बेशकीमती सरकारी जमीन का चुपचाप बंटवारा, एक नोटिस से खुला अफसरों का सीक्रेट गेम

Mukesh Sharma | Jul 15, 2026, 19:01 IST
बेशकीमती सरकारी जमीन
जयपुर में जेएलएन मार्ग पर डब्ल्यूटीपी के सामने बेशकीमती सरकारी जमीन है। इस पर अभी पार्क बना हुआ है। अफसरों की मिलीभगत से इस जमीन का चुपचाप सैटलमेंट हो गया। सरकार को अंधेरे में रखा गया। साजिश का पता चलने पर सरकार ने अब हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाया है।

जयपुर के जेएलएन मार्ग की 23,600 वर्गगज सरकारी जमीन को हड़पने का खेल बरसों से चल रहा है। इसकी साजिश में जेडीए के साथ ही लोक अदालत तक शामिल हैं।



साजिश का पता चलने पर सरकार में हड़कंप है। आनन-फानन में सरकार राजस्थान हाई कोर्ट की शरण में पहुंची। सरकार ने कोर्ट में पूरे घटनाक्रम का खुलासा किया है।



सरकार ने स्पष्ट कहा है कि जमीन हड़पने की साजिश में न केवल जेडीए अफसर, बल्कि नेशनल लोक अदालत की भी मिलीभगत रही है।



इस मामले की गंभीरता का अंदाजा इस बात से समझा जा सकता है। हाई कोर्ट ने जमीन से जुड़ी सभी फाइलों और दस्तावेजों को अपनी कस्टडी में रखने के निर्देश दिए हैं। सुनवाई के लिए 20 जुलाई की तारीख तय की है।



सरकारी जमींन


ऐसे शुरु हुआ जमीन हड़पने का खेल:

दरअसल, सरकार ने 26 जुलाई 1968 को बजाज नगर से सांगानेर एयरपोर्ट तक जमीन अधिग्रहण की थी। लेकिन गृह निर्माण सहकारी समितियों ने इन जमीनों पर आवासीय कॉलोनियां बसा दीं।



सरकार ने 16 अक्टूबर 1981 की अधिसूचना से जमीन अधिग्रहण वापस ले लिया। अतिरिक्त कलक्टर (दक्षिण) ने तहसीलदार की रिपोर्ट के आधार पर जय जवान गृह निर्माण सहकारी समिति की स्कीम नंबर-3 में सिर्फ 103 भूखंडों पर निर्माण मानकर रुपांतरण करने को कहा था।



22 फरवरी 1986 को रुपांतरण आदेश होने से पहले जेडीए ने आवासीय योजनाओं की नए सिरे से प्लानिंग करना तय किया। इसके लिए जेएलएन मार्ग से सटी स्कीम वाली समितियों को मीटिंग के लिए बुलाया।



जेडीए ने जेएलएन मार्ग पर 200 फुट जमीन संस्थागत व बड़े व्यावसायिक उपयोग के लिए सरेंडर करने की शर्त रखी। इसके आधार पर गृह निर्माण सहकारी समितियों की आवासीय योजनाओं को मंजूरी देना स्वीकार कर लिया।



सरकार ने इसी के अनुरुप मास्टर प्लान में संशोधन भी कर दिया। इससे पहले सरकार 200 फुट जमीन छोड़ने के आदेश भी जारी कर चुकी थी। लेकिन जय जवान गृह निर्माण सहकारी समिति ने 200 फुट जमीन की सरेंडर डीड पेश नहीं की।



समिति इस 200 फुट जमीन की स्ट्रिप का व्यावसायिक उपयोग की मंजूरी देने के लिए जोर देती रही। लेकिन, तब तक न केवल 200 फुट स्ट्रिप की जमीन बल्कि योजना की पूरी जमीन जेडीए के नाम दर्ज हो चुकी थी।



जमीन अधिग्रहण वापस


ग्रीन फायर हॉस्पिटल को आवंटन

इस बीच, ब्यूरो ऑफ इन्वेस्टमेंट प्रमोशन की मंजूरी के आधार पर सरकार का निर्देश आया। जेडीए ने 28 अप्रैल 2003 को ग्रीन फायर हॉस्पिटल को जमीन आंवटित कर दी।



इसमें जेएलएन मार्ग पर आदिनाथ नगर की 17,433 वर्गगज तथा जय जवान गृह निर्माण सहकारी समिति की स्कीम नंबर-3 की 6200 वर्गगज जमीन शामिल थी। यह आवंटन रिजर्व प्राइस की 60 फीसदी कीमत पर हुआ।



