5 यूनिवर्सिटीज में एक भी परमानेंट टीचर नहीं, बन रहीं सिर्फ डिग्रियों की फैक्ट्री
पांच प्वाइंट्स में समझे पूरा मामला
- राजस्थान में उच्च शिक्षा का ढांचा इस समय सबसे बुरे दौर से गुजर रहा।
- प्रदेश में 5 यूनिवर्सिटीज में शुरुआत से अब तक एक भी स्थायी शिक्षक नहीं।
- पांचों विश्वविद्यालयों में कुल 186 पद स्वीकृत, लेकिन शिक्षकों की संख्या जीरो।
- प्रदेश के 15 विश्वविद्यालयों में शिक्षकों के लगभग 65 फीसदी चल रहे पद खाली।
- प्रदेश की सबसे पुरानी राजस्थान यूनिवर्सिटी में सबसे ज्यादा 560 पद खाली।
Jaipur: राजस्थान में उच्च शिक्षा का ढांचा इस समय अपने सबसे बुरे दौर से गुजर रहा है। हर साल हजारों युवाओं को दीक्षांत समारोहों में बड़ी-बड़ी डिग्रियां तो बांटी जा रही हैं, लेकिन हकीकत यह है कि इन डिग्रियों को दिलाने के लिए विश्वविद्यालयों में स्थायी शिक्षक ही नहीं हैं।
प्रदेश के 15 सरकारी विश्वविद्यालयों में शिक्षकों की भारी कमी ने उच्च शिक्षा की गुणवत्ता पर एक बहुत बड़ा प्रश्नचिह्न लगा दिया है। स्थिति इस कदर भयावह हो चुकी है कि राज्य के विश्वविद्यालयों में शिक्षकों के लगभग 65 फीसदी पद खाली पड़े हैं।
सबसे हैरान करने वाली बात तो यह है कि प्रदेश के 5 सरकारी विश्वविद्यालयों में छात्रों को पढ़ाने के लिए एक भी स्थायी शिक्षक (परमानेंट फैकल्टी) नहीं है।
1593 पद सालों से खाली
उच्च शिक्षा विभाग के अपने आंकड़े बताते हैं कि इन 15 राजकीय विश्वविद्यालयों में शिक्षकों के कुल 2,432 पद स्वीकृत हैं। लेकिन इनमें से केवल 839 पदों पर ही नियमित नियुक्तियां हैं, जबकि शेष 1,593 पद सालों से खाली धूल फांक रहे हैं।
ऐसे में यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि बिना गुरुओं के उच्च शिक्षा की गुणवत्ता और शोध कार्य (रिसर्च) का चक्का आखिर कैसे घूम रहा है?
14 साल में नहीं मिला एक भी स्थायी शिक्षक
राजस्थान में उच्च शिक्षा की बदहाली का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि वर्ष 2012 में स्थापित किए गए चार राजकीय विश्वविद्यालयों को खुले हुए 14 साल बीत चुके हैं, लेकिन आज तक वहां एक भी स्थायी शिक्षक नियुक्त नहीं किया जा सका है। ये तमाम विश्वविद्यालय पूरी तरह से गेस्ट फैकल्टी के भरोसे भगवान भरोसे चल रहे हैं।
जिन पांच विश्वविद्यालयों में शून्य स्थायी शिक्षक हैं, उनकी सूची इस प्रकार है:
राजऋषि भर्तृहरि मत्स्य विश्वविद्यालय (अलवर): वर्ष 2012 में स्थापना हुई, यहां स्वीकृत 30 पदों में से सभी खाली हैं।
पंडित दीनदयाल उपाध्याय शेखावाटी विश्वविद्यालय (सीकर): 2012 में खुले इस विश्वविद्यालय में 32 पद स्वीकृत हैं, लेकिन कार्यरत शिक्षकों की संख्या शून्य है।
महाराजा सूरजमल बृज विश्वविद्यालय (भरतपुर): यहां भी 2012 से अब तक स्वीकृत सभी 30 पदों पर ताला लटका है।
गोविंद गुरु जनजातीय विश्वविद्यालय (बांसवाड़ा): आदिवासी क्षेत्र के इस बड़े विश्वविद्यालय में 54 पद स्वीकृत हैं, पर स्थायी शिक्षक एक भी नहीं।
डॉ. भीमराव आंबेडकर विधि विश्वविद्यालय (जयपुर): कानून की शिक्षा देने के लिए साल 2019 में स्थापित इस लॉ यूनिवर्सिटी में भी सभी 40 पद रिक्त पड़े हैं।
