97 की उम्र में रोबोटिक सर्जरी और 100 के पार भी एआई पर चर्चा, मिलिए देश के सबसे बुजुर्ग समाजवादी नेता पंडित रामकिशन से

The Sootr | Apr 02, 2026, 13:20 IST
Photograph: (the sootr)
भारतीय राजनीति में जब सिद्धांतों के सितारे धुंधले पड़ने लगे हैं, तब राजस्थान की माटी से एक व्यक्तित्व उभरता है, जो 100 साल की उम्र पार कर आज भी अजेय योद्धा की तरह खड़ा है। हम बात कर रहे हैं पूर्व सांसद और सामाजवादी आंदोलन के प्रखर नेता पंडित रामकिशन की।

गुलाब बत्रा@वरिष्ठ पत्रकार



समाजवादी आंदोलन के प्रखर नेता पंडित रामकिशन ने अपने जीवन की शताब्दी रेखा पार कर ली है। उन्होंने 28 मार्च 2026 को 101वें वर्ष में प्रवेश कर लिया। संयोगवश, राजस्थान में भरतपुर जिले से पंडित जी के अग्रज गिरिराज प्रसाद तिवारी भी 105वें वर्ष में दुनिया से विदा हुए। वे राजस्थान विधानसभा अध्यक्ष रहे। पंडित जी के कनिष्ठ पूर्व राजस्व मंत्री नत्थी सिंह 28 दिसम्बर 1929 को शताब्दी के साक्षी बनेंगे। उनकी यह जन्मतिथि सरकारी रिकॉर्ड में दर्ज है, लेकिन वे 24 सितम्बर 1928 को अपनी सही जन्मतिथि मानते हैं।



भरतपुर जिले के इन वरिष्ठ नेताओं में गिरिराज प्रसाद तिवारी विधानसभा अध्यक्ष और नत्थी सिंह राजस्व मंत्री रह चुके हैं। वहीं, पंडित रामकिशन ने राजनीतिक जीवन में समाजवादी विचारधारा के लिए सत्ता के उच्च शिखर पर पदासीन होने को अनदेखा किया। लेकिन, क्षेत्रीय विकास के लिए भरतपुर के एक बड़े राजनेता को सही राह दिखाने की समझबूझ भी दिखाई



राजबहादुर को सोशलिस्ट पार्टी में आने से रोका

इस प्रसंग के अनुसार राजस्थान के एकीकरण की प्रक्रिया में मत्स्य राज्य के गठन में युगल किशोर चतुर्वेदी और गोपी लाल यादव को मंत्री बनाया गया। भरतपुर जिले के प्रथम एमए तथा एलएलबी डिग्री धारक बाबू राजबहादुर को मंत्री बनाये जाने की आशा थी, लेकिन ऐसा नहीं हुआ। नाराज राजबहादुर विरोध जताने के लिए विदेश चले गए। विदेश जाने से पहले उन्होंने पंडित जी के निवास पर समाजवादी पार्टी की उत्तर प्रदेश इकाई के तत्कालीन अध्यक्ष सेठ दामोदर स्वरूप से मुलाकात की।



इस मुलाकात के दौरान बाबू राजबहादुर ने सोशलिस्ट पार्टी से जुड़ने की इच्छा व्यक्त की। पंडित जी के शब्दों में- मैंने उनके दीर्घकालीन हितों और सत्ता के प्रति झुकाव देखते हुए उन्हें सोशलिस्ट पार्टी से नहीं जुड़ने की सलाह दी, क्योंकि यह वो रास्ता नहीं था, जो बाबू राजबहादुर ने अपने लिए सोचा था। वह 1952 के प्रथम आम चुनाव में भरतपुर के पूर्व राजपरिवार के प्रत्याशी से लोकसभा चुनाव हार गए। दौसा संसदीय क्षेत्र से उपचुनाव जीतकर जवाहरलाल नेहरू मंत्रिमंडल में शामिल किए गए। भरतपुर संसदीय क्षेत्र से चुनाव जीतने वाले बाबू राजबहादुर के 1977 के चुनाव में अपने राजनीतिक मार्गदर्शक पंडित रामकिशन से पराजित हुए।



गाड़ी में साथ बैठने से किया मना

चुनाव प्रचार के दौरान दोनों राजनेताओं के बीच राजनीतिक सदाशयता का रोचक प्रसंग देखा गया। चुनाव प्रचार के लिए जाते समय पंडित जी की गाड़ी अलवर के कठूमर के पास खराब हो गई थी। इसी दौरान बाबू राजबहादुर भी चुनाव प्रचार के लिए अपनी कार से जा रहे थे। रास्ते में सड़क किनारे खड़े पंडित जी को देख उन्होंने कार रोकी। बाबू जी ने पंडित जी को उनके सभा स्थल पर छोड़ने का प्रस्ताव दिया।



