14 चुनाव में मिली हार, फिर भी हौसला बरकरार; 15वीं बार मैदान में उतर रहे राजस्थान के पोपटलाल
Ashish Bhardwaj | Oct 15, 2026, 13:20 IST
14 बार चुनाव हारे पोपटलाल सरगरा
राजस्थान के पोपटलाल जो अब तक 14 बार चुनाव लड़ चुके हैं। लेकिन हर बार हार का सामना करना पड़ा है। इस बार फिर पंचायती राज चुनाव में अपनी किस्मत आजमाने जा रहे हैं। उनका चुनावी सफर भी बहुत ही रोचक रहा है। इस बार वे कांग्रेस से टिकट मांग रहे हैं।
राजस्थान में पंचायती राज चुनावों की सरगर्मी तेज हो गई है। इस बार चुनावों में 10 हजार से भी अधिक उम्मीदवार अपना भाग्य अजमा रहे है। लेकिन इन सब के बीच एक शख्स ऐसा भी है, जो 14 बार चुनाव हार चुका है, लेकिन चुनाव लड़ने का उसका जुनून आज भी बरकरार है। बालोतरा जिले के समदड़ी क्षेत्र के रहने वाले 59 वर्षीय पोपटलाल सरगरा अब 15वीं बार चुनावी मैदान में उतरने की तैयारी कर रहे हैं। इस बार उनकी नजर कांग्रेस के टिकट पर है। सरपंच से लेकर विधायक और सांसद बनने तक की कोशिश कर चुके पोपटलाल की कहानी इन दिनों प्रदेश में चर्चा का विषय बनी हुई है।
विधायक
पोपटलाल का नाम 14 अक्टूबर को उस समय फिर सुर्खियों में आया, जब कांग्रेस ने पंचायत राज चुनावों की रणनीति पर चर्चा के लिए बैठक बुलाई थी। बैठक में वरिष्ठ कांग्रेस नेता और बायतु विधायक हरीश चौधरी ने उनका जिक्र किया। चौधरी ने चुनाव लड़ने की पोपटलाल की आदत पर चुटकी ली। इसके बाद उनका किस्सा सोशल मीडिया पर चर्चा में आ गया।
पोपटलाल अब तक अलग-अलग पदों के लिए 14 बार चुनाव लड़ चुके हैं। उपलब्ध जानकारी के मुताबिक, उन्होंने पांच बार सरपंच, चार बार विधानसभा, चार बार लोकसभा और एक बार जिला परिषद सदस्य का चुनाव लड़ा। इन सभी चुनावों में उन्हें हार का सामना करना पड़ा। कुछ चुनावों में उनकी पत्नी ने भी किस्मत आजमाई, लेकिन उन्हें भी जीत नहीं मिली।
लगातार हार के बावजूद पोपटलाल ने चुनाव लड़ना नहीं छोड़ा। उनका मानना है कि जनता का समर्थन ही सबसे बड़ी ताकत है। उन्हें उम्मीद है कि एक दिन सभी जातियों और समुदायों के लोग उनका साथ देंगे। यही भरोसा उन्हें बार-बार चुनावी मैदान में ले आता है।
पोपटलाल का चुनाव प्रचार किसी बड़े नेता जैसा नहीं होता। उनके पास न बड़ा प्रचार तंत्र है और न ही समर्थकों की लंबी टोली। वे कभी बस से सफर करते हैं, तो कभी पैदल घूमकर लोगों से वोट मांगते हैं। उनका मानना है कि मतदाताओं से सीधे मिलना और अपनी बात रखना ही भरोसा बनाने का तरीका है।
मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, वे चुनाव लड़ने के लिए पांच साल तक थोड़ा-थोड़ा पैसा बचाते हैं। चुनावी खर्च जुटाने के लिए उन्हें अपने पालतू जानवरों और जमीन तक को बेचना पड़ा है। परिवार की आर्थिक स्थिति भी साधारण बताई जाती है। उनका बेटा और पत्नी मेहनत-मजदूरी करके घर चलाते हैं।
शुरुआत में परिवार के लोग उन्हें चुनाव लड़ने से रोकते थे। बार-बार हार और खर्च के कारण उन्हें समझाने की कोशिश भी की गई। लेकिन अब परिवार को भी एहसास हो गया है कि पोपटलाल अपने फैसले से पीछे हटने वाले नहीं हैं।
