जंगल की बेशकीमती जमीन को लगा दिया ठिकाना, गुपचुप में दूसरी तहसील में करा ली रजिस्ट्री

Mukesh Sharma | Apr 30, 2026, 18:31 IST
Photograph: (the sootr)
राजस्थान में जयपुर के नजदीक बस्सी में 'बीड़' जमीन का गुपचुप में सौदा हो गया। गंभीर बात यह है कि इस जमीन का स्थानीय राजस्व अधिकारियों ने नामांतरण भी खोल दिया। अब यह मामला एनजीटी में पहुंच गया है।

News In Short

  • जयपुर के करीब बस्सी में बेशकीमती बीड़ जमीन का हो गया सौदा।
  • जंगल की इस जमीन की गुपचुप में दूसरी तहसील में करा दी रजिस्ट्री।
  • सुप्रीम कोर्ट के आदेश के अनुसार ऐसी जमीन डीम्ड फोरेस्ट की श्रेणी में।
  • जमीन खरीद-फरोख्त का यह मामला पहुंचा एनजीटी की चौखट पर।
  • एनजीटी ने कहा, पर्यावरण के मुद्धे पर ट्रिब्यूनल चुप नहीं रहेगा।

News In Detail

Jaipur: राजस्थान की राजधानी जयपुर के करीब बस्सी इलाके में जमीन के बड़े खेल का खुलासा हुआ है। यहां की बेशकीमती 'बीड़' (सुरक्षित चरागाह) और बंजर जमीन को रसूखदारों ने मिलीभगत कर व्यावसायिक उपयोग के लिए ठिकाने लगा दिया।



गंभीर बात यह है कि इस जमीन के सौदे की रजिस्ट्री गुपचुप तरीके से दूसरी तहसील में करा दी। अब यह मामला नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (NGT) की चौखट पर पहुंच गया है। एनजीटी ने इस मामले में गहरी नाराजगी जताई है।



​क्या है पूरा मामला?

​यह पूरा विवाद बस्सी तहसील के पाडासोली गांव की जमीन से जुड़ा है। यहां खसरा नंबर 306, 307/2, 45, 310, 311, 276 और 277 की जमीन को रसूखदारों ने कौड़ियों के भाव खरीद लिया। पर्यावरण प्रेमी हेमराज मीणा ने इस खरीद-फरोख्त को NGT में चुनौती दी है।


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याचिका के अनुसार यह जमीन राजस्व रिकॉर्ड में 'बीड़' के रूप में दर्ज है। कानूनी रूप से इसे 'डीम्ड फॉरेस्ट' (Deemed Forest) माना जाना चाहिए। बावजूद इसके खातेदारों ने इसे व्यावसायिक लाभ के लिए बेच दिया।



​रजिस्ट्री में हुआ बड़ा खेल

इस सौदे का सबसे चौंकाने वाला पहलू इसकी रजिस्ट्री है। जमीन बस्सी तहसील की है, लेकिन इसकी रजिस्ट्री नियम विरुद्ध आंधी तहसील में करवाई गई। जानकारों का मानना है कि ऐसा स्थानीय विरोध और कानूनी पेचीदगियों से बचने के लिए किया गया। प्रशासन की सक्रियता का आलम यह रहा कि राजस्व विभाग ने जून 2025 में आनन-फानन में इसका नामांतरण भी खोल दिया।



​क्या कहता है सुप्रीम कोर्ट का आदेश?

जमीन के संरक्षण को लेकर सुप्रीम कोर्ट के सख्त दिशा-निर्देश हैं। ​यदि 5 हेक्टेयर जमीन पर 200 पेड़ हों तो उसे डीम्ड फॉरेस्ट माना जाएगा। ​राजस्व रिकॉर्ड में बीड़, बीड़-बंजर, गैर-मुमकिन पहाड़ या रुंद के नाम से दर्ज जमीन संरक्षित श्रेणी में आती है। ​ऐसी जमीन निजी होने पर भी उसे बेचा नहीं जा सकता। ​इन जमीनों का भू-उपयोग (Land Use) नहीं बदला जा सकता। ​इनका उपयोग केवल वृक्षारोपण के लिए ही संभव है।



​एनजीटी की सरकार को फटकार

​एनजीटी की भोपाल बेंच के जस्टिस शेव कुमार सिंह और एक्सपर्ट मेंबर सुधीर कुमार चतुर्वेदी ने सरकार की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाए हैं। ट्रिब्यूनल ने पूछा कि जब सुप्रीम कोर्ट के आदेश स्पष्ट हैं तो राजस्थान सरकार ने अब तक प्रदेश में 'डीम्ड फॉरेस्ट' की पहचान और अधिसूचना क्यों जारी नहीं की?



​ट्रिब्यूनल ने सरकारी वकील को सख्त हिदायत दी है। सरकार को एक महीने के भीतर जवाब देना होगा कि अधिसूचना जारी हुई है या नहीं। यदि अधिसूचना तैयार है तो उसे एक महीने में कोर्ट के सामने पेश करना होगा। एनजीटी ने कहा है कि जमीन का मालिकाना हक और रजिस्ट्री रद्द करना सिविल कोर्ट का काम है। लेकिन, यदि पर्यावरण के साथ खिलवाड़ होगा, तो एनजीटी चुप नहीं बैठेगा।



​रसूखदारों और अफसरों का गठजोड़

स्थानीय लोगों का आरोप है कि इस खेल में प्रशासनिक मशीनरी और सफेदपोश रसूखदार सीधे तौर पर शामिल हैं। पर्यावरण प्रेमी हेमराज मीणा का कहना है कि सरकार की ढिलाई का फायदा उठाकर भू-माफिया सुरक्षित चरागाहों को निगल रहे हैं। यह सिर्फ जमीन का सौदा नहीं, बल्कि प्रकृति के साथ धोखाधड़ी है।



​आगे क्या होगा?

NGT के सख्त रुख के बाद अब राजस्थान के राजस्व और वन विभाग में खलबली मची है। एक महीने का समय सरकार के लिए अग्निपरीक्षा जैसा है। यदि सरकार अधिसूचना पेश नहीं कर पाती है, तो अधिकारियों पर गाज गिरना तय है।



​इस मामले ने पूरे राजस्थान में डीम्ड फॉरेस्ट के भविष्य पर सवालिया निशान लगा दिया है। क्या सरकार रसूखदारों के दबाव में झुकेगी या पर्यावरण के संरक्षण के लिए कड़ा कदम उठाएगी? सबकी नजरें अब अगले महीने होने वाली सुनवाई पर टिकी हैं।



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