निकाय चुनाव: वोट जनता का, राज रिसॉर्ट का, 21 सितंबर तक होटल मालिक ही असली रिटर्निंग ऑफिसर!
समझें क्या है पूरा मामला
- राजस्थान में पहले फेज के मतदान के बाद से ही प्रत्याशियों की बाड़ेबंदी शुरू।
- प्रत्याशियों से स्मार्टफोन ज़ब्त और साधारण फ़ोन से सिर्फ घर पर बात की इजाज़त।
- भाजपा ने प्रशिक्षण वर्ग और तीर्थयात्रा की आड़ में पार्षदों की बाड़ेबंदी शुरू की।
- कांग्रेस आंतरिक गुटबाजी के बीच सेंधमारी और क्रॉस वोटिंग रोकने में जुटी।
- शुक्रवार को दूसरे चरण की वोटिंग खत्म होते ही दोनों पार्टियों की निगरानी और बढ़ेगी।
राजस्थान के स्थानीय निकाय चुनाव के प्रथम चरण की वोटिंग पूरी होते ही चुनावी समर का मैदान अब पोलिंग बूथों से हटकर आलीशान रिसॉर्ट्स और होटलों में स्थानांतरित हो चुका। ईवीएम में प्रत्याशियों का भविष्य कैद होते ही सत्ताधारी और विपक्षी खेमे में अपने-अपने संभावित विजेताओं को संजोकर रखने की एक रणनीतिक जंग छिड़ चुकी,जिसमें हर एक सीट निकाय के शीर्ष पद का फैसला तय करेगी।
प्रत्याशियों की बाड़ेबंदी में फिलहाल भाजपा कांग्रेस से आगे है। भाजपा सत्तासीन होने और एकजुट होकर भरपूर फायदा उठा रही जबकि कांग्रेस गुटबाजी और सत्ता से बाहर होने का नुकसान झेल रही।
प्रशिक्षण और धर्म यात्रा के नाम पर उम्मीदवारों की पहरेदारी
भाजपा ने अपनी बाड़ेबंदी की योजना को राजनीतिक चकाचौंध से दूर एक नया रंग दिया है। जयपुर देहात उत्तर और दक्षिण सहित अलग-अलग मंडलों में पार्टी ने इसे प्रशिक्षण वर्ग और धार्मिक दर्शन का रूप दिया है। शाहपुरा, मनोहरपुर जैसे इलाकों में प्रत्याशियों को ठहराया गया है जबकि पुष्कर, सालासर बालाजी, खाटूश्यामजी और सवाई माधोपुर के त्रिनेत्र गणेश मंदिर जैसे पावन स्थलों के दर्शन का हवाला देकर प्रत्याशियों की आवाजाही को एक छत के नीचे सीमित रखा जा रहा।
भीतरखाने समीक्षा और भावी अनुशासन का पाठ
इन धार्मिक और संगठनात्मक शिविरों का मकसद सिर्फ बाड़ेबंदी तक सीमित नहीं, बल्कि इसके जरिए पार्टी जमीनी स्तर का वास्तविक लेखा-जोखा भी तैयार कर रही। प्रत्याशियों से स्थानीय नेताओं, कार्यकर्ताओं के सहयोग और चुनाव के दौरान सामने आई रणनीतिक कमियों पर फीडबैक लिया जा रहा। प्रत्याशी भी पार्टी पदाधिकारियों, विधायकों व मंत्रियों की ओर से चुनाव में मिली मदद या असहयोग की जानकारी भी खुलकर दे रहे।
इसके साथ ही मतगणना के दिन अपनाई जाने वाली सावधानियों और कानूनी औपचारिकताओं पर भी उम्मीदवारों को मुस्तैद रहने की सीख दी जा रही है।
कांग्रेस को क्रॉस वोटिंग का डर
दूसरी ओर कांग्रेस भी बाड़ेबंदी की तैयारी कर रही। कांग्रेस ने भी बेहद कड़े मुकाबले वाले और संवेदनशील क्षेत्रों में उम्मीदवारों को मतदान के तुरंत बाद ही सुरक्षित ठिकानों पर भेजने की प्रक्रिया शुरू कर दी। राजनीतिक सेंधमारी या क्रॉस वोटिंग के किसी भी अंदेशे को खत्म करने के लिए जरूरत पड़ने पर प्रत्याशियों को राज्य की सीमाओं से बाहर भेजने तक के विकल्प खुले रखे हैं। लेकिन,इस काम में चेयरमैन या सभापति के दावेदारों के भरोसे ही है। जबकि भाजपा को सरकार होने फायदा मिल रहा है।
स्मार्टफोन पर पाबंदी और ठिकानों में बदलाव की रणनीति
किसी भी संभावित सेंधमारी को रोकने के लिए प्रत्याशियों से उनके स्मार्टफोन जमा कराने और केवल सीमित बातचीत के लिए साधारण फोन देने की योजना है। इसके अलावा, पार्षदों को लगातार एक स्थान पर न रखकर हर 36 से 48 घंटे में उनकी लोकेशन बदलने पर काम भी होगा। महिला प्रत्याशियों के साथ परिवार के केवल एक सदस्य को रहने की अनुमति का प्रावधान रखा गया है।
निर्दलीय और बागियों का बढ़ता राजनीतिक वजन
बोर्ड बनाने के इस जोड़-तोड़ में दोनों मुख्य राजनीतिक दलों के अलावा मजबूत निर्दलीय और बागी प्रत्याशी सबसे अहम कड़ी बनकर उभरे हैं। विशेषकर उन निकायों में जहां बहुमत का आंकड़ा किसी एक दल के पास स्पष्ट नहीं दिखता। ऐसे निकायों में एक-एक निर्दलीय पार्षद का रुख पूरे बोर्ड का गणित बदलने की ताकत रखता है। इसी कारण दोनों दलों के शीर्ष रणनीतिकार अपने-अपने क्षेत्र के मजबूत निर्दलीयों के साथ लगातार संपर्क साधने में जुटे हैं।
14 से 21 सितंबर तक की सियासी समय-सारणी
14 सितंबर को मतगणना के दिन से इस राजनीतिक चक्रव्यूह का असली दौर शुरू होगा। मतगणना में हारने वाले प्रत्याशियों को बाड़ेबंदी से छोड़ दिया जाएगा। जबकि जीतने वाले पार्षदों पर पहरा 20 सितंबर को होने वाले महापौर व अध्यक्ष चुनाव और 21 सितंबर को उपमहापौर व उपाध्यक्ष पद के चुनाव तक जारी रहेगा। नतीजतन, नतीजों की औपचारिक घोषणा से लेकर बोर्ड गठन के अंतिम दिन तक राजस्थान के राजनीतिक गलियारों में यह खींचतान चरम पर रहने वाली है।
यह खबरें भी पढ़ें...
जयपुर नगर निगम चुनाव: कांग्रेस ने जारी किया जयपुर 2032 पांच वर्षीय जन-घोषणापत्र
जयपुर निगम चुनाव: 99 उम्मीदवार करोड़पति, जानें उम्मीदवारों की संपत्ति का लेखा-जोखा
नगर निगम चुनाव में 80% से ज्यादा पुराने चेहरे हटाए, 9 पार्षदों ने बदल ली अपनी पार्टी