वन मंत्री के घर में 17 करोड़ का पौधरोपण घोटाला, जानिए कैसे दबाने में जुटा विभाग
Jaipur: राजस्थान का वन विभाग पौधरोपण घोटाले की जांच रिपोर्ट पर 15 महीने से कुंडली मार कर बैठा है। यह मामला राजस्थान के वन मंत्री संजय शर्मा के गृह जिले अलवर का है। वन अधिकारियों ने एक ही वन क्षेत्र में 2023-24 में अग्रिम मृदा कार्य के लिए 17 करोड़ रुपए की अवैध निकासी कर ली।
रोचक बात यह है कि वन विभाग की आंतरिक जांच में भ्रष्टाचार के आरोपों की पुष्टि हुई। यह रिपोर्ट एक साल तक धूल फांकती रही। इसके बाद दूसरी जांच के आदेश दिया गया।
दूसरी जांच रिपोर्ट में कहा गया कि भुगतान बैंक ट्रांसफर के जरिए हुआ था न कि नकद, इसलिए किसी (एसीबी) जांच की आवश्यकता नहीं है। अब, हर कोई तीसरी रिपोर्ट का इंतजार कर रहा है।
बना ली फर्जी वन सुरक्षा समितियां
यह राजस्थान वन विभाग का एक अनोखा मामला है, जो अपनी ही जांच समिति की सिफारिशों को सवा साल से दबाए बैठा है।
जांच में खुलासा हुआ कि वर्ष 2015-16 से लेकर 2024-25 के बीच वन विभाग के कुछ अधिकारियों ने मिलीभगत कर फर्जी ग्राम वन सुरक्षा एवं प्रबंध समितियों का गठन किया। इन समितियों के नाम पर सरकारी राशि का जमकर दुरुपयोग किया गया।
रिपोर्ट के अनुसार केवल समितियों के माध्यम से ही 15 करोड़ 54 लाख 78 हजार 82 रुपए की भारी-भरकम राशि का गबन किया गया। राजगढ़ क्षेत्र में पौधरोपण और मिट्टी के कार्यों के लिए बनाई गई 7 समितियां पूरी तरह फर्जी पाई गईं।
पहाड़ों पर कागजी पौधरोपण
वन मंडल अलवर की राजगढ़ रेंज में वर्ष 2023-24 के दौरान मिट्टी और पौधरोपण के कार्यों के मूल्यांकन में पाया गया कि जिन 11 स्थानों पर कार्य दिखाया गया, वे पौधरोपण के लिए उपयुक्त ही नहीं थे। यानी यह क्षेत्र पहाड़ी था।
कई इलाकों में ढलान 20 प्रतिशत से अधिक थी, जहां नियमानुसार पौधरोपण संभव ही नहीं था, फिर भी वहां कागजों पर काम दिखाकर करोड़ों रुपए खर्च कर दिए गए।
कुल 642 हेक्टेयर क्षेत्र में से केवल 249 हेक्टेयर में ही काम हुआ, जबकि बाकी का बजट डकार लिया गया। इससे सरकारी कोष को सीधे तौर पर 2 करोड़ 3 लाख 46 हजार रुपएये की वित्तीय हानि हुई है।
इन्हें अधिकारियों को पाया दोषी
अलवर के राजगढ़ रेंज में (VFPMCs) में हुए भ्रष्टाचार को लेकर राजस्थान के वन बल प्रमुख (HoFF) ने दिसंबर 2024 में जयपुर के तत्कालीन मुख्य वन संरक्षक (CCF) को जांच के आदेश दिए थे।
मुख्य वन संरक्षक राजीव चतुर्वेदी के नेतृत्व में गठित जांच समिति ने इस घोटाले में कई बड़े नामों को दोषी पाया है। रिपोर्ट में तत्कालीन अलवर डीएफओ अपूर्व कृष्ण श्रीवास्तव, डीएफओ राजेंद्र हुड्डा, राजगढ़ के तत्कालीन क्षेत्रीय वन अधिकारी दीपक मीणा और प्रभारी वनपालों की भूमिका को संदिग्ध माना गया।
फरवरी 2025 में सौंपी गई जांच रिपोर्ट में मामले की गंभीरता को देखते हुए सिफारिश की कि दोषी लोकसेवकों के खिलाफ सख्त कानूनी और विभागीय कार्रवाई की जाए। गबन की गई करोड़ों की राशि की वसूली की जाए। इस मामले की गहराई और नेटवर्क को देखते हुए इसकी एसीबी जांच कराई जाए।
