बघेरे और इंसानों में टकराव : अपने ही घर से हो रहे हैं बेघर, लगातार मौतों से चिंता
योगेन्द्र योगी @ जयपुर
सरकार से यह उम्मीद की जाती है कि न सिर्फ प्रदेश के आम लोग, बल्कि मूक जीव-जंतुओं की समस्याओं का भी समाधान होगा। खासकर प्रदेश में जीव-जंतुओं के प्रबंधन में सुधार दिखाई देगा। लेकिन, इस मामले में राजस्थान का वन एवं पर्यावरण विभाग विफल दिखाई देता है।
प्रदेश में बघेरों (तेंदुए) और इंसानों का बढ़ता संघर्ष इस बात का प्रमाण है कि भारी—भरकम वेतन और सुविधाएं प्राप्त करने वाले वन विभाग के अफसरों के पास दूरदृष्टि का अभाव है। हालात बद से बदतर हो गए हैं।
नौ जिलों में बघेरों व इंसानों का टकराव बढ़ा
बघेरों और इंसानी टकराव की समस्या इतनी बढ़ गई है कि अब प्रदेश के 9 जिलों में यह विकराल रूप धारण कर चुकी है। राजस्थान में बघेरों के हमले मुख्य रूप से उदयपुर, सवाई माधोपुर (रणथंभौर), जयपुर, राजसमंद, कोटा, दौसा, भीलवाड़ा, करौली और बांसवाड़ा जैसे जिलों में देखने को मिले हैं, जहां आबादी वाले इलाकों और खेतों में पैंथर घुसपैठ कर रहे हैं। ग्रामीणों में दहशत है। इस पर वन विभाग रेस्क्यू ऑपरेशन चला कर खानापूर्ति कर रहा है।
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वर्ष 2023 में राजस्थान में 100 तेंदुए मारे गए
वन्यजीव संरक्षण सोसायटी ऑफ इंडिया के आंकड़ों के अनुसार 2023 में राजस्थान में करीब 100 बघेरे मारे गए, जो देश में कुल मौतों (535) का एक बड़ा हिस्सा था। ये मौतें मानव-वन्यजीव संघर्ष, अवैध शिकार, ट्रेन और सड़क दुर्घटनाओं जैसे कारणों से हुई हैं।
हालांकि, राजस्थान में तेंदुओं की आबादी बढ़ने के भी संकेत मिले हैं, लेकिन मौतें चिंता का विषय हैं। वर्ष 2022 तक के आंकड़ों के मुताबिक पिछले 6 सालों में 253 पैंथर मारे गए, जिनमें से 14 लोगों द्वारा घेरकर मारे गए और कई वाहनों की चपेट में आए, क्योंकि वे जंगल में बढ़ते मानवीय दबाव से भोजन की तलाश में आबादी में घुसते थे।
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जहां एक तरफ तेंदुए की आबादी (कुंभलगढ़ में 55 बघेरे) बढ़ रही है, वहीं उनकी मौतें भी बढ़ रही हैं, जो संरक्षण के प्रयासों में कमी और बेहतर प्रबंधन की ज़रूरत को दर्शाती हैं। खासकर जयपुर जैसे शहरों के आसपास। राजस्थान में इस समय कुल 925 तेंदुए हैं। इनमें से राजधानी जयपुर में ही 145 हैं। यह संख्या वन्यजीवों की समृद्धि की एक तस्वीर तो दिखाती है, लेकिन इनके संरक्षण और प्रोटेक्शन के मोर्चे पर कई सवाल भी खड़े करती है।
भविष्य में और बढ़ेगा पैथर-मानव का संघर्ष
वन विभाग के आंकड़ों के अनुसार प्रदेश के 24 संरक्षित क्षेत्रों में 578 बघेरे हैं, जबकि संरक्षित क्षेत्र के बाहर 41 अन्य क्षेत्रों में 347 बघेरों की उपस्थिति दर्ज की गई है। इसका सीधा संकेत है कि बघेरे अब केवल जंगलों तक सीमित नहीं रहे, बल्कि शहरी और अर्ध-शहरी इलाकों तक पहुँच चुके हैं।
जयपुर सहित राज्य के 30 से अधिक जिलों में बघेरों की उपस्थिति दर्ज की गई है, जो भविष्य में मानव-तेंदुआ संघर्ष को और बढ़ा सकती है। गोगुंदा, उदयपुर से लेकर जयपुर के आमागढ़, नाहरगढ़ और झालाना तक तेंदुओं और इंसानों के बीच संघर्ष की घटनाएं लगातार बढ़ रही हैं।
इसका प्रमुख कारण है- कमजोर प्रे-बेस (शिकार की उपलब्धता) और जल प्रबंधन की कमी। गर्मी के दिनों में जल स्रोत सूखने पर तेंदुए आबादी वाले इलाकों की ओर रुख कर लेते हैं, जिससे टकराव की घटनाएं बढ़ जाती हैं।
मंत्री के बंगले तक पहुंच गया था बघेरा
