द्वेषपूर्ण निलंबन पर HC सख्त: IRS अफसर को प्रमोशन और 5 लाख हर्जाना देने के आदेश
समझें क्या है पूरा मामला
- आईआरएस अधिकारी का निलंबन रद्द, हाईकोर्ट का बड़ा फैसला
- केंद्र सरकार पर 5 लाख रुपए का हर्जाना लगाया
- कोर्ट ने निलंबन बढ़ाने को बताया मनमाना फैसला
- अधिकारी को प्रमोशन और सभी वित्तीय लाभ देने के आदेश
- राजस्थान हाई कोर्ट ने प्रशासनिक कार्रवाई पर उठाए सवाल
राजस्थान हाई कोर्ट ने आईआरएस मनमीत सिंह आहूवालिया के निलंबन (Suspension) के आदेश को रद्द कर दिया हैं। अदालत ने केंद्र सरकार को अधिकारी के प्रमोशन संबंधी बंद लिफाफे को खोलने,सभी बकाया वित्तीय लाभ देने के आदेश दिए हैं। कोर्ट ने केंद्र सरकार को पांच लाख रुपए बतौर हर्जाना देने को भी कहा है।
जस्टिस मुन्नुरी लक्ष्ण और जस्टिस अनुरुप सिंघी की बैंच ने विभागीय अधिकारियों की कार्रवाई की कड़े शब्दों में निंदा की है। अदालत ने माना है कि निलंबन की अवधि को आगे बढ़ाते रहना ना केवल प्रशासनिक शक्तियों का दुरुपयोग है बल्कि मनमाना और व्यक्तिगत द्वेष से प्रेरित था।
यह है मामला
2012 बैच के IRS अधिकारी (सीमा शुल्क एवं GST) मनमीत सिंह आहूवालिया का करियर बेदाग रहा है। उन्होंने विश्व व्यापार संगठन (WTO) जैसे अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भी भारत का प्रतिनिधित्व किया है।
विवाद की शुरुआत सितंबर 2019 में नई दिल्ली के मायापुरी स्थित सरकारी आवास में पड़ोसी के साथ एक निजी विवाद से हुई थी। जहाँ उनके परिवार पर गलत आरोप लगाए गए थे। इसके बाद उनके विभाग को शिकायतें दी जाती रहीं। शिकायतों के आधार पर प्रशासनिक कार्रवाई की एक श्रृंखला शुरू कर दी गई। अक्टूबर 2019 में उनका दिल्ली से जोधपुर तबादला कर दिया। मई 2021 में उन्हें निलंबित कर दिया गया। इसके बाद बिना कोई ठोस कारण बताए उनके निलंबन को दो बार बढ़ाया गया।
देरी से दी चार्जशीट
निलंबन अवधि के दौरान ही मार्च 2022 में जब विभागीय पदोन्नति समिति (DPC) की बैठक में आहूवालिया के प्रमोशन के फैसले को सीलबंद लिफाफे में रख दिया। उनसे जूनियर अधिकारियों को प्रमोशन दे दिया। अनिवार्य 90 दिनों की सीमा बीतने और निलंबन अवधि करीब-करीब पूरी होने के बाद अगस्त 2022 में उनके खिलाफ देर से आरोप-पत्र जारी किया।
उन्होंने इसके खिलाफ केंद्रीय प्रशासनिक अधिकरण (CAT) का रुख किया। ट्रिब्यूनल ने उनकी याचिका खारिज कर दी। इसके बाद उन्होंने राजस्थान हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाया था।
निजी झगड़ा था ना कि विभाग से संबंधित
हाईकोर्ट ने अपने फैसले में पाया कि मूल विवाद पूरी तरह से एक निजी आवासीय झगड़ा था। जिसका अधिकारी के प्रशासनिक कर्तव्यों से कोई लेना-देना नहीं था। अदालत ने कहा कि अधिकारी को निलंबित किए जाने के समय ही सभी आवश्यक रिपोर्ट उपलब्ध थीं। इसलिए 90 दिनों के भीतर आरोप-पत्र जारी किए बिना निलंबन बढ़ाना केवल उनके कैरियर को नुकसान पहुंचाने की दुर्भावना से किया गया काम था। पीठ ने कैट के फैसले को भी गलत माना। अदालत ने कहा कि ट्रिब्यूनल अधिकारियों के किए गए बड़े प्रशासनिक दुरुपयोग को पहचानने में विफल रहा था।
हाईकोर्ट ने याचिकाकर्ता के निलंबन बढ़ाने के 16 जुलाई,2021 व 13 जनवरी,2022 के आदेश रद्ध कर दिए हैं। अदालत ने याचिकाकर्ता को 90 दिनों के शुरुआती निलंबन के बाद से ही सेवा में बहाल मानने और विस्तारित अवधि का पूरा वेतन देने को कहा है। दो महीने के भीतर DPC का सीलबंद लिफाफा खोलकर आहूवालिया को उनके कनिष्ठों के प्रमोशन की तारीख से ही सभी लाभों के साथ प्रमोट करने और तीन महीने के भीतर पांच लाख रुपए बतौर हर्जाना देने के आदेश दिए हैं।
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