राजस्थान मंत्रियों की संपत्ति घोषणा : 13 साल से जनता के सामने हिसाब नहीं, जानिए पूरा मामला
राजनीति में शुचिता और पारदर्शिता की बातें अक्सर मंचों से गूंजती हैं। वहीं, जब इसे जमीन पर उतारने की बारी आती है तो सियासी सिस्टम शॉर्ट टर्म मेमोरी लॉस का शिकार हो जाता है। केंद्र में जहां प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और उनकी पूरी कैबिनेट हर साल अपनी चल-अचल संपत्ति का पाई-पाई का हिसाब देश के सामने रख रही है। वहीं राजस्थान में इस मामले पर पूरी तरह से सन्नाटा पसरा हुआ है।
pm modi और उनके मंत्रियों की संपत्ति की घोषणा देखने के लिए क्लिक करें
विडंबना देखिए कि सूबे में मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा के नेतृत्व में भाजपा सरकार को बने 29 महीने पूरे हो चुके हैं। वहीं, अब तक किसी भी मंत्री ने अपनी संपत्ति की सार्वजनिक घोषणा करने की जहमत नहीं उठाई है।
जिस आदर्श आचार संहिता को राजनीति में नैतिकता बनाए रखने के लिए लागू किया गया था। वह पिछले 13 सालों से राजस्थान की सियासत में कचरा पेटी की शोभा बढ़ा रही है।
क्या है मंत्रियों की संपत्ति घोषणा की आचार संहिता और कैसे हुई शुरुआत?
नेताओं की संपत्ति में पारदर्शिता लाने के लिए इस व्यवस्था की शुरुआत यूपीए सरकार के कार्यकाल में हुई थी।
- साल 2009 की पहल: तत्कालीन प्रधानमंत्री दिवंगत डॉ. मनमोहन सिंह ने केंद्र और राज्यों के मंत्रियों के लिए एक विशेष आदर्श आचार संहिता (Code of Conduct) बनाई थी।
- क्या है नियम: इस संहिता के अनुसार मंत्रियों को पद ग्रहण करने के तुरंत बाद (अधिकतम दो महीने के भीतर) अपनी और अपने परिवार के सदस्यों की चल-अचल संपत्ति (Assets and Liabilities) तथा व्यापारिक हितों (Business Interests) का पूरा विवरण देना अनिवार्य है।
- 31 अगस्त की डेडलाइन: इसके बाद हर साल 31 अगस्त तक मंत्रियों को प्रधानमंत्री (केंद्र के मामले में) या मुख्यमंत्री (राज्यों के मामले में) को पिछले वित्तीय वर्ष का संपत्ति घोषणा पत्र सौंपना होता है।
- महत्वपूर्ण तथ्य: यह पूरी व्यवस्था राजनीति में नैतिकता और पारदर्शिता बनाए रखने के लिए एक उपाय के तौर पर शुरू की गई थी। इसके लिए कोई वैधानिक कानून नहीं बनाया गया था। यानी मंत्रियों के लिए ऐसा करना कोई कानूनी बाध्यता नहीं बल्कि एक नैतिक जिम्मेदारी है।
PM मोदी ने सेट किया बेंचमार्क, पर राजस्थान में रीति भूली सरकार
साल 2014 में जब नरेंद्र मोदी पहली बार देश के प्रधानमंत्री बने, तो उन्होंने इस नैतिक आचार संहिता को सख्ती से लागू किया।
पीएम मोदी ने साफ निर्देश दिए कि सभी केंद्रीय मंत्रियों को हर साल 31 अगस्त तक अपनी संपत्ति सार्वजनिक करनी होगी। तब से लेकर आज तक स्वयं पीएम मोदी और उनकी टीम हर साल अपनी संपत्तियों का ब्यौरा देश के सामने पारदर्शी तरीके से रख रहे हैं।
लेकिन दिल्ली से जयपुर आते-आते यह पारदर्शिता कहीं खो जाती है। राजस्थान में भाजपा और कांग्रेस दोनों ही प्रमुख दलों के मुख्यमंत्रियों और मंत्रियों ने इस आचार संहिता से दूरी बना ली है।
पूर्व मंत्रियों का डेटा भी गायब!
