एनजीटी का बड़ा एक्शन, एपेक्स सर्कल से जगतपुरा ROB तक कमर्शियल एक्टिविटीज पर रोक
समझें क्या है पूरा मामला
- 200 फीट सड़क के लिए मिली रिजर्व फॉरेस्ट की जमीन पर धड़ल्ले से तने बड़े-बड़े शोरूम
- शर्तों को ठेंगा दिखाकर जेडीए और पीडब्ल्यूडी ने बदला रेवेन्यू रिकॉर्ड।
- क्षेत्रीय वन अधिकारी को मिले आदेश - सड़क के अलावा नहीं होगी कोई भी दूसरी गतिविधि
- तीन सदस्यीय जॉइंट कमेटी करेगी जांच, केंद्र और राजस्थान सरकार को चार हफ्ते का नोटिस ।
नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल ने जयपुर में एपेक्स सर्कल से जगतपुरा आरओबी तक सड़क के दोनों ओर चल रही व्यावयायिक गतिविधियों को फौरन बंद करने के आदेश दिए हैं।
एनजीटी ने संबंधित क्षेत्रीय वन अधिकारी व्यक्तिगत रूप से यह सुनिश्चित करने का निर्देश दिया है कि वन विभाग की उक्त जमीन का इस्तेमाल सड़क के अलावा अन्य किसी काम के लिए न हो।
ट्रिब्यूनल ने जमीन पर व्यावसायिक निर्माण करने पर केंद्र व राज्य सरकार से चार सप्ताह में जवाब मांगा है। ट्रिब्यूनल ने मामले में जांच के आदेश भी दिए हैं।
न्यायिक सदस्य न्यायमूर्ति शिव कुमार सिंह और विशेषज्ञ सदस्य सुधीर कुमार चतुर्वेदी की बैंच ने हेमराज मीणा की याचिका पर यह आदेश दिया। मामले की अगली सुनवाई 7 सितंबर, 2026 को होगी।
यह है मामला
याचिका के अनुसार, केंद्रीय पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय ने अप्रैल 2009 में चक धूला और बिन्दायका गांवों में 0.858 हेक्टेयर आरक्षित वन भूमि को डायवर्ट करने की मंजूरी दी थी।
यह मंजूरी एपेक्स अस्पताल से जगतपुरा रेलवे ओवरब्रिज तक 200 फीट चौड़ी सड़क के निर्माण के लिए दी गई थी।लेकिन,वहां केवल 160 फीट चौड़ी सड़क ही बनाई गई। जिससे डायवर्ट की गई वन भूमि का एक हिस्सा खाली रह गया।
आरक्षित वन भूमि को सड़क के लिए देने में शर्त थी कि जमीन का मालिकाना हक और प्रकृति नहीं बदलेगी। यानि राजस्व रिकार्ड में जमीन वन विभाग के नाम ही रहेगी और वन भूमि ही रहेगी।
इसके बावजूद राजस्व रिकॉर्ड में बची हुई खाली जमीन की कानूनी स्थिति को बदलकर जयपुर विकास प्राधिकरण (जेडीए) तथा सार्वजनिक निर्माण विभाग (पीडब्ल्यूडी) के नाम पर गैर मुमकिन सड़क के रूप में दर्ज कर दिया।
यह कदम जमीन के डायवर्जन की मूल शर्तों के खिलाफ है, जिसके तहत डायवर्जन के बाद भी जमीन का फॉरेस्ट स्टेटस (वन दर्जा) बरकरार रखना अनिवार्य था।
आरक्षित वन भूमि पर बन गए बड़े-बड़े शोरुम
याचिकाकर्ता का कहना है कि डायवर्ट की गई जमीन के कुछ हिस्सों का इस्तेमाल अब व्यावसायिक उपयोग में हो रहा है। यहां अनेक शोरुम व दुकानें बन गई हैं। यह वन (संरक्षण) अधिनियम, 1980 और उन शर्तों का सीधा उल्लंघन है जिनके तहत इस डायवर्जन को मंजूरी दी गई थी।
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