CBI के पांच पूर्व अफसरों पर झूठी गवाही का मामला रुका, दिल्ली हाईकोर्ट ने अपने ही आदेश पर लगाई रोक
Arun Tiwari | Nov 05, 2026, 13:55 IST
CBI के पूर्व अधिकारियों को राहत, झूठी गवाही मामले की कार्रवाई पर रोक
दिल्ली हाईकोर्ट ने CBI के पांच पूर्व वरिष्ठ अधिकारियों के खिलाफ झूठी गवाही और अदालत में गलत तथ्य पेश करने के मामले में शुरू होने वाली कार्रवाई पर फिलहाल रोक लगा दी है। हाईकोर्ट ने 6 अक्टूबर को दिए अपने उस आदेश को अगली सुनवाई तक स्थगित कर दिया है, जिसमें छह पूर्व और मौजूदा CBI अधिकारियों के खिलाफ आपराधिक शिकायत दर्ज कराने का निर्देश दिया गया था।
जस्टिस मिनी पुष्कर्णा की अदालत ने मामले की अगली सुनवाई फरवरी 2027 में तय की है।
यह मामला पूर्व भारतीय राजस्व सेवा (IRS) अधिकारी अशोक कुमार अग्रवाल से जुड़ा है। उन्होंने CBI अधिकारियों पर अदालत के सामने गलत जानकारी पेश करने का आरोप लगाते हुए कार्रवाई की मांग की थी। हाईकोर्ट की जस्टिस मधु जैन की पीठ ने 6 अक्टूबर को उनकी याचिका स्वीकार करते हुए संबंधित अधिकारियों के खिलाफ शिकायत दर्ज कराने का निर्देश दिया था।
CBI के सेवानिवृत्त डीएसपी सुशील दीवान और रमन त्यागी ने हाईकोर्ट में याचिका दायर कर 6 अक्टूबर के आदेश को वापस लेने (रिकॉल) की मांग की थी। उनका तर्क था कि इस मामले में उन्हें अपना पक्ष रखने का उचित अवसर नहीं दिया गया।
सुशील दीवान ने आरोप लगाया कि उन्हें अशोक कुमार अग्रवाल की ओर से दायर अपील, अतिरिक्त दस्तावेजों और अन्य कानूनी दलीलों की प्रतियां नहीं दी गईं। उनका कहना था कि सुनवाई की तारीख आगे बढ़ाने के लिए दाखिल आवेदन भी उन्हें या उनके वकील को निर्धारित पते पर नहीं भेजा गया। इसके बजाय कथित तौर पर गलत ई-मेल पते पर नोटिस भेज दिया गया।
दीवान के मुताबिक, हाईकोर्ट ने बिना उन्हें सूचना दिए मामले की सुनवाई की तारीख 4 नवंबर से बदलकर 22 सितंबर कर दी। इसके बाद उनकी अनुपस्थिति में सुनवाई की गई और उसी दिन फैसला सुरक्षित रख लिया गया।
उन्होंने यह भी दलील दी कि अशोक कुमार अग्रवाल की अपील में छह अधिकारियों के खिलाफ शिकायत दर्ज कराने की मांग की गई थी, लेकिन केवल उन्हें ही पक्षकार बनाया गया। बाकी पांच अधिकारियों को भी नोटिस नहीं दिया गया। याचिकाकर्ताओं ने दलील दी कि यह प्रक्रिया दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 341 के प्रावधानों के अनुरूप नहीं थी।
दरअसल, CBI ने अशोक कुमार अग्रवाल के खिलाफ आय से अधिक संपत्ति रखने के आरोप में मामला दर्ज किया था। जनवरी 2016 में दिल्ली हाईकोर्ट ने उनके खिलाफ अभियोजन की मंजूरी को अवैध ठहराते हुए उन्हें आरोपों से मुक्त कर दिया था।
इसके बाद CBI ने इस फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती देने पर विचार किया। हालांकि, जून 2016 में कानून मंत्रालय ने राय दी कि इस फैसले के खिलाफ अपील करने का कोई उचित आधार नहीं है। जुलाई 2016 में कार्मिक एवं प्रशिक्षण विभाग (DoPT) ने यह जानकारी CBI को दे दी थी।
बाद में अशोक कुमार अग्रवाल ने जांच के दौरान जब्त किए गए दस्तावेज वापस मांगे। इस पर CBI ने 2 अगस्त 2016 को अदालत में जवाब दाखिल करते हुए कहा कि आगे की कानूनी कार्रवाई को लेकर मंत्रालय के साथ पत्राचार चल रहा है।
हालांकि, हाईकोर्ट ने इस जवाब के पुराने ड्राफ्ट और विभागीय फाइलों की जांच में पाया कि शुरुआती ड्राफ्ट में स्पष्ट रूप से दर्ज था कि सुप्रीम कोर्ट में अपील करने का प्रस्ताव मंत्रालय ने खारिज कर दिया था। बाद के ड्राफ्ट में इस तथ्य को हटा दिया गया और उसकी जगह मंत्रालय से पत्राचार जारी होने की बात लिख दी गई।
हाईकोर्ट ने इस बदलाव को महज शब्दों की गलती मानने से इनकार किया था। अदालत के मुताबिक, उपलब्ध दस्तावेजों से प्रथम दृष्टया यह आधार बनता है कि संबंधित अधिकारियों ने ऐसी जानकारी अदालत के सामने रखी, जो पहले से उपलब्ध विभागीय रिकॉर्ड के विपरीत थी।
