फंड था, मरीज भी थे... फिर क्यों सरेंडर किए 54 करोड़? पढ़ें आयुष विभाग की रिपोर्ट
समझें क्या है पूरा मामला
- राष्ट्रीय आयुष मिशनमें आए फंड का पूरी तरह उपयोग नहीं हो पाया।
- समय पर काम पूरे नहीं होने पर केंद्र को 54 करोड़ सरेंडर करने पड़े।
- यह राशि प्रदेश में आयुष अस्पतालों की स्थिति सुधारने के लिए मिली थी।
- स्वास्थ्य विशेषज्ञों की राय में राशि लौटाना कमजोर प्लानिंग को दर्शाता है।
जब अस्पतालों में डॉक्टरों की कमी हो और दवाएं नदारद हों, तब अगर सरकार को मिला करोड़ों रुपए का बजट बिना इस्तेमाल किए वापस भेजना पड़े तो सवाल उठना स्वाभाविक है।
राजस्थान में आयुष स्वास्थ्य सेवाओं को लेकर ऐसा ही चौंकाने वाला मामला सामने आया है। आयुष में आयुर्वेद, योग, यूनानी, सिद्ध और होम्योपैथी चिकित्सा सेवाएं आती हैं।
केंद्र से मिली भारी-भरकम राशि का उपयोग न कर पाने के कारण राजस्थान सरकार को 54.21 करोड़ रुपए सरेंडर करने पड़े हैं। इतना ही नहीं, करीब 3 करोड़ रुपये आज भी बिना किसी उपयोग के पड़े हैं।
कितने आए, कितने खर्च हुए और कितना लौटाया?
नेशनल आयुष मिशन (NAM) के तहत 2014-15 से लेकर 2025-26 के दौरान आयुष सेवाओं के विस्तार के लिए राजस्थान को कुल 510.51 करोड़ रुपए मिले।
इस फंड का मकसद प्रदेश के आयुर्वेद, होम्योपैथी और यूनानी अस्पतालों की स्थिति सुधारना, दवाएं उपलब्ध कराना और नए निर्माण करवाना था।
लेकिन रिपोर्ट के मुताबिक राजस्थान ने 510.51 करोड़ रुपए में से 453.29 करोड़ रुपए का ही उपयोग किया। समय पर राशि का उपयोग नहीं करने से उसे 54.21 करोड़ रुपए सरेंडर करने पड़े। बिना इस्तेमाल के बची राशि 3 करोड़ रुपए आज भी फाइलों और खातों में फंसी है।
आयुष विभाग के वरिष्ठ अधिकारियों का स्वीकार किया कि समय पर कुछ निर्माण और योजना से जुड़े काम पूरे न हो पाने के कारण राशि का सरेंडर करना पड़ा।
राज्य में आयुष सेवाओं का ढांचा: कहां कितनी सुविधा?
चूरू से कांग्रेस सांसद राहुल कस्वां ने हाल ही में लोकसभा में यह मुद्दा उठाया। इसके बाद केंद्र की ओर से आए जवाब में प्रदेश में आयुष सुविधाओं की तस्वीर साफ हुई है। राजस्थान में आयुष का पूरा नेटवर्क तीन मुख्य विभागों में बंटा हुआ है:
आंकड़ों को देखें तो यूनानी विभाग में डिस्पेंसरियों की तुलना में डॉक्टरों की संख्या काफी कम है। इससे कई अस्पतालों में ताले लटके रहने जैसी स्थिति बन जाती है।
जब मरीज लाखों में, तो फंड वापस क्यों?
अगर आप सोच रहे हैं कि शायद लोग आयुष चिकित्सा पद्धतियों में रुचि नहीं ले रहे होंगे, इसलिए पैसा खर्च नहीं हुआ, तो चूरू जिले के आंकड़े इस सोच को पूरी तरह गलत साबित करते हैं।
चूरू सांसद क्षेत्र में आयुष चिकित्सा को लेकर मरीजों में काफी उत्साह है। केवल वर्ष 2025-26 के दौरान चूरू के आयुर्वेद अस्पतालों में 5,17,454 मरीजों ने अपना इलाज कराया। यानी आधा मिलियन से ज्यादा लोग केवल एक जिले में आयुर्वेद पर भरोसा जता रहे हैं।
चूरू में स्टाफ की जमीनी स्थिति
| विभाग | अस्पताल | डॉक्टर | नर्सिंग स्टाफ/कंपाउंडर | परिचारक |
|---|---|---|---|---|
| आयुर्वेद | 118 | 107 | 108 | 46 |
| होम्योपैथी | 16 | 15 | 12 | 1 |
| यूनानी | 13 | 9 | 6 | — |
सांसद राहुल कस्वां का कहना है कि जब लोग इतनी बड़ी संख्या में आयुष अस्पतालों का रुख कर रही है तो ढांचागत सुधार की रफ्तार इतनी धीमी क्यों है? केंद्र से मिले फंड का इस्तेमाल न कर पाना प्रशासनिक व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े करता है।
प्रशासनिक ढिलाई या प्लानिंग की कमी?
