महिला आरक्षण पर MP में सियासी जंग तेज: जीतू पटवारी का पलटवार, खंडेलवाल का आक्रोश अभियान
मध्यप्रदेश में महिला आरक्षण को लेकर सियासत अचानक गरमा गई है। कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष जीतू पटवारी ने द सूत्र से बातचीत में कहा कि 2023 में बिल पास हो चुका है। उन्होंने आरोप लगाया कि भाजपा देश को भ्रमित कर रही है। उधर भाजपा इसे नारी अधिकार का मुद्दा बनाकर कांग्रेस पर सीधा हमला बोल रही है। बयानबाजी अब सीधी टकराहट में बदलती दिख रही है।
क्यों भड़की महिला आरक्षण पर नई बहस?
महिला आरक्षण कानून पहले ही संसद से पास हो चुका है। लेकिन इसके क्रियान्वयन और राजनीतिक क्रेडिट को लेकर भाजपा और कांग्रेस आमने-सामने आ गई हैं। दोनों दल इस मुद्दे को जनता के बीच अपने-अपने तरीके से पेश कर रहे हैं।
भ्रम फैला रही भाजपा: जीतू पटवारी
कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष जीतू पटवारी ने भाजपा पर तीखा हमला बोला है। उनका कहना है कि जिस बिल को 2023 में मंजूरी मिल चुकी है, उसी को फिर से मुद्दा बनाकर भाजपा लोगों को गुमराह कर रही है। उन्होंने आरोप लगाया कि भाजपा असल मुद्दों से ध्यान हटाने के लिए महिला आरक्षण का सहारा ले रही है। महंगाई, बेरोजगारी और अंतरराष्ट्रीय मुद्दों पर सवालों से बचने की कोशिश की जा रही है।
यह राजनीति नहीं, बहनों का अधिकार
भाजपा प्रदेश अध्यक्ष हेमंत खंडेलवाल ने कांग्रेस के आरोपों को खारिज किया। उन्होंने कहा कि महिला आरक्षण कोई राजनीतिक हथियार नहीं, बल्कि महिलाओं का हक है। खंडेलवाल ने कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की मंशा हमेशा से महिलाओं को उनका अधिकार दिलाने की रही है, लेकिन जब भी इसे लागू करने का समय आया, विपक्ष ने बाधा डाली।
दोनों पार्टी के एक दूसरे पर आरोप
भाजपा इस मुद्दे को “नारी सम्मान” और “आक्रोश” से जोड़कर जनता के बीच ले जाने की रणनीति पर काम कर रही है। वहीं कांग्रेस इसे भाजपा का ध्यान भटकाने वाला एजेंडा बता रही है। दोनों दलों की रणनीति साफ है। एक तरफ भाजपा भावनात्मक अपील के जरिए महिलाओं को साधना चाहती है। तो दूसरी तरफ कांग्रेस इसे राजनीतिक स्टंट बताकर काउंटर कर रही है।
मुख्य बातें
2023 में महिला आरक्षण बिल संसद से पास हो चुका है।
कांग्रेस का आरोप: भाजपा लागू करने के बजाय भ्रम फैला रही है।
भाजपा का दावा: कांग्रेस ने हमेशा इस बिल में रोड़े अटकाए।
मुद्दा अब "महिला अधिकार" बनाम "राजनीतिक स्टंट" बन गया है।
दोनों दल इसे 2024-25 की सियासत में बड़ा हथियार बना रहे हैं।
आगे क्या?
महिला आरक्षण का मुद्दा अब सिर्फ कानून तक सीमित नहीं रहा, बल्कि यह राजनीतिक नैरेटिव की लड़ाई बन गया है। आने वाले दिनों में यह बहस और तेज होने के संकेत हैं, जहां दोनों दल इसे जनता के बीच बड़े मुद्दे के रूप में उछालेंगे।
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