इन पांचों विश्वविद्यालयों को मिलाकर कुल 186 पद स्वीकृत हैं, लेकिन धरातल पर शिक्षकों की संख्या जीरो है। कानून से लेकर जनजातीय विकास की बातें करने वाले इन संस्थानों में स्थायी शिक्षकों का न होना युवाओं के भविष्य के साथ सीधे तौर पर खिलवाड़ है।
राजस्थान यूनिवर्सिटी भी बीमार, सबसे ज्यादा 560 पद खाली
यह मर्ज सिर्फ नए या छोटे विश्वविद्यालयों तक सीमित नहीं है, बल्कि राजस्थान की सबसे पुरानी और गौरवमयी राजस्थान यूनिवर्सिटी (RU) भी इसी बीमारी से कराह रही है। प्रदेश के इस सबसे बड़े शिक्षा केंद्र में सबसे ज्यादा 560 शिक्षकों के पद खाली पड़े हैं।
वहीं जोधपुर के जय नारायण व्यास यूनिवर्सिटी में 304 और अजमेर की एमडीएस (MDS) यूनिवर्सिटी में 150 पद रिक्त हैं। इससे साफ है कि पूरा उच्च शिक्षा तंत्र अंदर से खोखला हो चुका है।
राजस्थान यूनिवर्सिटी टीचर्स एसोसिएशन (रूटा) के अध्यक्ष नवीन शर्मा का कहना है कि 2013 और 2018 की नियुक्ति वालों के अब तक एक भी प्रमोशन नहीं हुए हैं। यूजीसी नियमों के तहत हर चार साल में प्रमोशन होना जरुरी है। यदि समय पर प्रमोशन होंगे तो प्रांरभिक स्टेज पर पद रिक्त होंगे।
दावे बनाम हकीकत
जहां एक तरफ विशेषज्ञ कह रहे हैं कि स्थायी शिक्षकों के बिना रिसर्च और पढ़ाई की गुणवत्ता खत्म हो रही है, वहीं उच्च शिक्षा विभाग का अजीबोगरीब दावा है कि शिक्षण कार्य बिल्कुल प्रभावित नहीं हो रहा है।
विभाग का कहना है कि वे विद्या संबल योजना और अतिथि शिक्षकों के दम पर व्यवस्था को बखूबी संभाल रहे हैं।
राजभवन नाराज, राज्यपाल ने उठाए सवाल
विश्वविद्यालयों के इस हाल बेहाल पर राज्यपाल हरिभाऊ बागड़े लगातार अपनी नाराजगी जाहिर कर चुके हैं। राज्यपाल ने हाल ही में कई मौकों पर कड़े तेवर दिखाते हुए पूछा था कि ऐसे विश्वविद्यालयों को चलाने का क्या मतलब, जो उच्च शिक्षा के मूल मकसद को ही पूरा न कर सकें?
राज्यपाल ने केवल शिक्षकों की कमी पर ही नहीं, बल्कि विश्वविद्यालयों के भीतर से आने वाली भ्रष्टाचार की शिकायतों पर भी कई बार गहरी चिंता जताई है। राजभवन के बार-बार टोकने के बावजूद राज्य सरकार और शिक्षा विभाग के कानों पर जूं नहीं रेंग रही है।
कैसे सुधरेगा हाल, जब सब कुछ है बेहाल?
विशेषज्ञों का स्पष्ट मानना है कि गेस्ट फैकल्टी या संविदा पर रखे गए शिक्षक किसी भी विश्वविद्यालय का दीर्घकालिक आधार नहीं हो सकते। एक स्थायी शिक्षक विश्वविद्यालय के शोध, नवाचार और छात्रों के मार्गदर्शन के लिए जवाबदेह होता है।
जब तक सरकार इन 1593 खाली पदों पर स्थायी भर्ती प्रक्रिया शुरू नहीं करती, तब तक राजस्थान के युवाओं को केवल कागजी डिग्रियां ही मिलती रहेंगी, ज्ञान और कौशल नहीं। अब देखना यह है कि सो रहा शिक्षा विभाग इस गंभीर संकट पर कब जागता है।
होनी चाहिए गाइडलाइन की पालना
सालों पहले एक कमेटी ने 25 से 35 छात्रों पर एक शिक्षक की जरुरत बताई थी। लेकिन अभी 60-70 छात्रों पर एक शिक्षक है। यह स्थिति राजस्थान यूनिवर्सिटी की हैं तो छोटी यूनिवर्सिटीज के हालात का अंदाजा लगाना सहज ही है। सरकार और यूनिवर्सिटीज को यूजीसी की गाइडलाइंस की पालना में समयबद्ध प्रमोशन और नई भर्तियां करनी चाहिएं, अन्यथा राजस्थान की उच्च शिक्षा के हालात सुधरने वाले नहीं हैं।
नवीन शर्मा, अध्यक्ष, राजस्थान यूनिवर्सिटी टीचर्स एसोसिएशन (रूटा)
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