आरोपी को अपने खिलाफ साक्ष्य देने को नहीं कर सकते बाध्य, हाई कोर्ट की अहम टिप्पणी

Mukesh Sharma | Mar 18, 2026, 14:25 IST
Photograph: (the sootr)
राजस्थान हाई कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि चुप रहने का अधिकार आपराधिक न्याय प्रणाली का मूल आधार है। यह अधिकार संविधान के अनुच्छेद 20(3) के तहत संरक्षित है। अदालत ने कहा कि किसी भी आरोपी को अपने खिलाफ साक्ष्य देने के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता।

News In Short

  • राजस्थान हाई कोर्ट ने कहा, चुप रहने का अधिकार न्याय का मूल स्तंभ
  • कोर्ट ने कहा कि नहीं कर सकते आरोपी को अपने खिलाफ साक्ष्य देने को बाध्य।
  • अदालत ने कहा, नार्को टेस्ट के लिए दी गई सहमति भी वापस ली जा सकती है
  • कोर्ट ने यह भी कहा, जबरन टेस्ट कराना होगा संविधान के खिलाफ।
  • हाई कोर्ट ने निचली अदालत के आदेश को किया निरस्त।

News In Detail

राजस्थान हाई कोर्ट ने कहा है कि आपराधिक न्याय प्रणाली में चुप रहने के अधिकार संविधान के तहत संरक्षित अधिकार है। जस्टिस अनूप कुमार ढंड ने कहा है कि किसी भी आरोपी को अपने ही विरुद्ध सबूत या गवाही देने के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता। यह अधिकार भारतीय संविधान के अनुच्छेद 20(3) के तहत संरक्षित है। अदालत ने कहा है कि यह सिद्धांत निष्पक्ष न्याय की आधारशिला है। यह आरोपी को आत्म-अपराध स्वीकार करने के दबाव, जबरदस्ती और अनुचित प्रभाव से बचाता है। क्यों कि आपराधिक न्याय प्रणाली में अभियोजन पक्ष पर ही आरोप सिद्ध करने की जिम्मेदारी होती है और आरोपी को चुप रहने का पूरा अधिकार है।



यह है मामला

मामला झुंझुनूं जिले के एक आरोपी सुभाष सैनी का है। उसने पहले नार्को एनालिसिस टेस्ट के लिए सहमति दे दी थी। जांच एजेंसी के आवेदन पर मजिस्ट्रेट ने इस परीक्षण की अनुमति भी प्रदान कर दी थी। लेकिन कुछ समय बाद आरोपी ने अपनी सहमति वापस लेने के लिए अर्जी दी थी। उसका कहना था कि वह अपने मौलिक अधिकारों का प्रयोग करना चाहता है। उसे स्वयं के खिलाफ सबूत देने के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता। ट्रायल कोट्र ने कहा कि एक बार दी गई सहमति वापस नहीं ली जा सकती और अर्जी खारिज कर दी। इस आदेश को सैनी ने हाईकोर्ट में चुनौती दी थी।



स्थाई नहीं होती सहमति

हाईकोर्ट ने ट्रायल कोर्ट के आदेश को रद्ध करते हुए कहा है कि सहमति कोई स्थायी या अपरिवर्तनीय निर्णय नहीं होती। व्यक्ति को इसे वापस लेने का पूरा अधिकार है। किसी आरोपी को उसकी इच्छा के विरुद्ध नार्को टेस्ट के लिए बाध्य करना उसके मौलिक अधिकारों का उल्लंघन है।



अदालत ने कहा कि ऐसे परीक्षण व्यक्ति की स्वतंत्र इच्छा और मानसिक नियंत्रण को प्रभावित करते हैं। क्योंकि इसमें दवाओं के प्रभाव में व्यक्ति से जानकारी प्राप्त की जाती है। इस स्थिति में दी गई जानकारी न तो स्वैच्छिक होती है और न ही पूरी तरह विश्वसनीय। इसलिए इसे साक्ष्य के रूप में स्वीकार करना भी उचित नहीं है।



परीक्षण से इनकार का अधिकार

अदालत ने अपने फैसले में सुप्रीम कोर्ट के फैसलों के हवाले से कहा है कि नार्को, पॉलीग्राफ और ब्रेन मैपिंग जैसे परीक्षण केवल स्वतंत्र और सूचित सहमति के आधार पर ही किए जा सकते हैं। आरोपी को न केवल ऐसे परीक्षण से इनकार करने का अधिकार है, बल्कि पहले दी गई सहमति को भी वापस लिया जा सकता है। हाईकोर्ट ने मजिस्ट्रेट के आदेशों को रद्द करते हुए याचिका को स्वीकार कर लिया। अदालत ने कहा है कि न्याय प्रणाली की निष्पक्षता व विश्वसनीयता बनाए रखने के लिए आधुनिक जांच तकनीकों का उपयोग संविधान और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के दायरे में ही होना चाहिए।



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