने पाठकों को दे दी थी, अब कोर्ट के आदेश ने उस पर मुहर लगा दी है। जस्टिस विशाल धगत की बेंच ने विवादित मेरिट सूची को रद्द करते हुए नए सिरे से पूरी मेरिट लिस्ट तैयार करने के निर्देश मध्यप्रदेश शासन और मध्य प्रदेश कर्मचारी चयन मंडल को दिए हैं। इस फैसले ने 13,089 चयनित प्राथमिक शिक्षकों को बड़ा झटका दिया है, क्योंकि अब नई मेरिट लिस्ट बनने से पूरी चयन प्रक्रिया दोबारा प्रभावित होगी।
गैर-RCI अभ्यर्थियों को बाहर करने के आदेश
हाईकोर्ट ने अपने आदेश में स्पष्ट कहा है कि जिन अभ्यर्थियों के पास भारतीय पुनर्वास परिषद (RCI) से मान्यता प्राप्त विशेष शिक्षा डिप्लोमा नहीं है, उन्हें 5% बोनस अंक का लाभ नहीं दिया जा सकता। कोर्ट ने राज्य शासन और कर्मचारी चयन मंडल को निर्देश दिए हैं कि ऐसे सभी अपात्र अभ्यर्थियों की अभ्यर्थिता समाप्त कर उन्हें चयन प्रक्रिया से बाहर किया जाए। कोर्ट ने यह भी माना कि यदि गलत जानकारी देकर लाभ लेने वाले उम्मीदवारों को बाद में सुधार का मौका दिया जाता है, तो यह ईमानदार उम्मीदवारों के साथ अन्याय होगा।
कोर्ट की सख्त टिप्पणी: ‘बेईमानी को बढ़ावा नहीं दिया जा सकता’
अपने आदेश में हाईकोर्ट ने बेहद सख्त टिप्पणी करते हुए कहा कि यदि पकड़े जाने के बाद उम्मीदवारों को अपने अंक कम कराने या ‘नहीं’ का विकल्प चुनने की अनुमति दी जाती है, तो यह सीधे तौर पर बेईमानी को बढ़ावा देने जैसा होगा। अदालत ने माना कि भर्ती प्रक्रिया में पारदर्शिता और निष्पक्षता सबसे महत्वपूर्ण है और ऐसे मामलों में नरमी बरतना योग्य अभ्यर्थियों के अधिकारों का हनन होगा। कोर्ट की इस टिप्पणी को पूरे मामले में सबसे महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
15 हजार ने लिया था बोनस, लेकिन RCI में रजिस्ट्रेशन बेहद कम
इस पूरे मामले की शुरुआत तब हुई जब नरसिंहपुर निवासी सोनम अगरैया और अन्य अभ्यर्थियों ने हाईकोर्ट में याचिका दाखिल कर भर्ती प्रक्रिया पर सवाल उठाए। याचिका में बताया गया कि भर्ती नियमों के अनुसार केवल RCI से मान्यता प्राप्त विशेष शिक्षा डिप्लोमा धारकों को ही 5% बोनस अंक मिलना था। लेकिन चयन सूची में करीब 14,964 उम्मीदवारों ने खुद को इस श्रेणी में दिखाकर बोनस अंक हासिल कर लिए। जबकि RCI के आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार पूरे मध्य प्रदेश में केवल 2,194 कार्मिक और 3,077 पेशेवर ही पंजीकृत हैं। यही बड़ा अंतर पूरे विवाद का सबसे मजबूत आधार बना।
सिर्फ ‘हां’ टिक करते ही मिल गए थे बोनस अंक
याचिका में यह भी खुलासा किया गया था कि भर्ती प्रक्रिया के दौरान उम्मीदवारों से न तो RCI रजिस्ट्रेशन नंबर मांगा गया और न ही कोई प्रमाणपत्र सत्यापित किया गया। केवल ऑनलाइन आवेदन में ‘हाँ’ का विकल्प चुनने के आधार पर सॉफ्टवेयर के जरिए सीधे बोनस अंक दे दिए गए। इतना ही नहीं, लोक शिक्षण संचालनालय ने जनवरी 2026 में विभाग को पहले ही चेतावनी दी थी कि लगभग 18 हजार उम्मीदवारों द्वारा ‘हाँ’ चुना जाना संदिग्ध है। इसके बावजूद कोई ठोस जांच या सत्यापन नहीं किया गया, जिसका परिणाम पूरी मेरिट लिस्ट के विवादों में घिरने के रूप में सामने आया।
अधिवक्ताओं ने उठाए थे गंभीर सवाल
याचिकाकर्ताओं की ओर से अधिवक्ता आलोक वागरेचा और विशाल बघेल ने पक्ष रखा था। उन्होंने कोर्ट के सामने तर्क दिया था कि बिना किसी भौतिक सत्यापन के हजारों अभ्यर्थियों को बोनस अंक देना पूरी चयन प्रक्रिया की निष्पक्षता को प्रभावित करता है। उन्होंने दोषपूर्ण मेरिट सूची को रद्द कर केवल वैध RCI प्रमाणपत्र धारकों को लाभ देते हुए नई मेरिट सूची जारी करने की मांग की थी, जिसे अब हाईकोर्ट ने स्वीकार कर लिया है।
अब नए सिरे से शुरू होगी प्रक्रिया
हाईकोर्ट के इस फैसले के बाद अब राज्य शासन और कर्मचारी चयन मंडल को पूरी मेरिट सूची दोबारा तैयार करनी होगी। इससे हजारों चयनित अभ्यर्थियों की नियुक्ति और भविष्य पर सीधा असर पड़ सकता है। शिक्षा विभाग की इस भर्ती प्रक्रिया पर उठे सवालों ने एक बार फिर सरकारी भर्तियों में सत्यापन व्यवस्था और पारदर्शिता को लेकर गंभीर बहस छेड़ दी है।
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