कहीं मंत्री का गालीकांड तो कहीं घटिया दवा का खेल, गहरा सबक दे गया यह हफ्ता
राजस्थान के लिए यह हफ्ता राजनीतिक सरगर्मियों, न्यायिक फैसलों और सामाजिक व्यवस्था को झकझोर देने वाली घटनाओं से भरा रहा। एक तरफ जहां सत्ता गलियारों में प्रशासनिक मर्यादाएं तार-तार होती दिखीं, वहीं दूसरी तरफ चिकित्सा तंत्र की जानलेवा लापरवाही सामने आई। पर्यावरण और प्रकृति के अस्तित्व को लेकर शीर्ष अदालत ने कड़ा रुख अपनाया। अजमेर में रिश्तों के कत्ल की झकझोर देने वाली कहानी भी सामने आई।
सहकारिता मंत्री का गाली कांड
यह हफ्ता राजस्थान की सियासत और नौकरशाही के रिश्तों के लिहाज से उथल-पुथल भरा रहा। लोकतांत्रिक व्यवस्था में जब जनप्रतिनिधि ही कानून को अपने हाथ में लेने लगें तो वह व्यवस्था में गिरावट का सूचक बन जाता है।
राज्य के सहकारिता राज्य मंत्री गौतम कुमार दक का एक कथित ऑडियो टेप सामने आने के बाद प्रदेश की राजनीति गरमा गई है। इस तीन मिनट के ऑडियो में मंत्री जी पर पुलिसकर्मियों पर रौब जमाने और बेहद भद्दी गालियां देने का आरोप है।
मामला इस हद तक तूल पकड़ चुका है कि कानून को अपना काम करना पड़ा और मंत्री दक सहित उनके तीन सहयोगियों के खिलाफ डूंगला थाने में राजकार्य में बाधा और दुर्व्यवहार का मुकदमा दर्ज कर लिया गया है। इस पूरे मामले की जांच सीआईडी (क्राइम) को सौंप दी गई है।
पूरी घटनाक्रम की पृष्ठभूमि में जाएं तो यह मामला 25 मई का है। डूंगला थाने के SHO शैतान सिंह की रिपोर्ट के अनुसार पुलिस ने एक कानूनी मामले की तफ्तीश के सिलसिले में आरोपी धनराज को थाने पर तलब किया था। आरोपी धनराज को नागवार गुजरी और उसने तुरंत इसकी शिकायत अपने राजनीतिक आका सहकारिता मंत्री गौतम दक से कर दी। मंत्री जी बिना वक्त गंवाए अपने दल-बल के साथ डूंगला थाने पहुंच गए।
आरोप है कि थाने पर पहुंचते ही मंत्री दक ने मर्यादाओं को ताक पर रखकर एसएचओ शैतान सिंह, कांस्टेबल लक्ष्मीनारायण और विष्णु को थाने से बाहर खुले परिसर में बुलवाया। इसके बाद अगले तीन मिनट तक पुलिसकर्मियों से बातचीत में 17 बार भद्दी गालियों का इस्तेमाल किया। उनकी नाराजगी इस बात को लेकर थी कि पुलिस उनके कार्यकर्ता के घर तक कैसे पहुंच गई और उन्होंने वहां जाकर पैसे क्यों मांगे?
जैसे ही मीडिया में यह खबर फैली, पुलिस अधीक्षक धर्मेंद्र यादव तुरंत डूंगला थाने पहुंचे और स्थिति को संभाला। हालांकि, मंत्री गौतम दक ने एक वीडियो संदेश जारी कर इस आवाज को अपनी मानने से इनकार किया है और इसे राजनीतिक साजिश करार दिया है।
यह गाली कांड हमारे राजनीतिक तंत्र में गहरे पैठे सामंती अहंकार और जमीनी स्तर के अमले के प्रति असंवेदनशीलता को उजागर करता है। इस घटना का सबसे बड़ा सकारात्मक संदेश यह है कि पुलिस प्रशासन ने राजनीतिक दबाव के आगे घुटने टेकने के बजाय कानून के राज को प्राथमिकता दी और एक सिटिंग कैबिनेट मंत्री के खिलाफ एफआईआर दर्ज की। सरकार के लिए इसमें यह कड़ा संदेश है कि यदि सुशासन का दावा सच करना है तो मंत्रियों को अपनी जुबान और व्यवहार पर नियंत्रण रखना होगा।
कोटा का नकली ऑक्सीटोसिन इंजेक्शन घोटाला
