पंचायत-निकाय चुनाव नहीं कराने पर नाराजगी, गहलोत बोले-यह सरकार की विफलता
News In Short
- गहलोत ने कहा, राजस्थान में संवैधानिक ब्रेकडाउन के हालात।
- संविधानिक संविधान की धज्जियाँ उड़ा रही सत्तासीन सरकार।
- अदालती आदेश के बावजूद चुनाव न कराना लोकतांत्रिक विफलता।
- राजस्थान में संवैधानिक संकट, राष्ट्रपति व राज्यपाल करें हस्तक्षेप।
- निकाय और सहकारी चुनाव रोककर संस्थाओं को बर्बाद करने का आरोप।
News In Detail
राजस्थान के पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने भजनलाल सरकार पर तीखा हमला बोलते हुए प्रदेश में संवैधानिक तंत्र की विफलता जैसे हालात होने का दावा किया है। उन्होंने मंगलवार को मीडिया से बातचीत के दौरान पंचायत और स्थानीय निकाय चुनाव न कराए जाने पर गहरी नाराजगी व्यक्त की।
गहलोत ने कहा कि बाबा साहेब डॉ. भीमराव अंबेडकर द्वारा रचित संविधान की आज धज्जियां उड़ाई जा रही हैं। जो लोग उनके उसूलों में विश्वास नहीं रखते, वे सत्ता में बैठकर केवल दिखावे के लिए उनकी जयंती मना रहे हैं।
लोकतंत्र हो रहा कमजोर
गहलोत ने राहुल गांधी के संविधान बचाओ अभियान का जिक्र करते हुए कहा कि देश में लोकतंत्र कमजोर हो रहा है। न्यायपालिका से लेकर जांच एजेंसियों तक की स्थिति अजीब बन गई है।
उन्होंने सरकार की मंशा पर सवाल उठाते हुए कहा कि पंचायत, नगर निकाय और सहकारी संस्थाओं के चुनाव संविधान का अभिन्न हिस्सा हैं। सरकार इन्हें जानबूझकर रोक रही है। उन्होंने आरोप लगाया कि इन संस्थाओं को बर्बाद किया जा रहा है और सहकारी समितियों के चुनाव तो पिछले 10 साल से नहीं कराए गए हैं।
चुनाव नहीं कराना लोकतंत्र पर प्रहार
गहलोत के अनुसार यह केवल प्रशासनिक देरी नहीं है, बल्कि लोकतंत्र की जड़ों पर सीधा प्रहार है। उन्होंने इस बात पर हैरानी जताई कि सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट से अप्रैल की समय-सीमा तय किए जाने के बावजूद चुनाव आयोजित नहीं किए गए, जो स्पष्ट रूप से न्यायिक आदेशों की अवहेलना है।
पूर्व मुख्यमंत्री ने इस पूरी स्थिति को संवैधानिक ब्रेकडाउन करार देते हुए राष्ट्रपति और राज्यपाल से तुरंत हस्तक्षेप करने की मांग की।
राज्यपाल को आना चाहिए एक्शन में
गहलोत ने कड़े लहजे में कहा कि जब संवैधानिक संस्थाओं और अदालतों के आदेशों को दरकिनार किया जा रहा हो, तो राज्यपाल को मूकदर्शक नहीं बने रहना चाहिए।
उन्होंने सरकार की नैतिकता पर सवाल उठाते हुए पूछा कि जो सरकार समय पर चुनाव कराने जैसे अपने बुनियादी संवैधानिक दायित्वों को पूरा नहीं कर सकती, उसे सत्ता में बने रहने का क्या नैतिक अधिकार है।
उन्होंने कहा कि सरकार की कथनी और करनी में जमीन-आसमान का अंतर है, जो लोकतंत्र के लिए एक बड़ा खतरा है।
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