पिछले वर्ष राजधानी जयपुर में लेपर्ड के आबादी में आने की एक दर्जन से अधिक घटनाएं हुई हैं। रिहायशी इलाकों में इस तरह जंगली हिंसक जानवरों की एंट्री से अब राजधानी के लोगों में भय नजर आने लगा है।
जयपुर के पूर्व सांसद रामचरण बोहरा की दुर्गापुरा स्थित लाल बहादुर नगर कॉलोनी में तेदुंए ने दस्तक देकर हड़कंप मचा दिया था।
राजधानी जयपुर के सबसे पॉश इलाके सिविल लाइन में तेंदुए ने खलबली मचा दी थी। यहां तेंदुआ जल संसाधन मंत्री सुरेश सिंह रावत के सरकारी बंगले में घुस गया। सूचना पर वन विभाग की रेेस्क्यू टीम मौके पर पहुंची, जहां लेपर्ड को 1 घंटे की मशक्कत के बाद ट्रेंकुलाइज कर पकड़ लिया गया।
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झालाना, आमागढ़, नाहरगढ़, जयपुर उत्तर, डीसीएफ जयपुर और जमवारामगढ़ में कुल 145 तेंदुए पाए जाते हैं। इसके अलावा यहां 347 हायना, 145 जैकाल, 27 भेड़िए, और एक भालू सहित कुल 10,741 वन्यजीवों की मौजूदगी है। जयपुर में झालाना और आमागढ़ में दो लेपर्ड रिजर्व स्थापित हैं, जबकि नाहरगढ़ में तीसरे की तैयारी चल रही है। हालांकि, इन क्षेत्रों में शिकार और पानी की कमी है, जो कि चिंताजनक है।
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बघेरे और इंसानों में टकराव, बुलानी पड़ी सेना
दो साल पहले उदयपुर जिले में हालात इस कदर बिगड़ गए कि आदमखोर बने तेंदुए को मारने के लिए सेना को बुलाना पड़ गया। अक्टूबर 2024 में उदयपुर 8 लोगों को मौत के घाट उतारने वाले आदमखोर तेंदुए को अंतत: बंदूक की गोली का शिकार होना पड़ा।
बताया जाता है कि तेंदुए ने गोगुंदा इलाके में आतंक मचा रखा था। इस आदमखोर तेंदुए को 4 गोली मारकर ढेर किया गया। पिछले 4 साल में यहां 20 पैंथर की मौत हो चुकी है। इसीत तरह साल 2021 में राजस्थान के सवाई माधोपुर जिले के बोली क्षेत्र में बघेरा ने दो महिलाओं इसमें गुडला निवासी राजंती बेरवा व शांति बेरवा पर हमला कर दिया था। इस हमले में दोनों महिलाएं की मौत हो गई थी।
यहां तेंदुए और इंसान में है दोस्ती
पश्चिमी राजस्थान का सबसे बड़ा जवाई डैम जवाई पैंथर कंजर्वेशन एरिया के तेंदुए दुनिया में सबसे अनूठे और अनोखे हैं, क्योंकि यह इंसानों के बीच रहते हैं। जवाई लेपर्ड एरिया एक मात्र ऐसा क्षेत्र है जहां आज तक लेपर्ड ने इंसानों पर हमला नहीं किया है।
पाली जिले के सुमेरपुर के पास करीब 20 गांव ऐसे हैं, जहां तेंदुए की 50 फैमिली हैं। इस कारण इंसान भी इनके संरक्षण में लगे हुए हैं। इस एरिया को कुछ सालों पहले जवाई पैंथर कंजर्वेशन रिजर्व घोषित किया गया था। यहां कई सालों से इंसान और पैंथर एक-दूसरे के नजदीक रह रहे हैं और आपसी सामंजस्य बिठा चुके हैं।
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पायलट प्रोजेक्ट पर काम होना आवश्यक
पिछले कुछ सालों में राजस्थान में पैंथरों की संख्या में इजाफा होने से उनके मूवमेंट और आपसी संघर्ष की घटनाएं भी बढ़ रही हैं। वन्यजीव विशेषज्ञों के अनुसार हाल ही में पैंथरों की नस्ल में वृद्धि हुई है और नए शावक अब अपने इलाके तय करने की प्रक्रिया में हैं।
इसी प्रक्रिया में जब दो युवा पेंथर एक ही क्षेत्र को अपना मानते हैं, तो उनके बीच वर्चस्व की टकराव शुरू हो जाती है, जो कई बार घातक साबित होती है।
इसके लिए एक्सपर्ट कमेटी का गठन आवश्यक है। योजना में देरी होने पर यह सह-अस्तित्व दरार में बदल सकता है, जिससे दोनों पक्षों के लिए समस्याएं उत्पन्न हो सकती हैं। वन्यजीवों की समृद्धि और जैव विविधता को बनाए रखना है, तो इसके लिए एक ठोस और प्रभावी प्रबंधन योजना की आवश्यकता है। अन्यथा, यह अनोखा सह-अस्तित्व खतरे में पड़ सकता है।