6 अक्टूबर के फैसले में हाईकोर्ट ने सुशील दीवान, विनीत विनायक, अमित कुमार, रमन त्यागी, प्रेम कुमार गौतम और मोहम्मद आजाद के खिलाफ लिखित शिकायत दर्ज कराने का निर्देश दिया था। अदालत ने माना था कि मामले में जांच आगे बढ़ाना न्यायहित में जरूरी है।
हालांकि, अब जस्टिस मिनी पुष्कर्णा ने दोनों पूर्व अधिकारियों की याचिका पर अंतरिम राहत देते हुए पुराने आदेश के संबंधित निर्देशों को अगली सुनवाई तक स्थगित कर दिया है। अदालत ने कहा कि याचिकाकर्ताओं ने प्रथम दृष्टया अपना मामला स्थापित किया है। उनके पक्ष में सुविधा का संतुलन है और अंतरिम राहत नहीं मिलने पर उन्हें ऐसी क्षति हो सकती है, जिसकी भरपाई संभव नहीं होगी।
फिलहाल छह अधिकारियों के खिलाफ शिकायत दर्ज कराने की कार्रवाई रुकी रहेगी। अदालत फरवरी 2027 में इस मामले की अगली सुनवाई करेगी।
यह मामला पूर्व भारतीय राजस्व सेवा (IRS) अधिकारी अशोक कुमार अग्रवाल से जुड़ा है। उन्होंने CBI अधिकारियों पर अदालत के सामने गलत जानकारी पेश करने का आरोप लगाते हुए कार्रवाई की मांग की थी। हाईकोर्ट की जस्टिस मधु जैन की पीठ ने 6 अक्टूबर को उनकी याचिका स्वीकार करते हुए संबंधित अधिकारियों के खिलाफ शिकायत दर्ज कराने का निर्देश दिया था।
दो पूर्व अधिकारियों ने मांगा आदेश वापस लेने का मौका
सुशील दीवान ने आरोप लगाया कि उन्हें अशोक कुमार अग्रवाल की ओर से दायर अपील, अतिरिक्त दस्तावेजों और अन्य कानूनी दलीलों की प्रतियां नहीं दी गईं। उनका कहना था कि सुनवाई की तारीख आगे बढ़ाने के लिए दाखिल आवेदन भी उन्हें या उनके वकील को निर्धारित पते पर नहीं भेजा गया। इसके बजाय कथित तौर पर गलत ई-मेल पते पर नोटिस भेज दिया गया।
अफसरों को नहीं मिली सूचना
उन्होंने यह भी दलील दी कि अशोक कुमार अग्रवाल की अपील में छह अधिकारियों के खिलाफ शिकायत दर्ज कराने की मांग की गई थी, लेकिन केवल उन्हें ही पक्षकार बनाया गया। बाकी पांच अधिकारियों को भी नोटिस नहीं दिया गया। याचिकाकर्ताओं ने दलील दी कि यह प्रक्रिया दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 341 के प्रावधानों के अनुरूप नहीं थी।
क्या है पूरा मामला?
इसके बाद CBI ने इस फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती देने पर विचार किया। हालांकि, जून 2016 में कानून मंत्रालय ने राय दी कि इस फैसले के खिलाफ अपील करने का कोई उचित आधार नहीं है। जुलाई 2016 में कार्मिक एवं प्रशिक्षण विभाग (DoPT) ने यह जानकारी CBI को दे दी थी।
बाद में अशोक कुमार अग्रवाल ने जांच के दौरान जब्त किए गए दस्तावेज वापस मांगे। इस पर CBI ने 2 अगस्त 2016 को अदालत में जवाब दाखिल करते हुए कहा कि आगे की कानूनी कार्रवाई को लेकर मंत्रालय के साथ पत्राचार चल रहा है।
हालांकि, हाईकोर्ट ने इस जवाब के पुराने ड्राफ्ट और विभागीय फाइलों की जांच में पाया कि शुरुआती ड्राफ्ट में स्पष्ट रूप से दर्ज था कि सुप्रीम कोर्ट में अपील करने का प्रस्ताव मंत्रालय ने खारिज कर दिया था। बाद के ड्राफ्ट में इस तथ्य को हटा दिया गया और उसकी जगह मंत्रालय से पत्राचार जारी होने की बात लिख दी गई।
हाईकोर्ट ने इस बदलाव को महज शब्दों की गलती मानने से इनकार किया था। अदालत के मुताबिक, उपलब्ध दस्तावेजों से प्रथम दृष्टया यह आधार बनता है कि संबंधित अधिकारियों ने ऐसी जानकारी अदालत के सामने रखी, जो पहले से उपलब्ध विभागीय रिकॉर्ड के विपरीत थी।
छह अधिकारियों के खिलाफ शिकायत का था आदेश
हालांकि, अब जस्टिस मिनी पुष्कर्णा ने दोनों पूर्व अधिकारियों की याचिका पर अंतरिम राहत देते हुए पुराने आदेश के संबंधित निर्देशों को अगली सुनवाई तक स्थगित कर दिया है। अदालत ने कहा कि याचिकाकर्ताओं ने प्रथम दृष्टया अपना मामला स्थापित किया है। उनके पक्ष में सुविधा का संतुलन है और अंतरिम राहत नहीं मिलने पर उन्हें ऐसी क्षति हो सकती है, जिसकी भरपाई संभव नहीं होगी।
फिलहाल छह अधिकारियों के खिलाफ शिकायत दर्ज कराने की कार्रवाई रुकी रहेगी। अदालत फरवरी 2027 में इस मामले की अगली सुनवाई करेगी।
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