पंडित जी ने बाबू राजबहादुर का यह अनुरोध स्वीकार करने से मना कर दिया। उन्होंने कहा- आपके साथ जाने से मेरे कांग्रेस से मिलने का संदेश जाएगा। बाबू राजबहादुर बात समझ गए और आगे बढ़ गए। लेकिन उन्होंने किसी मैकेनिक को भिजवाने के साथ ही पंडित जी के समर्थक कार्यकर्ताओं को गाड़ी खराब होने की सूचना भी दी। पंडित जी कुछ विलम्ब से अपने सभा स्थल पर पहुंच गए। इस चुनाव में पंडित जी विजयी हुए।



समाजवादी आंदोलन का शताब्दी पुरुष

पंडित रामकिशन जी के घुटनों का प्रत्यारोपण भी विश्व रिकॉर्ड की श्रेणी में माना जा सकता है। वर्ष 2020 में पहले और 2023 में 97 साल की आयु में उनका रोबोटिक सर्जरी से दूसरे घुटने का सफल प्रत्यारोपण हुआ। नई दिल्ली में 2023 में मधु लिमये शताब्दी समारोह समिति ने पंडित जी को "समाजवादी आंदोलन का शताब्दी पुरुष" से अलंकृत कर उनकी जिजीविषा को सम्मानित किया। विश्व के सबसे उम्रदराज सक्रिय समाजवादियों में अग्रणी पंडित जी पानी के मुद्दे पर संघर्ष यात्रा के साथ पर्यावरण एवं कृत्रिम बुद्धि (एआई) जैसे आधुनिक विषय पर जनमानस जनचेतना जागृति अभियान में तन-मन से जुटे हैं।



ईआरसीपी की मांग उठाई, सरकार ने दिया ध्यान

वर्ष 2007 में उन्होंने पूर्वी राजस्थान नहर परियोजना (ईआरसीपी) की मांग उठाई, जिस पर 2017 में राज्य सरकार ने परियोजना का पहला प्रारूप तैयार किया। अब राजस्थान के मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा ने ईआरसीपी को रामसेतु जल परियोजना का नाम दिया है।



पंडित जी राजनेता के साथ-साथ पत्रकार भी रहे हैं। स्वाधीनता प्राप्ति के कुछ अर्से पश्चात भरतपुर से 'प्रगति' एवं 'चौबुर्जा गजट' शीर्षक से पीरियोडिकल पत्रों का सम्पादन किया। करीब तीन-चार साल तक इनका प्रकाशन होता रहा। 'चौबुर्जा गजट' को लेकर भरतपुर में हास-परिहास का वातावरण बनाया गया। इसके शीर्षक को अफवाहों से जोड़कर जाने लगा था, जबकि पंडित जी इसमें नीति-सिद्धांत परक बातें लिखते थे। इस मायने में पंडित जी देश में शतकीय पुरुष के नाते प्रथम पत्रकार हैं



1979 में उठाया था ईरान संकट का मुद्दा

एक बार सांसद, चार बार विधायक तथा भरतपुर-धौलपुर (संयुक्त जिला) के 12 साल तक जिला प्रमुख रहे। पंडित जी उम्रदराज जीवित सांसद हैं, जो 101वें वर्ष में प्रवेश कर गए हैं। इससे पहले रघुनंदन लाल भाटिया का 101 वर्ष की आयु में कोरोना के समय निधन हुआ था। मोरारजी देसाई तथा खुशवंत सिंह 99 वर्ष की आयु में दिवंगत हुए।



लोकसभा तथा राजस्थान विधानसभा में पंडित रामकिशन ने सदैव तथ्यपरक एवं दूरदर्शी सोच से जुड़े मुद्दे उठाए, जिनसे नीति बनाने में सहायता मिली। वर्तमान में अमेरिका-इजरायल तथा ईरान के वर्तमान युद्ध ने समूचे विश्व को प्रभावित किया है। वर्ष 1979 में लोकसभा में पंडित जी ने 'आउट ऑफ टर्न' अपनी बात रखते हुए ईरान के भावी संकट का उल्लेख किया था। तब उन्होंने ईरान में सत्ता परिवर्तन की संभावना जताई थी। ईरान के तत्कालीन शाह रजा पहलवी देश छोड़कर भाग गए थे। इस खबर को एक प्रमुख अंग्रेजी दैनिक ने 16 जनवरी 1979 को मुख्य पृष्ठ पर प्रकाशित किया था।



