बालाघाट में आदिवासी बच्चों की मौत का मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा, केंद्र व राज्य सरकार को दिया नोटिस
सुप्रीम कोर्ट पहुंचा बालाघाट का मामला
बता दें कि चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया सूर्यकांत, जस्टिस जायमाल्य बागची और जस्टिस विपुल एम. पंचोली की विशेष पीठ ने इस मामले की सुनवाई की है। अदालत ने मामले को गंभीरता से लिया। साथ ही केंद्र सरकार, मध्य प्रदेश सरकार और अन्य संबंधित पक्षों को नोटिस जारी कर इस पर जवाब मांगा है।
याचिका में क्या आरोप लगाए?
दरअसल यह जनहित याचिका बालाघाट के रहने वाले अजब लाल लिल्हारे ने दायर की है। अदालत में उनकी तरफ से वरिष्ठ वकील वरुण ठाकुर ने पैरवी की है।
याचिका में साफ तौर पर कहा गया है कि...
- बालाघाट के दूरदराज और पिछड़े आदिवासी इलाकों में बुनियादी स्वास्थ्य सुविधाओं का भारी अभाव है।
- इन क्षेत्रों में बच्चों का नियमित टीकाकरण नहीं हो पा रहा है।
- बच्चों को सही समय पर पौष्टिक आहार नहीं मिल पा रहा है।
- उचित पोषण और इलाज न मिलने की वजह से बीते चार महीनों में 45 मासूम बच्चों की असमय मौत हो चुकी है।
सरकारी आंकड़ों और जमीनी हकीकत में फर्क
याचिका के अनुसार जहां 45 बच्चों की जान गई है। वहीं दूसरी तरफ प्रशासनिक रिकॉर्ड में अब तक केवल 32 मौतों की आधिकारिक पुष्टि की गई है।
याचिकाकर्ताओं की मुख्य मांगें
याचिकाकर्ताओं ने अदालत के सामने कुछ जरूरी मांगें रखी हैं। ताकि बाकी बच्चों की जान बचाई जा सके।
- प्रभावित इलाकों में तुरंत इमरजेंसी स्वास्थ्य सेवाओं को मजबूत किया जाए।
- सभी जरूरतमंद बच्चों तक नियमित रूप से पौष्टिक आहार पहुंचाया जाए।
- आदिवासी इलाकों में रहने वाले परिवारों और बच्चों के लिए साफ पीने के पानी का पुख्ता इंतजाम किया जाए।
जून से शुरू हुआ था मौतों का सिलसिला
जानकारी के अनुसार बालाघाट में बच्चों की मौत का यह खौफनाक दौर जून 2026 में पहली बार सामने आया था। उपलब्ध जमीनी आंकड़ों के मुताबिक पहली मौत 16 जून 2026 को बोंदारी गांव में दर्ज की गई थी। जहां 16 साल के रूपलाल धुर्वे की जान चली गई थी।
इसके बाद यह सिलसिला रुका नहीं और तेजी से दूसरे घरों तक फैल गया।
26 जून 2026: कोहनीमोड़टोला गांव की 14 वर्षीय लमनिन धुर्वे की बीमारी से मौत हुई थी।
27 जून 2026: साहिल धुर्वे नाम के एक और बच्चे ने दम तोड़ दिया था।
बढ़ता दायरा: इसके बाद बोंदारी, कुंडेकसा, कोरका और आसपास के कई मजरों-टोलों में लगातार बच्चों की मौतें दर्ज की जाने लगीं।
बता दें कि सरकारी रिकॉर्ड के अनुसार अब तक इलाके में कुल 32 बच्चों की मौत हो चुकी है।
कैसे दबा रहा मामला ?
यह पूरा मामला शुरुआत में सिर्फ स्थानीय स्तर तक ही सिमट कर रह गया था। प्रभावित बस्तियों में बच्चे लगातार अपनी जान गंवाते रहे। बाहर की दुनिया को इसकी खबर काफी देर से मिली। अगस्त के महीने में जब स्थानीय ग्रामीणों, जनप्रतिनिधियों और मीडिया ने इस पर आवाज उठाई, तब जाकर यह बात खुलकर सामने आई।
प्रशासनिक स्तर पर बात करें तो 22 जुलाई को यह मामला बाहर आया। अडोरी पंचायत के सरपंच ने तत्कालीन एसडीएम को बोंदारी गांव में 3 बच्चों की मौत की लिखित जानकारी दी थी। इसके बाद 12 अगस्त को जिला प्रशासन ने प्रभावित गांवों में फैली बीमारी को लेकर पहला आधिकारिक पत्र जारी किया।
अगस्त के मध्य में जब मीडिया में मौतों का आंकड़ा तेजी से सामने आने लगा, तब जाकर यह मामला पूरे प्रदेश की सुर्खियों में आया। इसके तुरंत बाद केंद्र और राज्य की विशेषज्ञ स्वास्थ्य टीमें गांवों में भेजी गईं।
जब टीमों ने बच्चों के खून के नमूने लेकर जांच शुरू की तो पता चला कि यह सिर्फ मलेरिया का मामला नहीं था। रिपोर्ट में खसरा, मलेरिया, दोनों का मिला-जुला असर देखने को मिला। इसके अलावा कुपोषण, खून की कमी, निमोनिया, शरीर में पानी की कमी और शॉक जैसी कई जानलेवा वजहें भी सामने आईं।
राहुल गांधी ने सरकार पर साधा निशाना
दूसरी ओर इस मामले पर कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने भी प्रतिक्रिया दी थी। उन्होंने सोशल मीडिया पर लिखा था कि बालाघाट में आदिवासी बच्चों की मौत की खबर बेहद पीड़ादायक है।
राहुल गांधी ने कहा था कि पीने के पानी, पोषण और समय पर इलाज की कमी बच्चों की जान ले रही है। उन्होंने इसे सरकार की पूरी विफलता बताया था।
उनका कहना था कि मुख्यमंत्री मोहन यादव खुद इस मामले का समाधान करें। उन्होंने क्षेत्र में तुरंत जांच, इलाज और राहत देने की मांग की थी। साथ ही उन्होंने कहा था कि बच्चों की जिंदगी से समझौता नहीं हो सकता।