92 साल की अम्मा की पेंशन रोकी, सरकार के अमानवीय सिस्टम के खिलाफ हाई कोर्ट में गुहार

Mukesh Sharma | Apr 14, 2026, 19:03 IST
Photograph: (the sootr)
राजस्थान में 92 साल की गंगा देवी ने अपनी रुकी हुई पेंशन के लिए हाई कोर्ट की शरण ली है। उसने याचिका में डिजिटल बाधाओं को हटाकर डोर-स्टेप वेरिफिकेशन की गुहार की है।

News In Short

  • पेंशन रोकने पर 92 साल की गंगा देवी ने राजस्थान हाई कोर्ट की शरण ली।
  • सरकारी पोर्टल (IFMS) में तकनीकी खराबी के कारण रुकी है पेंशन
  • चलने-फिरने में असमर्थ, फिर भी व्यक्तिगत उपस्थिति की हो रही मांग।
  • वर्ष 2009 से लंबित 24.53 लाख रुपये के एरियर का तत्काल भुगतान की मांग
  • हाई कोर्ट ने कहा, दो महीने में पीड़ित महिला को मिलनी चाहिए पेंशन।

News In Detail

राजस्थान में सरकारी सिस्टम की संवेदनहीनता का मामला सामने आया है। चलने-फिरने में असमर्थ 92 साल की बुजुर्ग महिला गंगा देवी ने सरकारी सिस्टम से खफा होने के बाद अपनी रुकी हुई पेंशन और पेंशन के बकाया पैसों के लिए हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाया है। याचिकाकर्ता ने डिजिटल सिस्टम की खामियों और अधिकारियों की हठधर्मिता को जीवन के अधिकार का उल्लंघन बताया है।



जस्टिस रवि चिरानिया ने जयपुर की बुजुर्ग महिला की याचिका पर राज्य सरकार, पेंशन निदेशक और प्रमुख वित्त सचिव से चार सप्ताह में जवाब मांगा है। कोर्ट ने उम्मीद जताई है कि याचिकाकर्ता की रुकी हुई पेंशन दो महीने में जारी कर दी जाएगी।



चलने में असमर्थ, फिर भी उपस्थिति की मांग

याचिका के अनुसार गंगा देवी राजस्थान सरकार के पूर्व उप-सचिव की विधवा हैं। 92 वर्ष की आयु में वे हृदय रोग और रीढ़ की हड्डी की गंभीर चोट से जूझ रही हैं। वह बिना वॉकर या सहारे के एक कदम भी नहीं चल सकतीं।



राजस्थान पेंशन विभाग के तकनीकी सिस्टम (IFMS) में खराबी के कारण उनका डिजिटल जीवित प्रमाण पत्र अपलोड नहीं हो रहा है। वह पूरी तरह अपने 70 साल के बेटे-बहू पर आश्रित हैं। उनके पास ना आधार कार्ड है ना ही जनआधार कार्ड। जीवित प्रमाण-पत्र अपलोड नहीं होने के कारण उनकी पेंशन रोक दी गई है। उनसे व्यक्तिगत रूप से उपस्थित होने की अपेक्षा की जा रही है।



सिस्टम की निर्दयता है यह

याचिकाकर्ता के एडवोकेट ने तर्क दिया कि सरकार का रवैया हाथी दांत के मीनार जैसा है। इसे धरातल पर बुजुर्गों की तकलीफें दिखाई नहीं देतीं। एक ऐसी महिला जिसे अपनी गरिमा के साथ जीने का अधिकार है, उसे तकनीकी खामियों के नाम पर भूखा रहने या दफ्तरों के चक्कर लगाने पर मजबूर करना असंवैधानिक है।



25 लाख बकाया

याचिका में आरोप लगाया गया है कि साल 2009 से उनकी आयु के अनुसार पेंशन के स्लैब में वृद्धि नहीं की गई। उनका लगभग 24,53,438 रुपये का एरियर (बकाया) सरकार के पास लंबित है। याचिकाकर्ता ने 2009 से अब तक का कुल बकाया करीब 25 लाख रुपये 18% ब्याज के साथ दिलवाने की गुहार की है।



75 साल से ज्यादा वालों का सत्यापन

याचिकाकर्ता का कहना है कि फरवरी 2026 से उनकी पारिवारिक पेंशन बिना किसी वैध कारण के रोक दी गई। जबकि उन्होंने ईमेल के जरिए जीवन प्रमाण पत्र भेज दिया था। विभाग उन पर आधार या जन-आधार कार्ड के जरिए सत्यापन का दबाव बना रहा है। जबकि इस उम्र में उनके बायोमेट्रिक्स (अंगूठे के निशान) काम नहीं करते और वह शारीरिक रूप से कार्यालय जाने में अक्षम हैं।



याचिकाकर्ता ने गुहार की है कि 75 वर्ष से अधिक आयु के बुजुर्गों के लिए कार्यालय में उपस्थिति की शर्त खत्म कर डोर-स्टेप वेरिफिकेशन (घर पर सत्यापन) की व्यवस्था अनिवार्य की जाए। चिकित्सा और दैनिक खर्चों के लिए तत्काल 15 लाख रुपये की अंतरिम सहायता राशि दिलवाई जाए।



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