राजस्थान का कोटा शहर को कोचिंग हब के रूप में जाना जाता है। कोटा मेडिकल कॉलेज से संबद्ध अस्पतालों में पांच प्रसूताओं की मौत ने पूरे प्रदेश को हिला दिया। शुरुआत में इसे एक सामान्य चिकित्सीय जटिलता माना जा रहा था, लेकिन जब ड्रग कंट्रोल डिपार्टमेंट की जांच रिपोर्ट सामने आई, तो पूरे स्वास्थ्य महकमे के पैरों तले जमीन खिसक गई।
जांच में सामने आया कि ड्रग कंट्रोल डिपार्टमेंट ने जिस फार्मा कंपनी के ऑक्सीटोसिन (Oxytocin) इंजेक्शन की बिक्री और इस्तेमाल पर तत्काल प्रभाव से रोक लगाई थी, उसी जानलेवा दवा का भारी-भरकम स्टॉक कोटा के न्यू मेडिकल कॉलेज अस्पताल में मरीजों को दिया जा रहा था। पंजाब के अमृतसर की जैक्सन लेबोरेट्रीज द्वारा निर्मित ऑक्सीटोसिन इंजेक्शन 'TOCIN (5ml)' का जो सैंपल लैब टेस्टिंग के लिए भेजा गया था, वह घटिया पाया गया।
लैब रिपोर्ट के अनुसार, इस इंजेक्शन के भीतर मौजूद मुख्य जीवन रक्षक कंपोनेंट 'ऑक्सीटोसिन' की मात्रा लगभग शून्य (जीरो) थी। यानी प्रसूताओं की नसों में जिंदगी बचाने के नाम पर सिर्फ सादा पानी या कोई बेअसर तरल पदार्थ दौड़ाया जा रहा था।
पिछले चार महीनों के दौरान कोटा के अस्पतालों में करीब 12, 500 प्रसूताओं को इसी दागी कंपनी का नकली इंजेक्शन लगाया जा चुका है। अस्पताल रिकॉर्ड के मुताबिक यहां 15,000 इंजेक्शन की सप्लाई की गई थी, जिनमें से अधिकांश का उपभोग प्रसव के दौरान हो चुका था।
ऑक्सीटोसिन इंजेक्शन गर्भवती महिलाओं के लिए लेबर पेन बढ़ाने और प्रसव के बाद होने वाली ब्लीडिंग को रोकने के लिए बेहद अनिवार्य होता है। यदि इसमें मुख्य तत्व ही शून्य होगा, तो अत्यधिक रक्तस्राव के कारण मां की मौत निश्चित है।
यह घटना सरकारी दवा खरीद प्रणाली और क्वालिटी कंट्रोल मैकेनिज्म की पूरी तरह से विफलता को दर्शाती है। बिना कड़े क्वालिटी चेक के दवाओं को सरकारी काउंटरों तक पहुंचने देना एक बड़े भ्रष्टाचार की बू देता है। यह घटना राजस्थान सरकार को संदेश देती है कि मुफ्त दवा योजना की सफलता केवल आंकड़ों में नहीं, बल्कि दवाओं की विश्वसनीयता में होनी चाहिए।
जोजरी नदी के प्रदूषण पर कोर्ट का चाबुक
विकास की अंधी दौड़ में जब उद्योगपति प्राकृतिक संसाधनों को नष्ट करने पर आमादा हो जाएं और सरकारी एजेंसियां मूकदर्शक बन जाएं, तब न्यायपालिका को ही ढाल बनना पड़ता है। इस सप्ताह सुप्रीम कोर्ट ने जोधपुर के औद्योगिक क्षेत्रों से निकलने वाले जहरीले और अनुपचारित पानी के मुद्दे पर सख्त फैसला सुनाया।
सुप्रीम कोर्ट ने जोधपुर के केंद्रीय प्रदूषण उपचार संयंत्र (CETP) और उससे जुड़े 306 कपड़ा उद्योगों को तत्काल प्रभाव से बंद रखने का आदेश दिया है। जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की खंडपीठ ने इस मामले की गंभीरता को देखते हुए स्थानीय प्रशासन और राजस्थान प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (RSPCB) की भूमिका पर बेहद कड़े सवाल दागे।
अदालती फटकार के बाद राज्य सरकार बैकफुट पर आ गई। आनन-फानन में कार्रवाई का दौर शुरू हुआ। अतिरिक्त महाधिवक्ता शिवमंगल शर्मा ने कोर्ट को सूचित किया कि प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के दो अधिकारियों-लैब इंचार्ज देवेंद्र सिंह और एईई कुणाल खत्री को निलंबित कर दिया गया है, जबकि क्षेत्रीय अधिकारी (आरओ) कामिनी सोनगरा को एपीओ कर दिया गया है। इन सभी के खिलाफ आपराधिक मुकदमे दर्ज कर एक विशेष जांच दल (SIT) का गठन किया गया है।
