रणथंभौर में टेरिटरी संघर्ष में 9 साल में 9 बाघों की मौत, हो रही है क्षमता से अधिक संख्या

Jageshwar prasad | May 02, 2026, 16:09 IST
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Ashish Bhardwaj - 2026-05-02T160444.307
Photograph: (the sootr)

राजस्थान के रणथंभौर में क्षमता से अधिक बाघ होने के कारण टेरिटरी की जंग तेज हो गई है। मानक से आधी जमीन मिलने के कारण पिछले 9 साल में 9 बाघ आपसी भिड़ंत में मारे गए हैं।

News In Short

  • रणथंभौर में क्षमता से अधिक बाघ होने के कारण टेरिटरी की जंग तेज।
  • 45-55 बाघों की क्षमता के मुकाबले वर्तमान में कुल 77 बाघ-शावक मौजूद।
  • टेरिटरी की होड़ में पिछले 9 वर्षों के दौरान 9 बाघों ने लड़कर दम तोड़ दिया।
  • शावक 2 साल की उम्र पार करते ही अपनी टेरिटरी का निर्माण करने लगते हैं।
  • विशेषज्ञों का मानना है कि कॉरिडोर और शिफ्टिंग ही एकमात्र स्थायी हल है।

News In Detail

Ranthambhore: राजस्थान के प्रसिद्ध रणथंभौर टाइगर रिजर्व में बाघों की बढ़ती संख्या अब उनके लिए संकट बनती जा रही है। अपनी टेरिटरी कायम करने की होड़ में बाघ एक-दूसरे के खून के प्यासे हो गए हैं। पिछले नौ साल में आपसी भिड़ंत में नौ बाघों की मौत हो चुकी है। वन्यजीव विशेषज्ञों ने इस बढ़ते संघर्ष पर गंभीर चिंता जताई है।

रणथंभौर को 1973 में राजस्थान का पहला टाइगर रिजर्व बनाया गया था, जबकि 1980 में इसे राष्ट्रीय उद्यान (नेशनल पार्क) का दर्जा मिला। यह पार्क बाघों के लिए दुनियाभर में प्रसिद्ध है। लेकिन आज यहां की तस्वीर चिंताजनक है। नेशनल टाइगर कंजर्वेशन अथॉरिटी (NTCA) ने भी इस आपसी संघर्ष पर चिंता व्यक्त की है।

क्षमता से कहीं अधिक बाघ

वाइल्डलाइफ इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया (WII) की 2015-16 की रिपोर्ट के अनुसार, रणथंभौर का कुल क्षेत्रफल अधिकतम 45 से 55 बाघों के लिए उपयुक्त है। लेकिन वर्तमान में यहां 77 बाघ, बाघिन और शावक मौजूद हैं। यानी क्षमता से करीब 20-30 अधिक बाघ इस सीमित परिसर में रहने को मजबूर हैं।

आबादी बढ़ने का यह सीधा असर उनके क्षेत्र पर पड़ा है। NTCA के दिशानिर्देशों के अनुसार, एक बाघ को 40 से 50 वर्ग किलोमीटर के क्षेत्र की आवश्यकता होती है। लेकिन रणथंभौर में एक बाघ के हिस्से मात्र 22 वर्ग किलोमीटर का क्षेत्र आ रहा है। यानी प्रत्येक बाघ की टेरिटरी औसतन 18 से 28 वर्ग किलोमीटर तक सिमट कर रह गई है।

मां का साथ छोड़ते ही शुरू हो जाता है संघर्ष

वन्यजीव विशेषज्ञों के अनुसार, शावक लगभग दो साल की उम्र तक अपनी मां के साथ रहते हैं। उसके बाद उन्हें अपना अलग क्षेत्र तलाशने के लिए मां का साथ छोड़ना पड़ता है। यहीं से उनके लिए संघर्ष और जोखिम भरा जीवन शुरू होता है। अपनी जमीन तलाशने की इस जद्दोजहद में युवा बाघ अक्सर बुजुर्ग और कमजोर बाघों पर हमला कर देते हैं।

ताकतवर युवा बाघ पुरानी टेरिटरी पर कब्जा कर लेते हैं। इस खूनी संघर्ष में बुजुर्ग बाघों को या तो जंगल छोड़कर बाहर भागना पड़ता है, या फिर वे अपनी जान गंवा देते हैं। पिछले नौ वर्षों में आपसी लड़ाई में मरने वाले नौ बाघ इसी संघर्ष के शिकार हुए हैं।

डीएफओ ने माना क्षमता से अधिक हैं बाघ

रणथंभौर टाइगर रिजर्व (डिवीजन फर्स्ट) के डीएफओ मानस सिंह ने बताया, कि रणथंभौर में वर्तमान में करीब 21 बाघ, 20 बाघिन और 16 से अधिक शावक हैं। दूसरे डिवीजन में भी दस से अधिक बाघ-बाघिन और शावक हैं। यह संख्या निश्चित रूप से क्षमता से अधिक है।

डीएफओ के अनुसार, बाघ अब नए इलाकों की तलाश में जंगल की सीमाओं से बाहर निकल रहे हैं। विशेष रूप से जोन 1 से लेकर 5 तक में सबसे अधिक बाघ रहते हैं, जो आपसी टकराव का मुख्य केंद्र बने हुए हैं। जब तक बाघों के सुरक्षित आवागमन (मूवमेंट) के लिए कॉरिडोर (गलियारे) नहीं बनाए जाते या उन्हें दूसरे अभयारण्यों में स्थानांतरित (शिफ्टिंग) करने की ठोस योजना पर काम नहीं होता, तब तक यह संघर्ष थमता नहीं दिख रहा है।

क्या कहा विशेषज्ञों ने?

वन्यजीव विशेषज्ञों का मानना है कि बाघों को दूसरे अभयारण्यों में स्थानांतरित करना और उनके लिए सुरक्षित गलियारे विकसित करना ही दीर्घकालिक समाधान है। रणथंभौर के आसपास के जंगलों को बाघों के लिए और अधिक उपयुक्त बनाना होगा। साथ ही, मानव-बाघ संघर्ष को रोकने के लिए ग्रामीणों को जागरूक करना और बफर जोन को मजबूत करना भी आवश्यक है।

फिलहाल, बाघों की यह आपसी लड़ाई थमने का नाम नहीं ले रही है। रणथंभौर का यह संकट न सिर्फ वन्यजीव प्रेमियों बल्कि सरकार और वन विभाग के लिए भी एक बड़ी चुनौती है।

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