डिजिटल पारदर्शिता के इस दौर में राजस्थान सरकार की वेबसाइट्स का हाल भी अजीबोगरीब है। सामान्य प्रशासन विभाग (GAD) की आधिकारिक वेबसाइट पर पूर्व मंत्रियों की संपत्ति का विवरण दिखाने वाला एक लिंक तो मौजूद है, लेकिन जब पाठक या जनता उस पर क्लिक करती है, तो वह ब्लॉक मिलता है।
यानी सरकार वर्तमान तो छोड़िए, पूर्व मंत्रियों की संपत्तियों की पुरानी जानकारी भी जनता के साथ साझा करने के मूड में नहीं है। सच तो यह है कि 2013 के बाद से राजस्थान के किसी भी मुख्यमंत्री ने अपने मंत्रियों से इस तरह का कोई ब्यौरा मांगा ही नहीं।
अफसरों और कर्मचारियों के लिए डंडा, मंत्रियों के लिए राहत?
राजस्थान के इस सियासी इकोसिस्टम में एक बड़ा विरोधाभास देखने को मिलता है। जहां मंत्रियों के लिए संपत्ति छुपाना या न बताना कोई बड़ी बात नहीं है। वहीं जनता के टैक्स से वेतन पाने वाले सरकारी बाबुओं और कर्मचारियों के लिए नियम बेहद कड़े हैं।
दोनों ही कानूनी तौर पर लोक सेवक (Public Servant) की परिभाषा में आते हैं, लेकिन नियमों में जमीन-आसमान का अंतर है:
गजेटेड ऑफिसर्स (राजपत्रित अधिकारी) पर सख्ती:
- राज्य के सभी राजपत्रित अधिकारियों को हर साल अपनी संपत्तियों का सालाना ब्यौरा देना अनिवार्य है।
- अधिकारियों को न सिर्फ संपत्ति बतानी होती है, बल्कि संपत्ति खरीदने के लिए पैसे का सोर्स (Source of Fund) भी उजागर करना पड़ता है।
- इस पैसे का सोर्स अधिकारी के Income Tax Return (ITR) से मैच होना जरूरी है। राज्य के मुख्य सचिव (Chief Secretary) खुद हर साल अपनी संपत्ति का ब्यौरा सरकार को देते हैं और इसे सार्वजनिक भी किया जाता है।
आम कर्मचारियों पर भी शिकंजा
- पिछले साल राजस्थान सरकार ने नियमों का दायरा बढ़ाते हुए चतुर्थ श्रेणी से लेकर सभी स्तर के कर्मचारियों के लिए हर साल 30 जनवरी तक अपनी और परिजनों की संपत्ति का विवरण देना अनिवार्य कर दिया है।
- जुर्माना या कार्रवाई: यदि कोई कर्मचारी यह ब्यौरा नहीं देता है, तो उसका प्रमोशन (विभागीय पदोन्नति) और सालाना इंक्रीमेंट (वेतन वृद्धि) रोकने की सख्त चेतावनी दी गई है।
- राजनीतिक विश्लेषकों का मत: विश्लेषक मानते हैं कि यह पूरी तरह दोहरे मापदंड की नीति है। अफसरों और कर्मचारियों के लिए सेवा नियम बने हुए हैं जिसके तहत कानूनी बाध्यता है, लेकिन मंत्रियों के लिए कोई कानून या कड़ा नियम न होना ही इस लापरवाही की मुख्य वजह है।
चुनाव के समय के शपथ पत्र
जानिए कितने अमीर हैं राजस्थान के मंत्री?