वन विभाग के सूत्रों का कहना है कि एसीबी (ACB) जांच से राज्य में और भी गहरे सिस्टेमिक भ्रष्टाचार का खुलासा हो सकता है, जहां हाल के वर्षों में पौधारोपण योजनाओं पर सालाना अनुमानित 600 से 800 करोड़ रुपए खर्च किए गए हैं।
दूसरी जांच में एसीबी जांच से इनकार
अप्रैल और जुलाई 2025 के बीच जांच अधिकारी ने वन बल प्रमुख (HoFF) अरिजीत बनर्जी को तीन रिमाइंडर, जालसाजी के अतिरिक्त सबूत और वरिष्ठ वन अधिकारियों के खिलाफ कारण बताओ नोटिस जारी करने के प्रस्ताव भेजे। बनर्जी ने इन पत्रों को कार्रवाई के लिए प्रधान मुख्य वन संरक्षक (प्रशासन) पीके उपाध्याय को भेज दिया।
21 जुलाई को बनर्जी मेडिकल लीव पर चले गए। उपाध्याय ने HoFF का तदर्थ प्रभार संभाल लिया। जांच रिपोर्ट सौंपे जाने के छह महीने बाद अगस्त में उपाध्याय ने राज्य सरकार को एसीबी जांच के लिए प्रस्ताव भेजा।
राज्य सेवा के अधिकारियों की संलिप्तता का हवाला देते हुए दिसंबर में उप सचिव (वन) ने भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम की धारा 17A के तहत अतिरिक्त मुख्य सचिव (वन विभाग) से पूर्व स्वीकृति के लिए एक प्रस्ताव मांगा।
रोचक बात यह है कि 19 फरवरी 2026 को उपाध्याय ने वर्तमान सीसीएफ को मामले की दोबारा जांच करने का निर्देश दिया। उन्हें 16 मार्च को नया जांच अधिकारी नियुक्त कर दिया।
30 मार्च को सौंपी गई इस नई जांच रिपोर्ट में निष्कर्ष निकाला गया कि यह मामला एसीबी को सौंपने के लिए उपयुक्त नहीं है, क्योंकि अधिकांश भुगतान नकद के बजाय बैंक ट्रांसफर के माध्यम से किए गए थे।
फिर एक और जांच की सिफारिश
एक वरिष्ठ वन अधिकारी का कहना है कि इस रिपोर्ट ने मुख्यालय में हलचल मचा दी। बैंक ट्रांसफर से यह साबित नहीं होता कि वास्तविक श्रमिकों को पैसा मिला है। इस योजना के तहत कुछ लाभार्थी स्पष्ट रूप से स्थानीय व्यवसाय चलाते हैं।
सूत्रों ने बताया कि वन विभाग के अतिरिक्त मुख्य सचिव ने 16 अप्रैल को जयपुर में एक बैठक में एसीबी जांच के लिए एक औपचारिक प्रस्ताव मांगा। अगले ही दिन रिकॉर्ड दिखाते हैं कि उपाध्याय ने 15 दिनों के भीतर दोनों जांच रिपोर्टों के बीच के अंतर की जांच करने के लिए एक और समिति का गठन कर दिया।
इसी बीच, अरिजीत बनर्जी ने 18 मई को दोबारा HoFF का पदभार संभाल लिया। अब उनकी दलील है कि इस मामले में और स्पष्टीकरण की आवश्यकता है। उचित प्रक्रिया का पालन किया जा रहा है।
पीसीसीएफ (प्रशासन) उपाध्याय ने इस मामले पर टिप्पणी करने से इनकार कर दिया। उनके एक सहयोगी का कहना है कि चूंकि यह अनियमितताएं एक दशक से अधिक समय से चल रही हैं, इसलिए एसीबी जांच को मंजूरी देने से पहले आरोपी व्यक्तियों की पूरी सूची मांगी गई है।
विरोधाभास के कारण तीसरी जांच
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