रेट ऑर्डर में हेराफेरी, DOP सचिव को जांच के आदेश, हाईकोर्ट ने कहा-कहीं बलि का बकरा तो नहीं बनाया

Mukesh Sharma | May 03, 2026, 17:49 IST
Photograph: (the sootr)
राजस्थान हाईकोर्ट ने रेट ऑर्डर में हेराफेरी मामले में डीओपी सचिव को जांच के आदेश दिए। अदालत ने कहा कि रेट रजिस्ट्रार ने एक क्लर्क को जिम्मेदार ठहराया, लेकिन उसका नाम शपथ पत्र में नहीं था।

News In Short

  • राजस्थान हाईकोर्ट ने डीओपी सचिव को रेट ऑर्डर में हेराफेरी की जांच के आदेश दिए।
  • अदालत ने कहा कि रेट रजिस्ट्रार ने क्लर्क को जिम्मेदार ठहराया, लेकिन उसका नाम शपथ पत्र में नहीं है।
  • हाईकोर्ट ने जांच करने को कहा कि क्या क्लर्क को बलि का बकरा बनाया गया है।
  • 18 मई तक जांच रिपोर्ट पेश करने का आदेश, अनुशासनात्मक कार्रवाई की चेतावनी दी।
  • याचिकाकर्ता ने कोर्ट को बताया कि 8 अगस्त को आदेश देने से पहले मामला ट्रिब्यूनल में लिस्ट ही नहीं था।

News In Detail

राजस्थान सिविल सेवा अपील अधिकरण (रेट) के ऑर्डर में हेराफेरी से जुड़े मामले में राजस्थान हाईकोर्ट ने डीओपी सचिव को जांच के आदेश दिए हैं। जस्टिस रवि चिरानिया की अदालत ने कार्मिक विभाग के सचिव को कहा है कि वह पूरे मामले की जांच करते हुए विशेष रूप से रेट रजिस्ट्रार द्वारा पेश शपथ पत्र की भी जांच करें।



अदालत ने कहा-रेट रजिस्ट्रार ने ऑर्डर में हेराफेरी के लिए एक क्लर्क को जिम्मेदार ठहराया हैं। लेकिन जिस क्लर्क की गलती बताई गई है, उसका नाम तक शपथ पत्र में नहीं बताया गया हैं। ऐसे में यह जवाब संतोषजनक प्रतीत नहीं होता हैं।



ऐसे में डीओपी सैकेट्री इस बात की भी जांच करें कि क्या संबंधित क्लर्क की वास्तव में इसमें गलती है या फिर उसे बलि का बकरा बनाया गया हैं। अदालत ने कहा कि अगर रेट रजिस्ट्रार का आचरण कोर्ट को दी गई सूचना के विपरीत पाया जाता है तो उनके खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई की जाए।



अदालत ने जांच रिपोर्ट 18 मई तक पेश करने के आदेश दिए। कोर्ट ने श्रवण लाल खोरवाल की याचिका पर सुनवाई करते हुए यह आदेश दिए।



ओपन कोर्ट में स्टे, ऑर्डर पर ना

अधिवक्ता युवराज सामंत ने बताया कि पिछली सुनवाई पर हाईकोर्ट ने रेट की कार्यशैली को लेकर हमारे द्वारा लगाए गए आरोपों पर रजिस्ट्रार से स्पष्टीकरण मांगा था। हमने कोर्ट को बताया कि ट्रिब्यूनल में सुनवाई के दौरान न्याय प्रक्रिया के साथ गंभीर खिलवाड़ हुआ है।



रेट ने ओपन कोर्ट में याचिकाकर्ता के पक्ष में स्टे दिया और बाद में किसी ओर दिन की सुनवाई दिखाते हुए स्टे ऑर्डर देने से मना कर दिया।



केस लिस्ट हुए बिना आदेश कैसे

उन्होने कोर्ट को बताया कि याचिकाकर्ता को जुलाई 2026 में व्याख्याता पद पर पदोन्नति दी गई थी। लेकिन जून 2025 में सरकार ने उनकी पदोन्नति को रद्द कर दिया। जिसे उन्होने रेट में चुनौती दी। रेट ने 15 जुलाई 2025 को सुनवाई के बाद पदोन्नति रद्द करने के आदेश पर रोक लगा दी।



ट्रिब्यूनल की आधिकारिक वेबसाइट पर भी उस समय स्टे ग्रांट होना बताया गया। लेकिन याचिकाकर्ता को तब धक्का लगा, जब उसे लिखित आदेश मिला। यह आदेश 8 अगस्त 2025 का था, जिसमें स्टे देने से मना कर दिया गया था।



याचिकाकर्ता ने हाईकोर्ट में तथ्य पेश करते हुए कहा- 8 अगस्त को उसका मामला ट्रिब्यूनल में लिस्ट ही नहीं था। फिर रेट ने इस दिन का आदेश कैसे दे दिया। इस आदेश को अवैध और दुर्भावनापूर्ण बताते हुए हाईकोर्ट से इसे रद्द करने की अपील की है।



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