गहलोत पर डोटासरा का तंज, जीआई टैग पर घमासान, आईपीएस को चाहिए किराए का घर
राजस्थान का यह सप्ताह कई मायनों में महत्वपूर्ण रहा। इस दौरान राजनीति के द्वंद्व, किसानों के हक की लड़ाई और प्रशासनिक बदलाव दिखा।
एक ओर कांग्रेस में गुटबाजी की चिंगारी सुलग रही है, वहीं दूसरी ओर ऊंझा जीरा विवाद ने राज्य के कृषि स्वाभिमान पर सवाल खड़ा कर दिया है।
आगामी 20 अगस्त से शुरू हो रहा विधानसभा सत्र प्रदेश की राजनीति की दिशा तय करेगा। सरकार को अपनी विधायी प्राथमिकताओं को सिद्ध करना होगा। वहीं, विपक्ष को जनहित के मुद्दों पर अपनी सतर्कता दिखानी होगी।
कांग्रेस: गुटबाजी का नया अंक
इस सप्ताह राजस्थान कांग्रेस की अंदरूनी कलह फिर सामने आ गई। मामला तब शुरू हुआ, जब भाजपा छोड़ कांग्रेस में लौटे महेन्द्रजीत सिंह मालवीय भारत आदिवासी पार्टी के 300 कार्यकर्ताओं को कांग्रेस में शामिल कराने पूर्व सीएम अशोक गहलोत के आवास पहुंचे।
गहलोत ने कार्यकर्ताओं का स्वागत किया। उन्हें कांग्रेस के पट्टे पहनाए। कार्यकर्ताओं ने चौथी बार गहलोत सरकार के नारे लगाए। इसके बाद मालवीय कार्यकर्ताओं के साथ प्रदेश कांग्रेस दफ्तर पहुंचे।
यह घटनाक्रम प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष गोविंद सिंह डोटासरा को जरा भी रास नहीं आया।
डोटासरा का गुस्सा फूटा। उन्होंने गहलोत का नाम लिए बिना कहा-कुछ लोग पार्टी से ज्यादा अपनी ब्रांडिंग करते हैं। यह ब्रांडिंग उन्हीं को मुबारक! इसी व्यक्तिवाद का खामियाजा पार्टी भुगत रही है। इसके कारण सरकार बनती है और फिर हम हार जाते हैं। लेकिन मेरे लिए पार्टी सबसे ऊपर है।
हालांकि बाद में डोटासरा और गहलोत दोनों ने ही इस बयानबाजी पर लीपापोती करने की कोशिश की। इसे सहज मुलाकात बताया, लेकिन तीर कमान से छूट चुका था। राजस्थान कांग्रेस में व्यक्तिवाद बनाम संगठन की यह लड़ाई कोई नई नहीं है। चुनावी हार के बाद भी इससे सबक न लेना पार्टी के लिए चिंताजनक है।
जीरा-सौंफ पर जीआई वार
भारतीय रसोई की जान जीरा और सौंफ को लेकर राजस्थान और गुजरात के बीच बड़ा विवाद खड़ा हो गया है। विवाद की वजह गुजरात की ऊंझा मंडी को ऊंझा जीरा और ऊंझा सौंफ का जीआई टैग मिलना है।
इस फैसले से राजस्थान के किसान बेहद आक्रोशित हैं। उनका कहना है कि जीरा और सौंफ की असली खेती राजस्थान के किसान करते हैं। ऊंझा केवल एक व्यापारिक मंडी है, जहां बड़े निर्यातक बैठते हैं। किसान अपनी फसल बेहतर दाम पाने के लिए ऊंझा भेजते हैं।
किसानों को डर है कि जीआई टैग मिलने के बाद व्यापारी उनके जीरे को निम्न गुणवत्ता का बताकर औने-पौने दामों में खरीदेंगे। ऊंझा ब्रांड के नाम पर अंतरराष्ट्रीय बाजार में प्रीमियम वसूलेंगे।
हालांकि, ऊंझा मंडी के अध्यक्ष दिनेश पटेल का तर्क है कि 1,000 से अधिक पन्नों के वैज्ञानिक साक्ष्यों के बाद जीआई टैग मिला है।
राजस्थान आज देश के कुल जीरा उत्पादन में बहुत बड़ी हिस्सेदारी रखता है। ऐसे में केवल ट्रेडिंग सेंटर को जीआई टैग मिलना राजस्थान के किसानों के साथ अन्याय प्रतीत होता है। इस मामले में राजस्थान सरकार की सुस्ती स्पष्ट झलकती है। राजस्थान को तुरंत इस फैसले के खिलाफ जीआई रजिस्ट्री में आपत्ति दर्ज करनी चाहिए।
