12 रुपए की थाली और घट रहा फंड, कैसे सुधरेगा 40 लाख नौनिहालों का भविष्य?
Jaipur: राजस्थान अपनी आन-बान-शान, रंग-रंगीली संस्कृति और मेहमाननवाजी के लिए दुनिया भर में मशहूर है। लेकिन इसी प्रदेश की एक चिंताजनक हकीकत भी है, जो इसके भविष्य को अंदर ही अंदर कमजोर कर रही है।
यह हकीकत है - प्रदेश के मासूमों के चेहरों पर पसरा कुपोषण का साया। आंकड़ों की जुबानी समझें तो आज राजस्थान में लगभग 40 लाख बच्चे कुपोषण की गिरफ्त में हैं। एक तरफ सरकारें स्वस्थ बचपन के बड़े-बड़े दावे करती हैं तो दूसरी तरफ हकीकत यह है कि सरकारी योजनाओं में एक बच्चे के भोजन पर आने वाली लागत किसी मजाक से कम नहीं है।
अब सवाल यह उठता है कि क्या महज 12 से 17 रुपए की थाली से इन 40 लाख बच्चों को कुपोषण के चक्रव्यूह से बाहर निकाला जा सकता है?
कहीं सुधार, कहीं हालात बेकाबू
हालिया रिपोर्ट के मुताबिक राजस्थान में बच्चों के स्वास्थ्य को लेकर जो आंकड़े सामने आए हैं, वे मिले-जुले होने के साथ-साथ बेहद डराने वाले भी हैं। सरकार और समाज के तमाम प्रयासों के बावजूद कुछ मोर्चों पर स्थिति सुधरने की बजाय और बदतर हो गई है।
लंबाई के हिसाब से कम वजन (Wasting): प्रदेश में सबसे बड़ा झटका लंबाई के हिसाब से कम वजन वाले बच्चों के आंकड़ों ने दिया है। साल 2019-21 में ऐसे बच्चे 16.8 फीसदी थे, जो अब खतरनाक ढंग से बढ़कर 31.8 फीसदी हो गए हैं। आज राज्य में लगभग 8 लाख बच्चे इस श्रेणी में हैं, जो गंभीर शारीरिक कमजोरी का शिकार हैं।
उम्र के हिसाब से कम वजन (Underweight): उम्र के मुताबिक कम वजन वाले बच्चों की तादाद में भी इजाफा हुआ है। पहले यह आंकड़ा 27.6 फीसदी था, जो अब बढ़कर 33.3 फीसदी पर पहुंच चुका है। राज्य के करीब 13 लाख बच्चे अपनी उम्र के हिसाब से बेहद कमजोर और अंडरवेट हैं।
ठिगने बच्चे (Stunting): राहत की बस एक बारीक सी लकीर ठिंगने (उम्र के हिसाब से कम लंबाई) बच्चों के आंकड़ों में दिखी है। यह 31.8 फीसदी से घटकर 29.6 फीसदी पर आया है, लेकिन इसके बावजूद आज भी 15 लाख बच्चों का शारीरिक विकास पूरी तरह रुका हुआ है।
गंभीर कुपोषण (Severe Acute Malnutrition): गंभीर रूप से कुपोषित बच्चों की संख्या 7.6 फीसदी से घटकर 6.4 फीसदी हुई है, लेकिन संख्या के लिहाज से देखें तो आज भी 3.5 लाख मासूम जिंदगी और मौत के बीच झूल रहे हैं।
12.13 रुपए में पोषण या सिर्फ पेट भरने की खानापूर्ति?
इन भूखे और कमजोर बच्चों को सहारा देने के लिए केंद्र और राज्य सरकार की ओर से पीएम पोषण योजना चलाई जा रही है। लेकिन इस योजना के तहत तय की गई राशि को देखकर विशेषज्ञ भी हैरान हैं।
बाल वाटिका और प्राथमिक कक्षाओं (कक्षा 1 से 5) के बच्चों के लिए प्रति बच्चा भोजन की लागत मात्र 12.13 रुपए तय है। वहीं, उच्च प्राथमिक कक्षाओं (कक्षा 6 से 8) के लिए यह राशि 17.62 रुपए है।
आज के दौर में जब बाजार में एक कप अच्छी चाय या एक समोसा भी 15 से 20 रुपए का मिलता है, वहां सरकार ₹12 में एक बच्चे को दाल, चावल, सब्जी, रोटी और जरूरी कैलोरी-प्रोटीन देने का दावा कर रही है।
इस महंगाई के जमाने में इतनी कम राशि में केवल बच्चों का पेट किसी तरह भरा जा सकता है, उनका पोषण नहीं किया जा सकता। पौष्टिक दूध, फल या मोटा अनाज (बाजरा-रागी) जो कुपोषण से लड़ने के लिए सबसे जरूरी हैं, वे इस बजट में दूर की कौड़ी नजर आते हैं।
मर्ज बढ़ रहा है और दवा (बजट) घट रही है!