जब मानसिंह ने उतार दिया गाड़ी से

राजा मानसिंह ने दिल्ली जाते समय पंडित रामकिशन को भी साथ ले लिया था। गाड़ी चलाते हुए पंडित जी से अखबार की हेडलाइन के साथ 'राजा-महाराजाओं का युग गया' वाक्य सुन राजा मानसिंह गुस्सा हो गए। उन्होंने गाड़ी रोककर पंडित जी को मथुरा जिले के कोसी कस्बे के पास उतार दिया। थोड़ी देर में बरसात शुरू हो गई, तब राज मानसिंह वापस लौटे और पंडित जी को गाड़ी में बैठाया।



स्वाधीनता से पहले 1945 के आसपास अलवर-भरतपुर से जुड़े मेवात इलाके के सांप्रदायिक झगड़ों के माहौल में पंडित जी एकमात्र हिन्दू राजनेता थे, जिन्होंने मेवात में जाने की हिम्मत दिखाई। इसी मेवात क्षेत्र से निकले अंतरराष्ट्रीय समाजवादी विचारक तथा अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय के प्रोफेसर रहे कुंवर अहमद अशरफ लोगों को शांत करने तथा पाकिस्तान नहीं जाने की हिदायत देने के लिए आये थे। वे नेहरू जी के सचिव भी रहे थे। अशरफ के अनुरोध पर पंडित जी मेवात गए। बाद में अशरफ को देश निकाला मिला, जर्मनी में 1962 में निधन हुआ। बाद में महात्मा गांधी मेवात आए और लोगों को समझाया



स्वाधीनता आंदोलन में रहे सक्रिय

विद्यार्थी जीवन से स्वाधीनता आन्दोलन में कूदने वाले पंडित जी 1942 के बाद से टोपी और खादी के व्रत को आज तक अपनाए हुए हैं। आचार्य नरेन्द्र देव, जयप्रकाश नारायण, डॉ. राममनोहर लोहिया, आचार्य जेबी कृपलानी सरीखे समाजवादियों द्वारा सींचे गए समाजवादी ढांचे को पंडित जी ने राजस्थान में सुसज्जित किया।



वर्ष 1958 में पार्टी के संस्थापक अध्यक्ष पंडित जी के नेतृत्व में 1962 के चुनाव में पार्टी के पांच विधायक चुने गए। सैद्धांतिक राजनीति में अपनी विचारधारा को परिपुष्ट करते हुए पंडित जी ने अन्य दलों के राजनेताओं से आपसी सद्-व्यवहार की मर्यादा को बनाये रखा। इस मायने में उन्हें अजातशत्रु कहा जा सकता है।



मैं जिंदा हूं

संकट में आए नेताओं की मदद में वे पीछे नहीं रहे। नेपाल में राजशाही के शिकार हुए जननेता


बीपी कोइराला 1973-74 में भरतपुर में पंडित जी की शरण में भी आए। पंडित जी ने वित्तीय मदद की, जिसका भुगतान तत्कालीन मुख्यमंत्री हरिदेव जोशी के माध्यम से किया गया। पंडित रामकिशन के पत्रकार सुपुत्र डॉ. संजय शर्मा ने उनके संस्मरणों पर आधारित पुस्तक लिखी है, जिसका शीर्षक है- 'मैं जिंदा हूं: शताब्दी का साक्षी-समाजवाद का प्रहरी'।



यह किताब समाजवादी विचारधारा के नजरिए से भारतीय राजनीति और वैश्विक घटनाओं को समझने का प्रयास भी है। यह एक ऐसे जीवंत उदाहरण की कहानी है, जो समाजवादी विचारधारा के साथ लगभग एक अकेले योद्धा के रूप में जुटा रहा। देश में तथाकथित समाजवादियों की कमी नहीं है। लेकिन, इनमें से ज्यादातर ने समाजवादी विचार के मूल आधार से समझौता कर लिया है।



कृषि और व्यापार नीति विशेषज्ञ देविंदर शर्मा ने पुस्तक की प्रस्तावना में पंडित जी को अतीत के समाजवादी युग का कद्दावर नेता बताते हुए सामाजिक न्याय की विचारधारा को जीवित रखने के लिए उनके अपार संघर्ष की कहानी को "कभी न हारो, हार न मानो" के संकल्प से अंगीकार करने का आह्वान किया है।



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