तीन भाषा फॉर्मूला लागू होने से बढ़ा असमंजस, राजस्थानी भाषा को स्थान न मिलने से रोष
News In Short
- 1 जुलाई 2026 से कक्षा 9वीं में तीन भाषाओं का अध्ययन अनिवार्य।
- इस त्रि-भाषा फॉर्मूले में राजस्थानी भाषा को जगह नहीं मिली है।
- सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही प्रदेश के सभी स्कूलों में राजस्थानी भाषा पढ़ाने को कहा था।
- राजस्थानी भाषा की अनुपस्थिति ने स्थानीय भाषा प्रेमियों को किया निराश।
News In Detail
केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड (CBSE) द्वारा कक्षा 9वीं के लिए लागू की जा रही नई भाषा व्यवस्था ने राजस्थान के शैक्षणिक हलकों में एक नई बहस और असमंजस की स्थिति पैदा कर दी है। बोर्ड के नए दिशानिर्देशों के अनुसार आगामी 1 जुलाई 2026 से कक्षा 9वीं में तीन भाषाओं का अध्ययन अनिवार्य होने जा रहा है।
इस नए नियम के तहत विद्यार्थियों को अनिवार्य रूप से तीन भाषाएं पढ़नी होंगी, जिनमें दो भारतीय भाषाएं और एक विदेशी भाषा शामिल होगी। इस बदलाव के बीच राजस्थान में एक नया विवाद खड़ा हो गया है। राज्य की अपनी मातृभाषा राजस्थानी को इस त्रि-भाषा फॉर्मूले में जगह नहीं मिली है, जिसे लेकर स्थानीय स्तर पर काफी असंतोष देखा जा रहा है।
सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों की अनदेखी?
राजस्थान में राजस्थानी भाषा को अभी तक संवैधानिक मान्यता प्राप्त नहीं हुई है। यही मुख्य कारण है कि इसे सीबीएसई के इस नए अनिवार्य भाषा ढांचे में शामिल नहीं किया गया है।
दिलचस्प बात यह है कि पिछले दिनों सुप्रीम कोर्ट ने राज्य सरकार को निर्देश दिए थे कि राजस्थान के सभी स्कूलों में राजस्थानी भाषा पढ़ाने की व्यवस्था की जाए। इसके बावजूद नए केंद्रीय नियम में राजस्थानी भाषा की अनुपस्थिति ने शिक्षाविदों और स्थानीय भाषा प्रेमियों को निराश किया है।
तीन श्रेणियों ने बढ़ाया भ्रम
सीबीएसई की इस नई व्यवस्था में भाषाओं को तीन अलग-अलग श्रेणियों में विभाजित किया गया है, जिसने स्कूलों और अभिभावकों के बीच भारी असमंजस पैदा कर दिया है:
आर-1 (R-1): यह वह भाषा होगी जिसमें बच्चा सबसे अधिक सहज और पारंगत हो।
आर-2 (R-2): यह दूसरी भाषा के रूप में चुनी जाएगी।
आर-3 (R-3): इसे तीसरी भाषा के रूप में विद्यार्थियों को पढ़ाया जाएगा।
इस वर्गीकरण ने विशेष रूप से अंग्रेजी माध्यम के स्कूलों में भ्रम की स्थिति पैदा कर दी है। राजस्थान के अधिकांश सीबीएसई स्कूल अंग्रेजी माध्यम के हैं, लेकिन वहां पढ़ने वाले बच्चों की व्यावहारिक समझ और बोलचाल की भाषा हिंदी है।
ऐसे में स्कूल प्रबंधन और शिक्षक यह तय नहीं कर पा रहे हैं कि पहली भाषा (R-1) हिंदी को माना जाएगा या अंग्रेजी को। इस स्पष्टता के अभाव में स्कूल प्रबंधन, अभिभावक और विद्यार्थी सभी गहरे असमंजस में हैं।
शिक्षकों की कमी बड़ी चुनौती
नई भाषा नीति को धरातल पर उतारने में सबसे बड़ा रोड़ा योग्य और प्रशिक्षित शिक्षकों की भारी कमी है।
नए नियमों के तहत भाषा शिक्षकों की उपलब्धता स्कूलों के सामने एक बहुत बड़ी चुनौती बनकर उभरी है। विशेषकर भारतीय भाषाओं और क्षेत्रीय भाषाओं के प्रशिक्षित शिक्षकों का भारी टोटा है।
इस समस्या से निपटने के लिए बोर्ड ने स्कूलों को कुछ वैकल्पिक रास्ते सुझाए हैं, जैसे:
ऑनलाइन और ऑफलाइन मोड को मिलाकर मिश्रित शिक्षण (Blended Learning) करवाना।
सेवानिवृत्त (Retired) भाषा शिक्षकों की सेवाएं दोबारा लेना। अन्य विषयों के उन शिक्षकों की मदद लेना जो इन भाषाओं को जानने और समझने में सक्षम हैं।
हालांकि, जानकारों का मानना है कि महानगरों में तो ये विकल्प काम कर सकते हैं, लेकिन छोटे शहरों और ग्रामीण इलाकों के स्कूलों के लिए इस व्यवस्था को तुरंत लागू करना बिल्कुल भी आसान नहीं होगा।
ट्रांसफर होने वाले परिवारों की चिंता
इस नई नीति के लागू होने के बाद सबसे बड़ी चिंता उन परिवारों को लेकर सामने आ रही है जिनके अभिभावकों की नौकरियां लगातार ट्रांसफर (स्थानांतरण) होने वाली होती हैं।
उदाहरण के लिए यदि किसी अन्य राज्य से ट्रांसफर होकर आए बच्चे राजस्थान में दाखिला लेते हैं, तो उन्हें अचानक यहां की तय व्यवस्था के अनुसार नई भाषाएं पढ़नी पड़ सकती हैं।
अचानक से पाठ्यक्रम में एक नई और अपरिचित भाषा का जुड़ना बच्चों के मानसिक स्तर और उनके शैक्षणिक प्रदर्शन (Academic Performance) पर विपरीत असर डाल सकता है। यही कारण है कि इस नियम को लेकर अभिभावक वर्ग बेहद चिंतित नजर आ रहा है।
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