आखिर क्यों भजनलाल के किसान ज्ञान और वसुंधरा राजे के दर्द पर मचा घमासान, जानिए पूरा मामला
Jaipur: राजस्थान की राजनीति के बारे में कहावत है-यहां की खामोशी किसी बड़े तूफान की आहट होती है। पिछले कुछ दिनों से यहां के सियासी गलियारों में जो हलचल मची है, उसने इस कहावत को सच साबित कर दिया है।
एक तरफ मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा का किसानों को लेकर दिया गया 25-30 दिन वाला बयान विवादों के केंद्र में है तो दूसरी तरफ पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे की 'अपनों को न बचा पाने' वाली बेबसी ने भाजपा के भीतर की गुटबाजी को हवा दे दी है।
इन बयानों ने न केवल विपक्ष को बैठे-बिठाए मुद्दा दे दिया है, बल्कि भाजपा के प्रदेश नेतृत्व और दिग्गज नेताओं के बीच की खाई को भी उजागर कर दिया है।
मुख्यमंत्री का '25-30 दिन' वाला गणित
मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा अक्सर खुद को 'किसान का बेटा' कहकर संबोधित करते हैं। लेकिन 10 अप्रैल को जयपुर में आयोजित ग्लोबल राजस्थान एग्रीटेक मीट (ग्राम 2026) के कर्टेन रेजर कार्यक्रम में उन्होंने कुछ ऐसा कह दिया, जिसने अन्नदाताओं और विपक्ष दोनों को नाराज कर दिया।
सीएम ने मंच से कहा, आज कोई भी हिसाब लगा लेना कि 365 दिन में किसान कितने दिन काम करता है। जो किसान पूरी ड्यूटी समझकर काम कर रहे हैं, उन्हें नुकसान नहीं है। लेकिन जो किसान साल में केवल 25-30 दिन काम करके 11 महीने अपनी आर्थिक स्थिति मजबूत करना चाहते हैं, क्या यह संभव है? मैं यह इसलिए कह रहा हूं, क्योंकि मैं खुद एक किसान हूं।
वे यहीं नहीं रुके। उन्होंने नसीहत देते हुए कहा कि यदि किसान प्रतिदिन केवल चार घंटे भी खेत में मेहनत करे, तो वह कृषि क्षेत्र में प्रथम आ सकता है। उन्होंने जोर दिया कि किसानों को खेती की वैल्यू समझनी होगी।
विपक्ष का पलटवार, कागजी किसान न दें सलाह
सीएम के इस बयान ने सोशल मीडिया पर जंगल की आग की तरह चर्चा बटोरी। कांग्रेस ने इसे हाथों-हाथ लिया और मुख्यमंत्री की घेराबंदी शुरू कर दी। प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष गोविन्द सिंह डोटासरा ने मुख्यमंत्री के चुनावी हलफनामे को ही हथियार बना लिया। उन्होंने पूछा कि जिस व्यक्ति के पास खुद के नाम पर एक बीघा जमीन तक नहीं है, वह किस आधार पर खुद को किसान बताकर उनके संघर्ष का मजाक उड़ा रहा है?
नेता प्रतिपक्ष टीकाराम जूली ने कहा कि खेती केवल बीज डालना और फसल काटना नहीं है। यह हाड़ कंपाने वाली सर्दी में रात भर जागकर खून-पसीना एक करने वाली तपस्या है। उन्होंने हालिया ओलावृष्टि का जिक्र करते हुए कहा कि किसान की फसल बर्बाद हो रही है और सरकार उनके जख्मों पर नमक छिड़क रही है।
वसुंधरा राजे का छलका दर्द और भाजपा में 'जुबानी जंग'
मुख्यमंत्री के बयान से इतर पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे के एक बयान ने भाजपा की आंतरिक राजनीति में भूचाल ला दिया। दो दिन पहले ही झालावाड़ के कामखेड़ा में जनसंवाद के दौरान जब लोगों ने हाईवे अलाइनमेंट बदलने की मांग की, तो राजे भावुक हो गईं। उन्होंने कहा, मेरा (पद) चला गया, मैं अपना ही नहीं बचा सकी, तो आपके लिए क्या कर सकती हूं। मैं अपने लिए कुछ नहीं कर सकी, तो आपके लिए क्या करूं?
इस बयान को राजनीतिक हलकों में उनकी मुख्यमंत्री पद न मिल पाने की टीस के रूप में देखा गया। भाजपा के भीतर इस पर तीखी प्रतिक्रियाएं आईं। प्रदेश भाजपा अध्यक्ष मदन राठौड़ ने बीकानेर में इस पर कड़ा ऐतराज जताया। उन्होंने एक मारवाड़ी कहावत के जरिए राजे पर निशाना साधा, 'डिठी कोनी मूंग की, मांगे घी और दाल, मोदी सु कुन झगड़ो करे, डिठी को नहीं नाल।'
इसका अर्थ साफ था-जो मिला है, उसमें संतोष करना चाहिए। राठौड़ ने स्पष्ट किया कि वसुंधरा राजे पार्टी की राष्ट्रीय उपाध्यक्ष हैं और उनके सभी काम हो रहे हैं। हर बार मुख्यमंत्री बनना जरूरी नहीं है।
नगरीय विकास मंत्री झाबर सिंह खर्रा ने भी सीकर में बहती गंगा में हाथ धोते हुए कहा कि राजनीति एक चंचल क्षेत्र है। यहां किसी का सितारा बुलंद होता है तो किसी का मंद पड़ता है। सफलता सबको नहीं मिलती।
बैकफुट पर वसुंधरा
बयान पर बढ़ते बवाल और पार्टी के भीतर से ही मिल रहे तीखे जवाबों के बाद वसुंधरा राजे ने शनिवार शाम सफाई पेश की। उन्होंने कहा, मेरे खिलाफ गहरा षड्यंत्र रचा जा रहा है। भाषण के अंश को संदर्भ से काटकर गलत अर्थ निकाला गया। मेरा इरादा केवल हाईवे की तकनीकी बाधाओं को समझाना था। मैंने पद को लेकर कोई बात ही नहीं की थी। उन्होंने कहा कि कुछ हितैषी लोग उनकी बातों का गलत रंग निकालकर भ्रम फैलाने में जुटे हैं।
जुबां पर अंकुश क्यों जरूरी?
राजनीति के जानकारों का मानना है कि भाजपा के इन दो शीर्ष नेताओं के बयानों ने पार्टी की ऑल इज वेल वाली छवि को नुकसान पहुंचाया है। किसानों जैसे संवेदनशील मुद्दे पर काम के दिनों की गणना करना राजनीतिक जोखिम भरा साबित हो सकता है।
वसुंधरा राजे की बार-बार छलकती पीड़ा यह दर्शाती है कि राजस्थान भाजपा में अभी भी सत्ता के दो केंद्र बने हुए हैं। हाईकमान के संदेश के बावजूद दूरियां कम नहीं हुई हैं।
सोशल मीडिया के दौर में नेताओं का हर शब्द रिकॉर्ड होता है। जब नेता शीर्ष मुकाम पर हों, तो उनकी जुबां पर अंकुश अनिवार्य है। फिलहाल, बयानों का यह दौर थमने वाला नजर नहीं आता है।
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