पंचायत-निकाय चुनाव नहीं, फिर भी तैयारी में फूंक दिए 30 करोड़, पैसों की बर्बादी पर उठे सवाल
News In Short
- राजस्थान में पंचायत-निकाय चुनाव की तैयारियों पर फूंके 30 करोड़।
- इन चुनावों के अक्टूबर से पहले कराए जाने की कोई उम्मीद नहीं।
- 15 अप्रैल तक चुनाव कराए जाने की हाई कोर्ट से तय थी डेडलाइन।
- सरकार इन चुनावों को अप्रैल में कराए जाने की इच्छुक नहीं थी।
- अब इन चुनावों के अक्टूबर के बाद होने की संभावना।
News In Detail
Jaipur: राजस्थान में पंचायत-निकाय चुनाव को लेकर नया विवाद खड़ा हो गया है। हैरानी की बात यह है कि राजस्थान निर्वाचन आयोग ने इन चुनावों की तैयारियों पर करोड़ों रुपए खर्च कर दिए हैं, जबकि ये चुनाव लटकते नजर आ रहे हैं। अब इनके अक्टूबर के बाद ही होने की संभावना है। सूत्रों के अनुसार इन चुनावों की तैयारियों पर अब तक 30 करोड़ रुपये से अधिक की भारी-भरकम राशि खर्च कर दी गई। यह तब खर्च हुआ, जब आयोग और सरकार को यह पता था कि चुनाव अप्रैल में नहीं होंगे।
कोर्ट के निर्देश और सरकार की ढुलमुल नीति
शुरुआत में हाई कोर्ट ने निर्देश दिए थे कि 15 अप्रैल तक चुनाव संपन्न करा लिए जाएं। इसी को आधार बनाकर निर्वाचन आयोग ने युद्ध स्तर पर तैयारियां शुरू कीं। हालांकि, अब राज्य सरकार चुनाव की तिथि आगे बढ़ाने के लिए कोर्ट में प्रार्थना पत्र देने की तैयारी कर रही है। जानकारों का कहना है कि सरकार चाहती तो इन खर्चों को समय रहते रोक सकती थी, लेकिन ऐसा नहीं किया गया। नतीजा यह है कि आयोग के गोदाम अब चुनाव सामग्री जैसे ईवीएम, स्याही और कागजों से भरे पड़े हैं।
कहां हुई फिजूलखर्ची?
चुनाव की तैयारियों में खर्च का गणित काफी चौंकाने वाला है। अन्य राज्यों से ईवीएम मंगाने के लिए 3 करोड़ रुपये का किराया दिया गया है। अब जब चुनाव नहीं हो रहे, तो इन्हें वापस भेजने में भी 3 करोड़ का अतिरिक्त बोझ पड़ेगा।
पहली बार कोरस (निजी एजेंसी) से 5.90 करोड़ की स्याही खरीदी गई। दावा है कि यह स्याही साल भर तक खराब नहीं होगी, जबकि सरकारी उपक्रम की स्याही की गारंटी केवल 6 महीने होती है। चुनाव के लिए 3 करोड़ रुपये के कागज खरीदे गए और मतदान दलों की ट्रेनिंग व अन्य मदों में लगभग 5 से 6 करोड़ रुपये खर्च हो चुके हैं।
तर्क यह कि स्याही और कागज बाद में आ जाएंगे काम
जनता के पैसे की बर्बादी के सवाल पर राज्य निर्वाचन आयोग के सचिव राजेश वर्मा ने कहा कि आयोग ने कोर्ट के दिशा-निर्देशों के पालन में दिन-रात काम करके तैयारी पूरी की थी। उन्होंने तर्क दिया कि स्याही और कागज का उपयोग भविष्य में हो जाएगा, इसलिए इसे पूरी तरह बर्बादी नहीं कहा जा सकता। हालांकि, उन्होंने यह स्वीकार किया कि मतदाता सूची और ट्रेनिंग पर हुआ खर्च दोबारा करना होगा।
ओबीसी आरक्षण का पेंच
चुनाव टलने का मुख्य कारण ओबीसी प्रतिनिधित्व आयोग के कार्यकाल का बढ़ाया जाना माना जा रहा है। सरकार ने इसका कार्यकाल सितंबर तक बढ़ा दिया है, जिससे स्पष्ट है कि अगले सात-आठ महीनों तक राजस्थान पंचायत चुनाव संभव नहीं हैं। निर्वाचन आयुक्त राजेश्वर सिंह के अनुसार बगैर आरक्षण निर्धारण के चुनाव कराना संभव नहीं है, लेकिन चुनाव कब होंगे, इस पर अभी कुछ भी कहना जल्दबाजी होगी।
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