जयपुर के अपोलो एनिमल ट्रस्ट में करोड़ों के घोटाले का आरोप, हाईकोर्ट ने ACB को दिए नए जांच के आदेश

Mukesh Sharma | Oct 15, 2026, 19:22 IST
अपोलो एनिमल मेडिकल ग्रुप ट्रस्ट
राजस्थान हाईकोर्ट ने अपोलो एनिमल मेडिकल ग्रुप ट्रस्ट के साथ जुड़े वित्तीय घोटाले की गंभीरता को देखते हुए नई जांच का आदेश दिया है। न्यायालय ने भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो को यह निर्देश देते हुए कहा है कि वह इस मामले की जांच में इनकम टैक्स और प्रवर्तन निदेशालय से सहयोग ले।

राजस्थान हाईकोर्ट ने जयपुर के अपोलो एनिमल मेडिकल ग्रुप ट्रस्ट से जुड़े कथित वित्तीय घोटाले की जांच दोबारा गहराई से करने के आदेश दिए हैं। अदालत ने भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो (ACB) को इनकम टैक्स विभाग और प्रवर्तन निदेशालय (ED) की मदद लेकर संदिग्ध लेन-देन और करोड़ों रुपये की कथित गड़बड़ियों की जांच करने को कहा है। जरूरत पड़ने पर स्वतंत्र फॉरेंसिक ऑडिट भी कराया जा सकेगा।



जस्टिस उमाशंकर व्यास की अदालत ने यह आदेश ट्रस्ट के संस्थापक ट्रस्टी डॉ. राज ईश्वर खरे की याचिका पर दिया। अदालत ने ACB कोर्ट के उस आदेश को रद्द कर दिया, जिसमें मामले में अग्रिम जांच कराने की मांग खारिज कर दी गई थी। हाईकोर्ट ने जांच ASP स्तर के अधिकारी से कराने के निर्देश भी दिए हैं।



2019 में दर्ज हुई थी शिकायत

डॉ. राज ईश्वर खरे NRI हैं और अपोलो एनिमल मेडिकल ग्रुप ट्रस्ट के संस्थापक ट्रस्टी हैं। यह ट्रस्ट राजस्थान पब्लिक ट्रस्ट एक्ट, 1959 के तहत पंजीकृत है। 93 वर्षीय डॉ. खरे ने 12 फरवरी 2019 को ACB में शिकायत दर्ज कराई थी।



शिकायत में ट्रस्ट की संपत्तियों के कथित दुरुपयोग, गबन और संदिग्ध वित्तीय लेन-देन के आरोप लगाए गए थे। आरोप था कि देवस्थान विभाग के तत्कालीन आयुक्त और सहायक आयुक्त की मिलीभगत से दूल्हेराम मीणा और अन्य लोगों को कथित तौर पर अवैध तरीके से ट्रस्टी बनाया गया। इसके बाद ट्रस्ट की करोड़ों रुपये की संपत्तियों के इस्तेमाल और वित्तीय लेन-देन में अनियमितताएं हुईं।



शिकायत की शुरुआती जांच के बाद ACB ने 8 सितंबर 2020 को FIR दर्ज की। इसमें दूल्हेराम मीणा, सुनीता मीणा, हर्षवर्धन मीणा, शकुंतला मीणा, देवस्थान विभाग के अधिकारियों और ट्रस्ट के चार्टर्ड अकाउंटेंट को आरोपी बनाया गया। FIR में भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम और IPC की धारा 420, 406, 467, 468, 471 और 120-B के तहत आरोप दर्ज किए गए थे।



जांच अधिकारी बदला तो पेश कर दी क्लोजर रिपोर्ट

याचिकाकर्ता का आरोप था कि जांच अधिकारी बदले जाने के बाद मामले की निष्पक्ष जांच नहीं हुई। इसके बाद ACB कोर्ट नंबर-1, जयपुर में नेगेटिव फाइनल रिपोर्ट यानी क्लोजर रिपोर्ट पेश कर दी गई।



इस रिपोर्ट के खिलाफ डॉ. खरे ने करीब 50 पेज का प्रतिवेदन पेश किया और मामले में अग्रिम जांच की मांग की। हालांकि, ACB कोर्ट ने 22 जुलाई 2026 को उनकी अर्जी खारिज कर दी। इसके बाद उन्होंने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया।



जमीन, किराए और फीस में गड़बड़ी के आरोप

याचिकाकर्ता की ओर से एडवोकेट स्वदीप सिंह होरा और एम.सी. गुप्ता ने अदालत में कई वित्तीय अनियमितताओं का मुद्दा उठाया। उन्होंने आरोप लगाया कि मुख्य आरोपी दूल्हेराम मीणा ने अपने और परिजनों के नाम पर कृषि भूमि खरीदी और फिर बिना जरूरत के उसे ट्रस्ट को महंगे किराए पर दे दिया। याचिकाकर्ता के अनुसार, इससे लाखों रुपये का कथित अनुचित फायदा लिया गया।



वकीलों ने यह भी दलील दी कि अनुसूचित जनजाति से संबंधित होने के कारण दूल्हेराम मीणा के लिए संबंधित जमीन को लीज पर देने की कानूनी स्थिति की जांच जरूरी है।




याचिका में बताया गया कि जांच के दौरान दूल्हेराम के घर से 7.50 लाख रुपये नकद बरामद हुए थे। यह भी आरोप लगाया गया कि वह ट्रस्ट को 2 करोड़ 65 लाख रुपये देने की बात कह रहा था। याचिकाकर्ता ने इसे बड़े नकद लेन-देन से जुड़ा संदिग्ध मामला बताया। ट्रस्ट के तहत चल रहे कॉलेज की छात्रों से ली गई फीस के कथित गबन और फर्जी दस्तावेज तैयार करने के आरोप भी लगाए गए हैं। ये सभी आरोप हैं, जिनकी जांच की जानी है।




ED और इनकम टैक्स की मदद पर जोर

हाईकोर्ट ने कहा कि उसने 23 जनवरी 2024 को ही ACB को इनकम टैक्स विभाग और ED से सहयोग लेकर गहन जांच करने के निर्देश दिए थे। लेकिन अदालत के मुताबिक, DSP स्तर के जांच अधिकारी ने इस दिशा में विशेष प्रयास नहीं किए। रिपोर्ट में केवल यह कहा गया कि दोनों विभागों से उचित सहयोग नहीं मिला।




अदालत ने माना कि करोड़ों रुपये के कथित वित्तीय घोटाले और खातों में गंभीर अनियमितताओं के आरोपों की निष्पक्ष और गहन जांच जरूरी है। महत्वपूर्ण तथ्यों पर पर्याप्त विचार किए बिना अग्रिम जांच की मांग खारिज करना उचित नहीं था।



अब ACB को ASP स्तर के अधिकारी से जांच करानी होगी। ED और इनकम टैक्स विभाग से सहयोग लिया जाएगा। यदि इन विभागों से मदद नहीं मिलती है, तो जांच अधिकारी स्वतंत्र फॉरेंसिक ऑडिट भी करवा सकेगा। इससे ट्रस्ट के खातों, संपत्तियों और संदिग्ध लेन-देन की पड़ताल की जा सकेगी।

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