विधानसभा का मानसून सत्र
राजस्थान विधानसभा का मानसून सत्र 20 अगस्त से शुरू होने जा रहा है। पंचायत और निकाय चुनावों की सरगर्मी के बीच होने वाला यह सत्र बेहद हंगामेदार रहने के आसार हैं।
राज्य सरकार इस सत्र में खेजड़ी संरक्षण विधेयक पेश करने जा रही है। खेजड़ी थार के लिए जीवनदायिनी है, लेकिन सोलर प्रोजेक्ट के कारण इसकी अवैध कटाई हो रही है।
इस सत्र में विपक्ष ने पेपर लीक, छात्र संघ चुनाव न कराने के फैसले, बिगड़ती कानून-व्यवस्था और स्थानीय मुद्दों पर सरकार को घेरने की पूरी रणनीति बना ली है। महज एक सप्ताह का यह सत्र लोकतांत्रिक परंपराओं के लिहाज से काफी छोटा है।
छात्र संघ चुनावों पर लगी रोक और पेपर लीक जैसे मुद्दे युवाओं से सीधे जुड़े हैं। यदि सरकार इन पर कोई ठोस जवाब पेश नहीं करती है तो पंचायत व निकाय चुनावों में बीजेपी को राजनीतिक नुकसान उठाना पड़ सकता है।
हम भी बीजेपी कार्यकर्ता हैं, जो करना है कर लो!
जयपुर की सड़कों पर इस हफ्ते एक अजीबो-गरीब मामला सामने आया। समाज कल्याण मंत्री अविनाश गहलोत की बेटी की टोयोटा फॉर्च्यूनर कार को 28 जुलाई को लोडिंग पिकअप ने टक्कर मार दी। मंत्री की फॉर्च्यूनर का पिछला हिस्सा बुरी तरह क्षतिग्रस्त हो गया।
शुरुआत में पिकअप चालक ने गलती मानी। मंत्री की बेटी को भरोसा दिया कि जो भी नुकसान होगा, वे भरपाई करेंगे। लेकिन जब वर्कशॉप से रिपेयरिंग और नए स्पेयर पार्ट्स का एस्टीमेट 2.75 लाख रुपए आया तो आरोपी पक्ष के सुर बदल गए।
पिकअप पक्ष के राजकुमार नामक व्यक्ति ने हर्जाना देने से साफ इनकार कर दिया। उसने कहा कि छोटा-मोटा खर्चा होता तो दे देते। हम भी भाजपा कार्यकर्ता हैं, जो करना है कर लो, पुलिस केस करना है तो कर दो। वे अपनी पिकअप लेकर वर्कशॉप से चले गए।
अधिकारी का फेसबुक पोस्ट बना चर्चा का विषय
31 जुलाई को राजस्थान प्रशासनिक बेड़े में रिटायरमेंट का दिन रहा। शिक्षा निदेशक सीताराम जाट और राजस्थान लोक सेवा आयोग (आरपीएससी) के सचिव रामनिवास मेहता रिटायर हो गए। राज्य सरकार ने तुरंत आईएएस ललित कुमार को शिक्षा निदेशक और आशुतोष गुप्ता को आरपीएससी सचिव का अतिरिक्त प्रभार सौंप दिया।
लेकिन इस रिटायरमेंट वीक में सबसे ज्यादा सुर्खियां बटोरीं आईपीएस किशन सहाय मीणा के एक फेसबुक पोस्ट ने। रिटायरमेंट से ठीक पहले उन्होंने सोशल मीडिया पर अपील लिखी-मैं अभी तक सरकारी मकान में रहता आया हूं। जयपुर में मेरा अपना कोई मकान नहीं है। रिटायरमेंट के बाद रहने के लिए जयपुर के जगतपुरा इलाके में किराए पर 3 बीएचके मकान की जरूरत है।
एक शीर्ष अधिकारी ने अपने जीवन के 30-35 साल महत्वपूर्ण पदों पर बिताए हैं। रिटायरमेंट के दिन किराए के मकान के लिए सोशल मीडिया पर गुहार लगाना अलग-अलग संदेश देता है। कारण चाहे जो भी हो, आईपीएस किशन सहाय की इस बेबाक पोस्ट ने यह साबित कर दिया कि सादगी आज भी नौकरशाही में है।
अगले सप्ताह फिर मिलेंगे नई चिट्ठी के साथ!
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