कहते हैं कि जब बीमारी गंभीर हो, तो दवा की खुराक बढ़ा देनी चाहिए। लेकिन राजस्थान में कुपोषण के मामले में उलटी गंगा बह रही है। एक तरफ कमजोर और अंडरवेट बच्चों की संख्या बढ़ रही है, तो दूसरी तरफ पोषण पर होने वाला सरकारी खर्च लगातार सिकुड़ता जा रहा है।
चार साल में राजस्थान को मिला इतना फंड
साल 2023-24 में केंद्र की तरफ से जो फंड करीब 1092 करोड़ रुपए था, वह घटकर अब महज 722 करोड़ रुपए रह गया है। फंड में आई यह करीब 34 फीसदी की कटौती सीधे तौर पर उन बच्चों के निवाले पर असर डाल रही है, जिन्हें इसकी सबसे ज्यादा जरूरत है।
कैसे सुधरेगा नौनिहालों का स्वास्थ्य
विशेषज्ञों का कहना है कि जब बजट कम हो और चुनौती 40 लाख बच्चों को बचाने की हो, तो पारंपरिक तरीकों से काम नहीं चलेगा। इसके लिए कुछ लीक से हटकर और कड़े कदम उठाने होंगे:
बजट का पुनर्मूल्यांकन और जन-भागीदारी (पीपीपी मॉडल): सरकार को प्रति बच्चा आवंटन राशि को महंगाई सूचकांक से जोड़ना होगा। जब तक प्राथमिक स्तर पर इसे कम से कम 25-30 रुपए नहीं किया जाता, तब तक गुणवत्तापूर्ण भोजन नामुमकिन है। कॉर्पोरेट सोशल रिस्पॉन्सिबिलिटी (CSR) के जरिए निजी कंपनियों को आंगनबाड़ियों और स्कूलों को गोद लेने के लिए प्रेरित करना होगा।
स्थानीय और मोटे अनाज (Millets) पर फोकस: राजस्थान बाजरे और ज्वार का गढ़ है। कम लागत में अत्यधिक पोषण देने के लिए मिड-डे मील में गेहूं-चावल के बजाय स्थानीय मोटे अनाजों को अनिवार्य रूप से शामिल करना चाहिए। यह कम बजट में ज्यादा प्रोटीन और आयरन देने का सबसे बेहतरीन तरीका है।
कम्युनिटी किचन और पोषण वाटिका: हर सरकारी स्कूल और आंगनबाड़ी परिसर में पोषण वाटिका (किचन गार्डन) बनाई जाए, जहां स्थानीय सहजन (मुनगा), पालक और हरी सब्जियां उगाई जा सकें। इससे बिना अतिरिक्त खर्च के बच्चों को ताजा माइक्रो-न्यूट्रिएंट्स मिल सकेंगे।
सख्त मॉनिटरिंग और लीकेज पर रोक: जो 722 करोड़ रुपए का बजट है, उसका एक-एक पैसा सीधे बच्चे की थाली तक पहुंचे, इसके लिए डिजिटल ट्रैकिंग और सोशल ऑडिट (जनता द्वारा जांच) जरूरी है, ताकि भ्रष्टाचार के कारण बच्चों का हक न मारा जा सके।
FAQ
- राजस्थान में कितने बच्चे कुपोषित हैं, इन पर प्रति बच्चा कितना खर्च होता है?
राजस्थान में लगभग 40 लाख बच्चों पर कुपोषण की मार है। पीएम पोषण योजना के तहत इनके पोषण पर प्रति बच्चा खुराक पर 12 से 17 रुपए खर्च किया जाता है। - पोषण पर केंद्रीय फंड की क्या स्थिति है?
साल 2023-24 में केंद्र की तरफ से राजस्थान को जो फंड करीब 1092 करोड़ रुपए दिया जाता था, वह घटकर अब 2025-26 में महज 722 करोड़ रुपए रह गया है। फंड में आई करीब 34 फीसदी की यह कटौती सीधे तौर पर बच्चों के निवाले पर असर डाल रही है।
ये भी पढ़ें:-
राजस्थान को मिलेगा यमुना का पानी, बांध बनाने के लिए 6 राज्यों ने दी सहमति
राहुल का कोटा से शिक्षा पर बड़ा अभियान, मोदी सरकार को घेरने की तैयारी
NEET पेपरलीक पर राहुल का छात्रों से संवाद आज, जानिए कोटा दौरे का पूरा शेड्यूल
8 मौतों का मुख्य आरोपी कयूम खान अलीगढ़ से गिरफ्तार, याकूब-फिरोज अब भी फरार