भले ही मंत्रियों ने सालाना ब्यौरा न दिया हो, लेकिन साल 2023 के विधानसभा चुनाव के समय नामांकन दाखिल करते वक्त जो शपथ पत्र (Affidavits) दिए गए थे, उनसे मंत्रियों की आर्थिक स्थिति का साफ पता चलता है। एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स (ADR) के विश्लेषण के अनुसार राजस्थान कैबिनेट की आर्थिक तस्वीर कुछ इस प्रकार है:
| राजस्थान कैबिनेट का वेल्थ एनालिसिस | विवरण |
| करोड़पति दर्जा | राजस्थान सरकार के सभी 25 के 25 मंत्री (100%) करोड़पति हैं। |
| औसत संपत्ति | वर्तमान कैबिनेट के मंत्रियों की औसत संपत्ति 7.08 करोड़ रुपए है। |
| सबसे अमीर मंत्री | गजेंद्र सिंह खींवसर (कुल संपत्ति: 29.07 करोड़ रुपए)। |
| सबसे कम संपत्ति | बाबूलाल खराड़ी (कुल संपत्ति: 1.24 करोड़ रुपए)। |
| सबसे ज्यादा कर्ज (देनदारी) | संजय शर्मा (कुल कर्ज: 4.91 करोड़ रुपए)। |
कुछ और दिलचस्प और हैरान करने वाले आंकड़े
- सबसे अधिक निजी आय: प्रदेश की उप-मुख्यमंत्री दिया कुमारी की वार्षिक आय सबसे अधिक 2.88 करोड़ रुपए है, जो मुख्य रूप से उनके व्यापार, वेतन और भत्तों से आती है।
- शून्य (0) आय का दावा: राज्य के मंत्री जवाहर सिंह बेढम ने अपने चुनावी हलफनामे में स्वयं की वार्षिक आय 0 रुपए घोषित की है।
- घाटे के सौदागर: कैबिनेट मंत्री कन्हैयालाल ने हलफनामे में खुद को 34 लाख 43 हजार 385 रुपए के घाटे में दर्शाया है।
- मुख्यमंत्री की कमाई: सूबे के मुखिया भजन लाल शर्मा की स्वयं की वार्षिक आय छह लाख 86 हजार 660 रुपए थी, जो उनकी प्रोपराइटरशिप फर्म, मकान किराया, बैंक ब्याज और रेल मंत्रालय से मिलने वाले वेतन से होती है।
मंत्रियों की जुबानी: हमें तो पता ही नहीं, सीएम कहेंगे तो दे देंगे
पूर्व मंत्री बोले: जानकारी मांगी तो जरूर दी होगी
संपत्ति का हिसाब देने से आएगी पारदर्शिता: विश्लेषक
नैतिकता के लिए जरूरी है स्वेच्छा से पारदर्शिता
मंत्रियों के बयानों से साफ है कि जब तक मुख्यमंत्री की तरफ से कोई कड़ा निर्देश जारी नहीं होता, तब तक कोई भी अपनी तिजोरियों के राज खोलने को तैयार नहीं है।
राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि कानून का न होना एक बहाना हो सकता है। वहीं, जब देश के पीएम खुद को प्रधान सेवक कहकर हर साल अपनी संपत्ति सार्वजनिक कर सकते हैं, तो राज्यों के मंत्रियों को भी उसी राजनीतिक नैतिकता का परिचय देना चाहिए।
कर्मचारियों के इंक्रीमेंट रोकने वाली सरकार को यह सोचना होगा कि जनता की अदालत में पारदर्शिता का पैमाना सबके लिए एक समान होना चाहिए। अब देखना यह है कि क्या मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा दिल्ली की तर्ज पर जयपुर में भी अपने मंत्रियों को पाई-पाई का हिसाब देने का आदेश जारी करते हैं या नहीं?
यह खबर क्यों जरूरी है?
भारत के संविधान में जनप्रतिनिधियों की जवाबदेही एक मूल सिद्धांत है। राजस्थान के मंत्री जनता के धन से चलते हैं और जनता की सेवा के लिए चुने जाते हैं। जब वे 13 साल तक अपनी संपत्ति का हिसाब नहीं देते, तो लोकतांत्रिक पारदर्शिता कमजोर होती है। यह सिर्फ एक आंकड़े की बात नहीं है। जब नागरिक अनजान रहते हैं, तो जवाबदेही की मांग कभी नहीं उठती और भ्रष्टाचार की जांच का पहला सूत्र भी नहीं मिलता।
FAQ
- राजस्थान में मंत्रियों की संपत्ति घोषणा आखिरी बार कब हुई थी?
2009 से 2013 के बीच तत्कालीन मुख्यमंत्री अशोक गहलोत के कार्यकाल में राजस्थान में मंत्रियों की संपत्ति सार्वजनिक होती थी। 2013 के बाद से अब तक किसी भी सरकार ने यह घोषणा नहीं करवाई। - राजस्थान में मंत्री संपत्ति घोषणा न करें तो क्या कार्रवाई होती है?
अभी कोई कानूनी दंड नहीं है। यह सिर्फ आदर्श आचार संहिता का हिस्सा है, कोई कानून नहीं। इसलिए न कोई FIR होती है, न जुर्माना लगता है, न पद जाता है। - क्या राजस्थान के मंत्रियों की संपत्ति की कोई जानकारी मिल सकती है?
चुनाव के समय निर्वाचन आयोग की वेबसाइट पर हर उम्मीदवार का हलफनामा सार्वजनिक होता है। 2023 के हलफनामों के मुताबिक सभी 25 मंत्री करोड़पति हैं और औसत संपत्ति 7.08 करोड़ रुपए है। लेकिन उसके बाद का कोई ब्यौरा उपलब्ध नहीं है।
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