स्वास्थ्य विशेषज्ञों का मानना है कि ग्रामीण इलाकों में जहां प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों पर डॉक्टरों की कमी रहती है, वहां आयुष डॉक्टर और डिस्पेंसरियां मजबूत सहारा बन सकती हैं। ऐसे में 54 करोड़ रुपए का सरेंडर होना ढिलाई और कमजोर प्लानिंग को दर्शाता है।
विशेषज्ञों का कहना है कि यदि राशि का सही समय पर उपयोग किया गया होता तो कई डिस्पेंसरियों की हालत को सुधारा जा सकता था। दूरदराज के गांवों में जरूरी दवाइयों की उपलब्धता बढ़ाई जा सकती थी। मरीजों के लिए मूलभूत सुविधाएं जैसे बैठने की जगह और जांच उपकरण जुटाए जा सकते थे।
कोविड के बाद भरोसा बढ़ा, पर सुविधाएं नहीं
आयुर्वेद विशेषज्ञ डॉ. बीएन मिश्रा का कहना है कि कोविड के बाद आयुर्वेद के प्रति अधिक विश्वास बढ़ा है। सरकार को इस भरोसे को बनाए रखने के लिए आयुर्वेदिक अस्पतालों में सुविधा बढ़ानी होगी। ग्रामीण स्तर पर ज्यादा सुधार की जरूरत है।
डॉ. मिश्रा का कहना है कि कई हॉस्पिटल में दवा नहीं है, कहीं कुर्सी नहीं है। मतलब बेसिक सुविधाएं तक उपलब्ध नहीं है। एक-एक कमरे में आयुर्वेदिक चिकित्सालय चल रहे हैं। अगर आयुर्वेदिक को सरकार गंभीरता से ले तो एलोपैथिक चिकित्सा पर यह भारी पड़ सकती है।
सर्वे में आयुष को माना प्रभावी
राजस्थान में आयुष प्रभावी विकल्प बनकर सामने आया है। आर्थिक एवं सांख्यिकी निदेशालय के एक ताजा सर्वे के अनुसार 81.1 प्रतिशत परिवारों ने आयुष उपचार को प्रभावी माना है। अस्पताल में भर्ती होकर इलाज कराने वाले 89 फीसदी और बिना भर्ती इलाज कराने वाले 91 प्रतिशत मरीजों ने आयुर्वेद को चुना।
अपनी तरह के इस पहले सर्वे में यह उजागर हुआ कि 15 वर्ष से अधिक आयु के 57.4 शहरी और 44.9% ग्रामीण लोग आयुष को समझते हैं। एक साल के दौरान राजस्थान में 6.7 करोड़ बार बिना भर्ती आयुष उपचार लिया गया। गैर-भर्ती उपचार पर प्रति परिवार औसत 1,086 रुपए और भर्ती उपचार पर 2,274 रुपए खर्च आया।
अधिकारियों का दावा, सुधार हुआ
आयुष विभाग के अधिकारियों का तर्क है कि कुछ वर्षों में राज्य में आयुष चिकित्सा की स्थिति में काफी सुधार आया है। सेवाओं का विस्तार लगातार जारी है।
राजस्थान में आयुर्वेद की स्थिति को लेकर राजस्थान डिप्टी सीएम प्रेमचंद बैरवा से संपर्क करने का प्रयास किया, लेकिन उनकी तरफ से कोई रेस्पांस नहीं आया।
स्वास्थ्य विशेषज्ञों की राय साफ है कि नेशनल आयुष मिशन का शत-प्रतिशत लाभ आम जनता तक तभी पहुंचेगा, जब अफसरशाही खत्म होगी। बजट का सही समय पर इस्तेमाल सुनिश्चित करने के लिए मजबूत मॉनिटरिंग सिस्टम बनाया जाएगा।
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