बालाघाट में बच्चों की मौत क्यों? भोपाल अधिवेशन में पोषण संकट और खाद्य सुरक्षा पर उठे सवाल
Sanjay Dhiman | Oct 03, 2026, 20:33 IST
पवन खेड़ा बोले, खाद्य सुरक्षा और पोषण के मुद्दे बहस से गायब, भोपाल अधिवेशन में उठी बात
भोजन के अधिकार अधिवेशन में पोषण के सवाल बहस से गायब बताए गए। बालाघाट में बच्चों की मौत को वक्ताओं ने लंबे पोषण संकट का संकेत कहा। भोपाल के आइकफ आश्रम में 17 राज्यों के 400 से ज्यादा प्रतिनिधि जुटे हैं। खाद्य सुरक्षा, मध्यान्ह भोजन और सामाजिक सुरक्षा पर भी चर्चा हुई। अंतिम दिन पदयात्रा निकलेगी और मांगपत्र नीति निर्धारकों को भेजा जाएगा।
भोजन का अधिकार (Right to Food) आज मुख्यधारा की बहस से गायब है। यह बात भोपाल में हुए राष्ट्रीय अधिवेशन में उठी। वक्ताओं के मुताबिक इसका असर बच्चों की मौतों में दिख रहा है। सोचिए एक बार। अनाज का उत्पादन बढ़ा है, फिर भी पोषण की हालत चिंताजनक क्यों है?
भोजन के अधिकार अधिवेशन आइकफ आश्रम में 17 राज्यों के 400 से ज्यादा प्रतिनिधि जुटे हैं।
भोपाल के आइकफ आश्रम में भोजन के अधिकार का अधिवेशन चल रहा है। 17 राज्यों के 400 से ज्यादा प्रतिनिधि इसमें हिस्सा ले रहे हैं। दूसरे दिन वक्ताओं ने कहा कि पोषण के सवाल बहस से गायब हैं।
बालाघाट में बच्चों की मौत को लंबे पोषण संकट का संकेत बताया गया। तीन दिन की चर्चा के बाद मांगपत्र बनेगा, जो नीति निर्धारकों तक जाएगा।
दूसरे दिन बालाघाट में बच्चों की मौतों पर भी बात हुई। वहां हाल की घटनाओं की रिपोर्टिंग पत्रकार बिंदु ने की है। उनका कहना है कि यह एक दिन की बात नहीं है।
बिंदु के मुताबिक आदिवासी समुदायों का जंगल से रिश्ता कमजोर हुआ है। जंगल अब उनके जीवन का नियमित हिस्सा नहीं रह गया है।
सोचिए एक बार। जो समुदाय जंगल पर निर्भर था, वह अब सरकारी योजनाओं पर ज्यादा निर्भर है। इसका असर उसके पोषण पर दिख रहा है। आखिर पोषण संकट यानी पोषण की कमी (malnutrition) की जड कहां है?
वक्ताओं ने इसी सवाल की परतें खोलीं।
जनप्रतिनिधियों के सत्र को विधायक ओंकार मरकाम ने भी संबोधित किया। राज्यसभा सांसद पवन खेडा ने सीधी बात रखी। उनके मुताबिक देश में अनाज बढा, पर पोषण की तस्वीर चिंताजनक है।
खेडा ने एसआईआर (SIR – Special Intensive Revision) पर भी चिंता जताई। यह मतदाता सूची की गहन जांच की प्रक्रिया है। उनका कहना था कि नाम हटने से अधिकारों पर असर पड़ सकता है।
पत्रकार रोईन ने मीडिया की भूमिका पर बात की। उन्होंने माना कि ऐसी रिपोर्टिंग आसान नहीं है।
पत्रकार रोईन भोजन, पोषण और वंचित समुदायों के मुद्दों पर संवेदनशील रिपोर्टिंग जरूरी है। ऐसी रिपोर्टिंग लोगों में समझ और संवेदना पैदा करती है। लेकिन यह चुनौतीपूर्ण है, इसलिए पर्याप्त खबरें सामने नहीं आ पातीं।
क्या आपको याद है, राशन या खाद्य सुरक्षा पर आखिरी बहस कब हुई? वक्ताओं की चिंता यही थी।
जमीन की आवाजें सत्र में कई राज्यों के सामाजिक कार्यकर्ताओं ने अनुभव साझा किए। जालौन जिले (उत्तर प्रदेश) के मलकपुरा गांव के सरपंच ने पंचायतों की मजबूरी बताई।
उत्तर प्रदेश के जालौन जिले की मलकपुरा पंचायत के सरपंच ने कहा कि पंचायतों के पास पर्याप्त अधिकार नहीं हैं। इससे शिक्षकों की जवाबदेही तय करना मुश्किल होता है।
सरपंच ने स्कूलों में मध्यान्ह भोजन (दोपहर का सरकारी खाना) सुधारने की कोशिश की। इसके लिए उन्होंने क्राउड फंडिंग (crowd funding, यानी जनता से चंदा) का सहारा लिया। इसके बावजूद सरकारी स्कूलों में बच्चों का पंजीयन पहले से कम हो गया। पालकों ने साफ कहा कि उन्हें गुणवत्तापूर्ण शिक्षा चाहिए।
आंगनवाडी (बच्चों और माताओं का सरकारी केंद्र) का हाल सायरा बानो ने बताया। वे गुजरात से आई हैं।
गुजरात से आई सायरा बानो ने बताया कि हमारे क्षेत्र में तीन आंगनवाडी केंद्र हैं। इनमें से दो किराये के भवनों में चलते हैं। ये केंद्र नियमित रूप से नहीं लगते। इसका सीधा असर बच्चों के पोषण पर पड रहा है।