एक अक्टूबर 2003 को 23,633 वर्गगज जमीन की लीजडीड हुई। ग्रीन फायर हॉस्पिटल ने अपोलो अस्पताल के साथ मिलकर 200 बैड का अस्पताल बनाने का एमओयू पेश किया था। यह एमओयू 18 महीने के लिए ही मान्य था।



जमीन अधिग्रहण


ऐसे हुआ आवंटन हुआ रद्द:

ग्रीन फायर हॉस्पिटल के लिए जमीन आवंटन की कुछ शर्तें थीं। इन शर्तों का उल्लंघन होने पर जेडीए ने 24 जनवरी 2006 को आवंटन रद्ध कर दिया।



ग्रीन फायर हॉस्टिपल ने आवंटन रद्ध करने को जेडीए ट्रिब्यूनल में चुनौती दी। उधर, जय जवान गृह निर्माण सहकारी समिति ने संभागीय आयुक्त के यहां चुनौती दे रखी थी। इसमें स्कीम नंबर-3 की जमीन को वापस लेने के जेडीए आदेश और ग्रीन फायर हॉस्पिटल को आवंटन के साथ ही 200 फुट जमीन की स्ट्रिप सरेंडर करने के आदेश को शामिल किया गया।



समिति के साथ ही कोमलचंद पाटनी व अरुण चतुर्वेदी ने ग्रीनफायर हॉस्पिटल को जमीन आवंटन को हाई कोर्ट में चुनौती दी। दूसरी ओर रतनप्रभा जैन ने आवंटन को जेडीए ट्रिब्यूनल में चुनौती दी। हाई कोर्ट ने 2005 में कोमलचंद पाटनी व अरुण चतुर्वेदी की याचिका खारिज कर दी।



मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा तो वहां कुछ अपील खारिज हो गई थी। समिति की अपील पर सुप्रीम कोर्ट ने हाई कोर्ट में मामले में दोबारा सुनवाई करने व समिति को संभागीय आयुक्त के समक्ष लंबित अपने मामले को वापस लेने को कहा था।



जमीन अधिग्रहण


इसके बाद 24 जनवरी 2006 को रतनप्रभा जैन की अपील पर ग्रीन फायर हॉस्पिटल को जमीन आवंटन के 9 सितंबर 2003 व 29 मई 2003 के आदेश रद्ध हो गए।



ग्रीन फायर हॉस्पिटल की याचिका पर हाई कोर्ट ने 24 जनवरी 2006 के आवंटन निरस्त करने के आदेश को रद्ध कर दिया। रतनप्रभा जैन ने इस आदेश को खंडपीठ में चुनौती दी



10 फरवरी 2015 को हाई कोर्ट ने समिति की अपील खारिज कर दी। कोर्ट ने समिति को जमीन वापस लेने के खिलाफ उचित कानूनी फोरम में जाने की छूट दी।



राजस्थान सरकार


संभागीय आयुक्त ने कर दिया खेल:

रोचक बात यह कि संभागीय आयुक्त ने 13 दिसंबर 2015 को समिति की अपील मंजूर कर ली। आयुक्त ने स्कीम नंबर-तीन की जमीन वापस लेने तथा 90 बी करने के जेडीए के 17 अप्रैल 2002 के आदेश रद्ध् कर दिए।



इस आदेश के खिलाफ जेडीए, प्राधिकृत अधिकारी व तहसीलदार ने रेवेन्यू बोर्ड में चुनौती दी। 22 अप्रैल 2016 को बोर्ड ने संभागीय आयुक्त के आदेश पर रोक लगा दी। साथ ही राजस्व रिकार्ड में यथास्थिति बनाए रखने के आदेश दिए।



फिर पहुंचे हाई कोर्ट:

जय जवान गृह निर्माण सहकारी समिति, जेडीए, रतनप्रभा जैन और ग्रीन फायर हॉस्पिटल की कई याचिकाएं हाईकोर्ट में लंबित चल रही थीं। कोर्ट ने रतनप्रभा जैन व ग्रीन फायर हॉस्पिटल की याचिकाओं को एक साथ कर दिया।



तीन दशक से ज्यादा समय से चल रही मुकदमेबाजी से परेशान पक्षकारों ने समझौता करने की मंशा जताई। लेकिन सभी मामलों में राज्य सरकार जरुरी पक्षकार है। कोई भी समझौता बिना सरकार की मंजूरी व मंशा के नहीं हो सकता।



