मेवाड़ विश्वविद्यालय में एडमिशन से डिग्री तक सब कुछ धांधली, जांच रिपोर्ट में हुआ खुलासा

Ashish Bhardwaj | Apr 01, 2026, 14:36 IST
Photograph: (the sootr)
राजस्थान के मेवाड़ विश्वविद्यालय में फर्जीवाड़े की शिकायतें सामने आई हैं। इसमें नियमों का उल्लंघन, फर्जी डिग्री वितरण और छात्रों से मनमानी राशि वसूलने के मामले पाए गए हैं। उच्च शिक्षा विभाग ने विश्वविद्यालय को नोटिस जारी किया है।

News In Short

  • मेवाड़ विश्वविद्यालय में एडमिशन से लेकर डिग्री तक पाईं गई अनियमितताएं।
  • उच्च शिक्षा विभाग की जांच समिति की रिपोर्ट में हुआ खुलासा।
  • परीक्षा के बाद भी एडमिशन और बिना पढ़ाए बांटी डिग्री।
  • उच्च शिक्षा विभाग ने 45 दिन के भीतर बिंदुवार जवाब मांगा।
  • सिर्फ मेवाड़ ही नहीं, राजस्थान के कई विवि फर्जीवाड़े की जद में।

News In Detail

राजस्थान में चित्तौडगढ़ के मेवाड़ विश्वविद्यालल में फर्जीवाड़े के मामले लगातार सामने आ रहे हैं। इस विश्वविद्यालय में प्रवेश से लेकर डिग्री वितरण तक व्यापक धांधली और नियमों का उल्लंघन पाया गया है। उच्च शिक्षा विभाग की जांच रिपोर्ट में खुलासा हुआ है कि विश्वविद्यालय प्रशासन ने यूजीसी के नियमों को ताक पर रख दिया। बिना पात्रता जांचे छात्रों को दाखिला दिया गया और परीक्षा परिणाम आने के बाद भी नए प्रवेश देकर डिग्रियां बांटी गईं।



वर्षभर चलता रहा एडमिशन का खेल

जांच रिपोर्ट के अनुसार विश्वविद्यालय के डिप्लोमा इन एग्रीकल्चर एक्सटेंशन सर्विसेज फॉर इनपुट डीलर्स पाठ्यक्रम में सबसे अधिक अनियमितताएं पाई गईं। इस पाठ्यक्रम में वर्षभर प्रवेश दिए जाते रहे और नियमों के विपरीत छात्रों को परीक्षा में बैठाया गया। यहां तक कि परीक्षा आयोजित होने के बाद भी नए छात्रों का प्रवेश दिखाकर उन्हें डिग्री प्रदान कर दी गई।


विश्वविद्यालय ने इस पाठ्यक्रम के संचालन के लिए नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ एग्रीकल्चर एक्सटेंशन मैनेजमेंट के दिशा-निर्देशों का उल्लंघन किया। अपनी ही अकादमिक परिषद के निर्णयों को दरकिनार कर प्रमाण पत्र जारी किए गए। छात्रों से निर्धारित 28,000 रुपये शुल्क के स्थान पर मनमानी राशि वसूली गई। न तो बैच बनाए गए और न ही छात्रों को अनिवार्य फील्ड विजिट कराई गई।



पीएचडी उपाधियों में भी फर्जीवाड़ा

शोध उपाधियों के वितरण में भी गंभीर गड़बड़ियां सामने आई हैं। जांच में पाया गया कि विश्वविद्यालय के शोध विभाग ने नियमों के विरुद्ध 425 पीएचडी उपाधियां प्रदान कीं। प्रबंधन समिति से शोध अवधि बढ़ाने का कोई अनुमोदन नहीं लिया गया, फिर भी तत्कालीन अध्यक्ष प्रो. सर्वोत्तम दीक्षित और शोध निदेशक डॉ. चेताली अग्रवाल ने ये उपाधियां जारी कर दीं।



प्रशासनिक अधिकारियों की है मिलीभगत

जांच में कई वरिष्ठ अधिकारियों की मिलीभगत का भी खुलासा हुआ है। प्रो. पी रामैया, प्रो. वीएनआर पिल्लई, प्रो. वीके वैद्य और प्रो. आलोक मिश्रा सहित कई अधिकारियों पर नियमों की अनदेखी करने का आरोप लगा है। इनके कार्यकाल में शैक्षणिक कर्मचारियों की नियुक्तियों में यूजीसी के मापदंडों का उल्लंघन किया गया।



परीक्षा अनुभाग से जुड़े डॉ. सैयद असगर, प्रियंका गौतम, अशोक खरोदिया और डॉ. ओम प्रकाश की भूमिका फर्जी डिग्री वितरण में सामने आई है। इनमें से कुछ आरोपियों को एसओजी पहले ही गिरफ्तार कर चुकी है। रिपोर्ट में यह भी बताया गया है कि कुलसचिव जैसे जिम्मेदार पदाधिकारियों की अनुमति के बिना ही डिग्रियों की छपाई जैसे गोपनीय कार्य कराए गए।



विभाग ने जारी किया कारण बताओ नोटिस

इन गंभीर अनियमितताओं के मद्देनजर उच्च शिक्षा विभाग ने मेवाड़ विश्वविद्यालय को कारण बताओ नोटिस जारी कर 45 दिन के भीतर बिंदुवार जवाब मांगा है। विभाग ने स्पष्ट किया है कि यदि जवाब संतोषजनक नहीं रहा तो विश्वविद्यालय के खिलाफ सख्त कार्रवाई की जाएगी।



सिर्फ मेवाड़ ही नहीं, प्रदेश के अन्य विश्वविद्यालय भी घेरे में

राजस्थान में शिक्षा जगत में फर्जीवाड़े के ये मामले अकेले नहीं हैं। ओपीजेएस विश्वविद्यालय चूरू में भी फर्जी डिग्री वितरण और प्रवेश में अनियमितताओं की पुष्टि हो चुकी है। वहां सरकार ने प्रशासक नियुक्त कर नए प्रवेशों पर रोक लगा दी है।


इसके अलावा, संस्कृत विश्वविद्यालय से संबद्ध कॉलेजों में पांच साल में 1046 अपात्र छात्रों को परीक्षा में बैठाकर प्रमाण पत्र जारी करने का मामला भी सामने आया था। हालांकि, सरकार ने इसे विधानसभा में स्वीकार करने के बाद भी अब तक दोषियों पर कोई कार्रवाई नहीं की है।



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