एक साथ चले सत्रों में कई विषयों पर बात हुई। सार्वजनिक वितरण प्रणाली (राशन दुकानों से अनाज बांटने की व्यवस्था) पर चर्चा हुई। आंगनवाडी, मध्यान्ह भोजन और मातृ एवं बाल पोषण भी एजेंडे में रहे। रोजगार और सामाजिक सुरक्षा पर भी बात हुई।
प्रतिभागियों ने अपने राज्यों के अनुभव साझा किए। चर्चा का निचोड साफ था। खाद्य सुरक्षा और पोषण योजनाएं केवल बजट और प्रावधानों से कारगर नहीं होतीं। प्रभावी क्रियान्वयन, जवाबदेही और समुदाय की भागीदारी भी उतनी ही जरूरी है।
अंतिम दिन बच्चों के भोजन का अधिकार (Right to Food) पर पदयात्रा निकलेगी। यह यात्रा दोपहर तीन बजे मनीषा मार्केट से बिट्टन मार्केट तक जाएगी।
तीन दिन की चर्चा के बाद मांगपत्र (मांगों की लिखित सूची) बनेगा। इसे नीति निर्धारकों को भेजा जाएगा। अब निगाहें इसी मांगपत्र पर टिकी हैं।
भोजन के अधिकार अधिवेशन आइकफ आश्रम में 17 राज्यों के 400 से ज्यादा प्रतिनिधि जुटे हैं।
समझें क्या है पूरा मामला
बालाघाट में बच्चों की मौत को लंबे पोषण संकट का संकेत बताया गया। तीन दिन की चर्चा के बाद मांगपत्र बनेगा, जो नीति निर्धारकों तक जाएगा।
बालाघाट में क्यों गई जानें?
बिंदु के मुताबिक आदिवासी समुदायों का जंगल से रिश्ता कमजोर हुआ है। जंगल अब उनके जीवन का नियमित हिस्सा नहीं रह गया है।
सोचिए एक बार। जो समुदाय जंगल पर निर्भर था, वह अब सरकारी योजनाओं पर ज्यादा निर्भर है। इसका असर उसके पोषण पर दिख रहा है। आखिर पोषण संकट यानी पोषण की कमी (malnutrition) की जड कहां है?
वक्ताओं ने इसी सवाल की परतें खोलीं।
बहस से गायब पोषण के सवाल
खेडा ने एसआईआर (SIR – Special Intensive Revision) पर भी चिंता जताई। यह मतदाता सूची की गहन जांच की प्रक्रिया है। उनका कहना था कि नाम हटने से अधिकारों पर असर पड़ सकता है।
पत्रकार रोईन ने मीडिया की भूमिका पर बात की। उन्होंने माना कि ऐसी रिपोर्टिंग आसान नहीं है।
संवेदनशील रिपोर्टिंग क्यों जरूरी
क्या आपको याद है, राशन या खाद्य सुरक्षा पर आखिरी बहस कब हुई? वक्ताओं की चिंता यही थी।
जमीन से उठीं आवाजें
पंचायतों के पास अधिकार ही नहीं
सरपंच ने स्कूलों में मध्यान्ह भोजन (दोपहर का सरकारी खाना) सुधारने की कोशिश की। इसके लिए उन्होंने क्राउड फंडिंग (crowd funding, यानी जनता से चंदा) का सहारा लिया। इसके बावजूद सरकारी स्कूलों में बच्चों का पंजीयन पहले से कम हो गया। पालकों ने साफ कहा कि उन्हें गुणवत्तापूर्ण शिक्षा चाहिए।
आंगनवाडी (बच्चों और माताओं का सरकारी केंद्र) का हाल सायरा बानो ने बताया। वे गुजरात से आई हैं।
तीन में से दो आंगनवाडी किराये पर
सत्रों में उभरे असली सबक
प्रतिभागियों ने अपने राज्यों के अनुभव साझा किए। चर्चा का निचोड साफ था। खाद्य सुरक्षा और पोषण योजनाएं केवल बजट और प्रावधानों से कारगर नहीं होतीं। प्रभावी क्रियान्वयन, जवाबदेही और समुदाय की भागीदारी भी उतनी ही जरूरी है।
आखिरी दिन पदयात्रा और मांगपत्र
तीन दिन की चर्चा के बाद मांगपत्र (मांगों की लिखित सूची) बनेगा। इसे नीति निर्धारकों को भेजा जाएगा। अब निगाहें इसी मांगपत्र पर टिकी हैं।
- भोपाल में भोजन के अधिकार अधिवेशन का मुख्य उद्देश्य क्या है?
भोपाल में भोजन के अधिकार अधिवेशन का मुख्य उद्देश्य पोषण संकट और बच्चों की मौतों की समस्या पर बात करना है, जिसमें 17 राज्यों के 400 से अधिक प्रतिनिधि शामिल हैं। - बालाघाट में बच्चों की मौतों का क्या कारण बताया गया है?
बालाघाट में बच्चों की मौतों का कारण पोषण के संकट को बताया गया है, जिसमें आदिवासी समुदायों की जंगल से कमजोर होती हुई रिश्ते भी शामिल हैं। - इस अधिवेशन में किन मुद्दों पर चर्चा की गई है?
इस अधिवेशन में सार्वजनिक वितरण प्रणाली, आंगनवाड़ी, मध्यान्ह भोजन और मातृ एवं बाल पोषण जैसे मुद्दों पर चर्चा की गई है।
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