रतनप्रभा जैन व ग्रीन फायर हॉस्पिटल व समिति को पता था कि सरकार ​मंजूरी नहीं देगी। इसलिए उन्होंने जेडीए की मिलीभगत से सरकार को सूचित किए बिना ही समझौते के आधार पर जमीन हड़पने की साजिश रची।



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जेडीए के जोन उपायुक्त की मिलीभगत:

समझौते की मंशा जताने पर हाईकोर्ट ने 10 अक्टूबर 2022 को मामले को हाई कोर्ट के मध्यस्थता केंद्र में भेजकर 90 दिन में रिपोर्ट देने के आदेश दिए।



निजी पक्षकारों ने 17 अगस्त 2023 को एक सैटलमेंट डीड पेश की​। जेडीए के वकील ने इसे जेडीए को भेजकर निर्णय लेने को लिखा।



जोन-4 के उपायुक्त ने 25 अगस्त 2023 को सैटलमेंट डीड पर जेडीसी की मंजूरी का जिक कर


अपने दस्तखत करके डीड वकील को भेज दी। 6 सितंबर 2023 को मध्यस्थता केंद्र ने सुनवाई की, फिर सैटलमेंट डीड हाई कोर्ट में पेश करने को कहा।



लोक अदालत में ऐसे चला खेल:

जमीन हड़पने वालों को पता था कि यदि सैटलमेंट पर कोर्ट में सुनवाई हुई तो कोर्ट राज्य सरकार से भी पूछेगा। सरकार आएगी तो उनकी साजिश पूरी नहीं होगी।



इसलिए उन्होंने मामले को 9 सितंबर 2023 को हुई लोक अदालत में पेश कर दिया। यहां रतनप्रभा जैन ने कहा कि वह ग्रीन फायर के आवंटन को चुनौती देने वाली अपनी याचिका को 17,433 वर्गगज की सीमा तक वापस ले लेगीं।



इसके चलते ग्रीन फायर के पक्ष में आदिनाथ नगर स्कीम की जमीन आवंटन का 9 सितंबर 2003 का आदेश बहाल हो जाएगा। उधर, जेडीए ने भी 24 दिसंबर 2015 के आवंटन रद्ध करने के आदेश को वापस लेना स्वीकार किया। साथ ही संशोधित लीज डीड जारी करने व जमीन का कब्जा ग्रीन फायर हॉस्पिटल को देने की हामी भर ली।



इस सैटलमेंट से रतनप्रभा जैन को 6,200 वर्गगज जमीन मिलने का रास्ता साफ हो गया। आपसी समझौते के आधार पर नेशनल लोक अदालत की बैंच नंबर-4 ने 9 सितंबर 2023 को अवार्ड पास कर दिया।



सरकार को भनक नहीं, लुट रही उसकी जमीन:

मजेदार बात यह है कि ऐसे मामले में राजस्थान सरकार एक अनिवार्य पक्ष है। इसलिए कोई भी समझौता सरकार की मंजूरी के बिना नहीं हो सकता। लेकिन, मध्यस्थता केंद्र और लोक अदालत में सरकार व जेडीए के प्रतिनिधियों की अनुपस्थिति में सैटलमेंट को मंजूरी दी गई।



दोनों ही जगहों पर सरकार व जेडीए के प्रतिनिधियों की व्यक्तिगत उपस्थित व दस्तखत अनिवार्य है। जेडीए अफसरों की मिलीभगत से न सरकार को सूचना ​दी गई और न ही जेडीए अफसर खुद उपस्थित रहे।



ऐसे खुली पूरी साजिश:

लोक अदालत के अवार्ड की पालना के लिए किसी भी पक्षकार ने सरकार में संपर्क नहीं किया और न ही उसे सूचना दी।



ग्रीन फायर हॉस्पिटल ने सीधे ही अवार्ड की पालना नहीं होने पर मई 2026 में अवमानना याचिका दायर कर दी। 7 मई को नोटिस होने पर राज्य सरकार को पहली बार पूरे खेल का पता चला।



सरकार ने अब इस मामले में लोक अदालत के अवार्ड को रद्ध करने के लिए याचिका दायर की है। सरकार ने मामले में सीबीआई जांच तक की मांग की है। मामले में अब अगली सुनवाई 20 जुलाई को होगी।



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