कांग्रेस की बैठक में हरीश चौधरी ने पोपटलाल का उदाहरण देते हुए कहा कि जब किसी को चुनाव लड़ने की धुन सवार हो जाए, तो उसे रोकना मुश्किल होता है। उन्होंने बताया कि पोपटलाल उनके सामने भी चुनाव लड़ चुके हैं और कई दूसरे नेताओं के खिलाफ भी मैदान में उतर चुके हैं।
चौधरी ने अपने बयान में कहा, "पोपटलाल जी ने मेरे सामने चुनाव लड़ लिया, बालाराम जी के सामने लड़ लिया, पंकज प्रताप जी के सामने लड़ लिया, सुनील जी के सामने लड़ लिया, उम्मेद जी के सामने लड़ लिया। ऐसा किसी के मन में हो तो क्या करे, उनको तो ये लगता है हमें चुनाव लड़ना ही लड़ना है।"
उनकी इस टिप्पणी ने पोपटलाल के चुनावी सफर को फिर चर्चा में ला दिया। हालांकि, यह बयान उनके चुनाव लड़ने के जुनून पर टिप्पणी था, न कि किसी चुनाव में उनकी जीत या हार का नया परिणाम।
पोपटलाल की अगली तैयारी सबसे दिलचस्प है। 14 चुनावों में हार के बाद अब वे 15वीं बार चुनाव लड़ना चाहते हैं और इस बार कांग्रेस से टिकट मांगने पहुंचे हैं। पार्टी उन्हें टिकट देती है या नहीं, यह अलग बात है। लेकिन उनका चुनाव लड़ने का इरादा साफ है।
पोपटलाल की कहानी राजनीति के उस पहलू को सामने लाती है, जहां चुनाव जीतने के अलावा मैदान में उतरने का जुनून भी किसी व्यक्ति की पहचान बन जाता है। अब देखना होगा कि 15वीं कोशिश में उन्हें पार्टी का टिकट मिलता है या वे एक बार फिर अपने दम पर चुनाव लड़ने का रास्ता चुनते हैं।
विधायक हरीश चौधरी ने ली चुटकी
सरपंच से सांसद तक, 14 बार आजमाई किस्मत
एक दिन सभी लोग साथ देंगे
कभी बस से सफर, कभी पैदल मांगते हैं वोट
मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, वे चुनाव लड़ने के लिए पांच साल तक थोड़ा-थोड़ा पैसा बचाते हैं। चुनावी खर्च जुटाने के लिए उन्हें अपने पालतू जानवरों और जमीन तक को बेचना पड़ा है। परिवार की आर्थिक स्थिति भी साधारण बताई जाती है। उनका बेटा और पत्नी मेहनत-मजदूरी करके घर चलाते हैं।
शुरुआत में परिवार के लोग उन्हें चुनाव लड़ने से रोकते थे। बार-बार हार और खर्च के कारण उन्हें समझाने की कोशिश भी की गई। लेकिन अब परिवार को भी एहसास हो गया है कि पोपटलाल अपने फैसले से पीछे हटने वाले नहीं हैं।
हरीश चौधरी ने क्या कहा था?
चौधरी ने अपने बयान में कहा, "पोपटलाल जी ने मेरे सामने चुनाव लड़ लिया, बालाराम जी के सामने लड़ लिया, पंकज प्रताप जी के सामने लड़ लिया, सुनील जी के सामने लड़ लिया, उम्मेद जी के सामने लड़ लिया। ऐसा किसी के मन में हो तो क्या करे, उनको तो ये लगता है हमें चुनाव लड़ना ही लड़ना है।"
उनकी इस टिप्पणी ने पोपटलाल के चुनावी सफर को फिर चर्चा में ला दिया। हालांकि, यह बयान उनके चुनाव लड़ने के जुनून पर टिप्पणी था, न कि किसी चुनाव में उनकी जीत या हार का नया परिणाम।
अब कांग्रेस से टिकट की उम्मीद
पोपटलाल की कहानी राजनीति के उस पहलू को सामने लाती है, जहां चुनाव जीतने के अलावा मैदान में उतरने का जुनून भी किसी व्यक्ति की पहचान बन जाता है। अब देखना होगा कि 15वीं कोशिश में उन्हें पार्टी का टिकट मिलता है या वे एक बार फिर अपने दम पर चुनाव लड़ने का रास्ता चुनते हैं।
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