सुप्रीम कोर्ट का यह निर्णय राजस्थान के औद्योगिक घरानों और नियामक संस्थाओं के लिए एक वेक-अप कॉल है। यह स्पष्ट संदेश देता है कि पर्यावरणीय न्याय से कोई समझौता नहीं किया जा सकता। उद्योगों से होने वाली कमाई की कीमत पर किसी नदी को नाले में तब्दील करने की इजाजत नहीं दी जा सकती। जोधपुर-पाली का पूरा बेल्ट लंबे समय से टेक्सटाइल प्रदूषण की मार झेल रहा है।
राजस्थान में बजरी खनन पर विराम
राजस्थान में नदियां पहले ही कम हैं। और जो हैं वे अवैध और अनियंत्रित खनन के कारण अपने अस्तित्व की अंतिम सांसें गिन रही हैं। इस सप्ताह सुप्रीम कोर्ट ने राजस्थान के सभी माइनिंग लीज धारकों और एलओआई (Letter of Intent) धारकों की खनन गतिविधियों पर 20 जुलाई तक पूरी तरह से रोक लगा दी है।
इस आदेश का सीधा और तात्कालिक असर भीलवाड़ा, अजमेर, टोंक और सवाईमाधोपुर जैसे प्रमुख बजरी उत्पादक जिलों पर पड़ेगा। यह कानूनी विवाद असल में राजस्थान हाई कोर्ट की जयपुर बेंच के 20 जनवरी के उस फैसले से उपजा है, जिसमें हाईकोर्ट ने खनिज विभाग द्वारा जारी की गई बजरी लीज की नीलामियों को ही पूरी तरह रद्द कर दिया था। इसी फैसले को चुनौती देते हुए सुप्रीम कोर्ट में विशेष अनुमति याचिका (SLP) दायर की गई थी।
बजरी खनन पर सुप्रीम कोर्ट की यह रोक संदेश देती है कि हमारी विकासवादी नीतियां प्रकृति के साथ संतुलन बनाने में पूरी तरह विफल रही हैं। यद्यपि इस प्रतिबंध से निर्माण क्षेत्र में मंदी आएगी और आम आदमी का आशियाना बनाना महंगा हो जाएगा, लेकिन प्राकृतिक विनाश की कीमत पर मिलने वाली बजरी का नुकसान कहीं अधिक बड़ा है।
अजमेर का सामूहिक हत्याकांड
इस सप्ताह राजस्थान के अजमेर जिले से रूह कंपा देने वाली खबर आई। शुरुआत में जिस घटना को कार दुर्घटना माना जा रहा था, वह पुलिस की तफ्तीश के बाद रची गई पारिवारिक साजिश और सामूहिक हत्याकांड के रूप में सामने आई।
घटनाक्रम के अनुसार अजमेर के बोराड़ा थाना क्षेत्र के श्रीरामपुरा गांव से कुछ दूरी पर सड़क किनारे स्थानीय लोगों को एक एसयूवी (स्कॉर्पियो) कार धू-धू कर जलती हुई दिखाई दी। मृतकों की पहचान पूर्व सरपंच रामसिंह चौधरी, उनकी वृद्ध मां पूसी देवी, दूसरी पत्नी सुरज्ञान देवी और उनकी भांजी महिमा के रूप में हुई।
पहली नजर में यह शॉर्ट सर्किट से लगी आग का मामला लग रहा था, लेकिन सुरज्ञान देवी के गले पर धारदार हथियार के गहरे जख्मों ने पुलिस के कान खड़े कर दिए और मामला पूरी तरह पलट गया। पुलिस ने जब कड़ियों को जोड़ना शुरू किया तो सामूहिक हत्याकांड का मामला सामने आया।
रामसिंह की पहली पत्नी सुनीता, उसकी सगी बेटी और उसके नाबालिग बेटे ने मिलकर अंजाम दिया था। इन तीनों ने पहले चारों पीड़ितों पर धारदार हथियारों से ताबड़तोड़ हमला कर उन्हें मौत के घाट उतारा। इसके बाद चारों शवों को स्कॉर्पियो कार में डाला और उसे पेट्रोल छिड़ककर आग के हवाले कर दिया।
यह हत्याकांड हमारे समाज में तेजी से बढ़ रहे नैतिक पतन, अत्यधिक भौतिकवादी लालच और चरम आक्रामकता का एक जीवंत उदाहरण है। समाज के लिए संदेश यह है कि हमें परिवारों के भीतर पनप रही नफरत और कुंठाओं को समय रहते पहचान कर सामाजिक और मनोवैज्ञानिक स्तर पर उनका समाधान ढूंढना होगा।
अगले हफ्ते फिर हाजिर होंगे नई साप्ताहिक चिट्ठी के साथ।
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