बेकाबू बजरी माफिया, मिलीभगत के तमाम सबूत, कोर्ट की फटकार के बाद भी नहीं सुधर रहे हालात
योगेन्द्र योगी.@जयपुर
राजस्थान में भाजपा सरकार के लिए बजरी गले की फांस बनती जा रही है। प्रदेश में करीब ढ़ाई साल का कार्यकाल पूरा कर रही भजनलाल सरकार पर अब न केवल विपक्ष, बल्कि देश की शीर्ष कोर्ट भी गंभीर सवाल उठा रही हैं। बजरी माफिया से सरकारी मशीनरी की मिलीभगत अब सरेआम बात हो चुकी है। नौबत यहां तक आ गई है कि बेलगाम बजरी माफिया को लेकर कई बार हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट को सरकार के खिलाफ कड़ी टिप्पणी करनी पड़ी है। सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में खनन माफिया की तुलना डकैतों से करते हुए राज्य सरकार को कड़ी फटकार लगाई है।
माफिया नहीं, ये डकैत हैं
हाल ही में सुप्रीम कोर्ट ने नेशनल चंबल अभयारण्य की 732 हेक्टेयर जमीन के डी-नोटिफिकेशन पर अंतरिम रोक लगाते हुए राजस्थान सरकार के रवैये पर गहरी नाराजगी जताई। कोर्ट ने सरकार के 23 दिसंबर 2025 के उस नोटिफिकेशन को कटघरे में खड़ा किया, जिसे 9 मार्च 2026 को लागू किया गया था।
सुनवाई के दौरान जस्टिस संदीप मेहता ने अवैध खनन के वीडियो देखकर उन्हें डरावना करार दिया। वीडियो में साफ देखा जा सकता था कि घड़ियालों और अन्य जलीय जीवों के बीच भारी मशीनें बेखौफ होकर रेत यानी बजरी निकाल रही हैं। कोर्ट ने तल्ख टिप्पणी करते हुए कहा कि चंबल क्षेत्र की पारिस्थितिकी बेहद संवेदनशील है। वहां माफिया जिस तरह सक्रिय हैं, उससे एसडीएम, पुलिसकर्मी और वन अधिकारी अपनी जान गंवा रहे हैं।
कोर्ट ने साफ कहा कि डी-नोटिफिकेशन के जरिए इस संरक्षित जमीन को राजस्व भूमि में बदलना संरक्षण प्रयासों को नष्ट करने जैसा है। इस मामले की अगली सुनवाई 11 मई को होगी।
सीबीआई जांच की उठी मांग
सिर्फ सुप्रीम कोर्ट ही नहीं, राजस्थान हाई कोर्ट ने भी बजरी माफिया को लेकर पिछले एक साल में सरकार की कार्यप्रणाली को कई बार शर्मसार किया है। 31 अक्टूबर 2025 को हाईकोर्ट के कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश संजीव प्रकाश शर्मा और जस्टिस बीएस संधू की खंडपीठ ने एक बड़ा फैसला सुनाते हुए बजरी खनन की 93 लीजों को तत्काल प्रभाव से निरस्त करने का आदेश दिया।
इसमें भीलवाड़ा की 48 लीज, टोंक की 34 लीज, अजमेर की 09 लीज और सवाई माधोपुर की 02 लीज शामिल थी।
अदालत ने पाया कि सरकार ने उन क्षेत्रों की नीलामी कर दी थी, जहां पिछले पांच साल में पहले ही अवैध खनन हो चुका था, जो कि सुप्रीम कोर्ट में दिए गए सरकारी हलफनामे के बिल्कुल उलट था। इससे पहले 18 मार्च 2025 को हाई कोर्ट ने स्थिति की गंभीरता को देखते हुए अवैध खनन की जांच सीबीआई को सौंपने के निर्देश दिए थे और जरूरत पड़ने पर अर्धसैनिक बलों (CRPF) की मदद लेने को कहा था। हालांकि, बाद में सुप्रीम कोर्ट ने तकनीकी आधार पर सीबीआई जांच पर रोक लगा दी, लेकिन माफिया और पुलिस की मिलीभगत के साक्ष्य बार-बार सामने आते रहे हैं।
विधानसभा में हंगामा
अवैध खनन का यह मुद्दा केवल अदालतों तक सीमित नहीं रहा, बल्कि राजस्थान विधानसभा में भी इसकी गूंज सुनाई दी। 19 मार्च 2025 को सदन में इस मुद्दे पर जमकर हंगामा हुआ। नेता प्रतिपक्ष टीकाराम जूली ने सरकार पर हमला बोलते हुए कहा कि प्रदेश में प्रतिदिन लगभग 1 करोड़ रुपये की अवैध बजरी का कारोबार हो रहा है।
जूली ने आरोप लगाया कि डबल इंजन की सरकार कुंभकर्णी नींद सो रही है और माफिया के आगे नतमस्तक है। दिलचस्प बात यह है कि सत्ता पक्ष के ही लगभग 20 विधायकों ने अपने-अपने क्षेत्रों में अवैध खनन की शिकायत दर्ज कराई थी, जो सरकार के भीतर असंतोष और माफिया के बढ़ते प्रभाव को दर्शाता है।
जलीय जीवों पर संकट
नेशनल चंबल अभयारण्य राजस्थान, मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश की सीमा पर 5400 वर्ग किलोमीटर का बड़ा संरक्षित क्षेत्र है। यह घड़ियाल, रेड-क्राउन रूफ टर्टल और दुर्लभ गंगा डॉल्फिन का अंतिम सुरक्षित आवास माना जाता है। माफियाओं द्वारा भारी मशीनों के उपयोग से न केवल नदी का स्वरूप बिगड़ रहा है, बल्कि इन संकटग्रस्त प्रजातियों के अस्तित्व पर भी खतरा मंडरा रहा है। एमिकस क्यूरी ने कोर्ट को बताया कि राजस्थान सरकार ने अब तक इस क्षेत्र को ईको-सेंसिटिव जोन घोषित करने में ढिलाई बरती है, जिसका सीधा फायदा माफिया उठा रहे हैं।
इतिहास में भी बजरी का विवाद
राजस्थान में बजरी का मुद्दा दशक भर से अधिक समय से सुलग रहा है। आठ साल पहले भी हाई कोर्ट ने कलेक्टर्स को एसआईटी बनाने और अवैध बजरी का उपयोग करने वाले बिल्डर्स पर भारी जुर्माना लगाने के निर्देश दिए थे। सरकार ने जब भी छोटे ब्लॉक की नीलामी की कोशिश की, उसे कानूनी अड़चनों का सामना करना पड़ा।
राजस्थान में बजरी माफिया अब केवल एक कानून-व्यवस्था का मुद्दा नहीं रह गया है, बल्कि यह एक राजनीतिक और प्रशासनिक विफलता का प्रतीक बन चुका है। पुलिसकर्मियों पर हमले, अधिकारियों की हत्याएं और प्राकृतिक संसाधनों की लूट इस बात की गवाही दे रही है कि सिस्टम में कहीं न कहीं गहरा छेद है।
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