निकाय प्रमुख चुनाव: जनता ने दिया वोट पर भाजपा ने लूट लिया कांग्रेस का बोर्ड!

Mukesh Sharma | Sept 22, 2026, 19:00 IST
वोट मिले, सत्ता फिसली
राजस्थान निकाय चुनाव में BJP-कांग्रेस के वोट शेयर में एक फीसदी से भी कम अंतर रहा, लेकिन बोर्ड बनाने में BJP आगे निकल गई। कांग्रेस कई जगह ज्यादा पार्षद होने के बावजूद पिछड़ गई।

जयपुर। राजस्थान के निकाय चुनाव में भाजपा और कांग्रेस के बीच वोटों का अंतर एक फीसदी से भी कम रहा, लेकिन बोर्ड बनाने की बारी आई तो तस्वीर बदल गई। भाजपा ने नतीजों के बाद निर्दलीयों और स्थानीय समीकरणों पर फोकस करते हुए माइक्रो मैनेजमेंट किया। दूसरी तरफ कांग्रेस कई जगह ज्यादा या लगभग बराबर पार्षद जिताने के बावजूद बोर्ड नहीं बना सकी।



कांग्रेस पार्टी के बड़े नेता चुनाव प्रचार में पूरे प्रदेश में एक साथ ताकत झोंकते नहीं दिखे। टिकट बंटवारे में बगावत और नतीजों के बाद नंबर जुटाने की चुनौती ने भी कांग्रेस की मुश्किल बढ़ाईं। यही वजह रही कि वार्ड स्तर पर करीबी मुकाबला बोर्ड की कुर्सी तक पहुंचते-पहुंचते भाजपा के पक्ष में ज्यादा झुक गया।



भाजपा-कांग्रेस में वोट में अंतर सिर्फ 0.94%

राजस्थान निकाय चुनाव के नतीजे बताते हैं कि मुकाबला एकतरफा नहीं था। भाजपा को करीब 35.19% और कांग्रेस को 34.25% वोट मिले। अंतर सिर्फ 0.94 प्रतिशत अंक रहा। वहीं निर्दलीयों को 27.38% वोट मिले। यानी कई निकायों में बोर्ड की चाबी निर्दलीयों के पास पहुंच गई।



वार्डों में भी भाजपा सबसे बड़ी पार्टी रही, लेकिन कांग्रेस बहुत पीछे नहीं थी। इसके बावजूद निकाय प्रमुखों के चुनाव में भाजपा ने कहीं ज्यादा बोर्ड बनाए। सात नगर निगमों के शुरुआती मेयर चुनाव में भाजपा ने 6 जीते। कांग्रेस सिर्फ बीकानेर में अपना मेयर बना सकी। सवाल यही है कि जब वोट शेयर इतना करीब था तो बोर्ड बनाने में कांग्रेस इतनी पीछे कैसे रह गई?



भाजपा ने नतीजों के बाद भी जारी रखा खेल

भाजपा की रणनीति सिर्फ टिकट और प्रचार तक सीमित नहीं रही। पार्टी के शीर्ष नेताओं ने चुनाव प्रचार में हिस्सा लिया और संगठन स्तर पर भी लगातार काम हुआ। खुद मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा ने सभी नगर निगमों में रोड शो किए। प्रदेश अध्यक्ष मदन राठौड़ भी मैदान में डटे रहे। नतीजों के बाद उन निकायों पर खास फोकस किया गया, जहां स्पष्ट बहुमत नहीं था और निर्दलीय निर्णायक थे।



इसका असर महापौर चुनाव में साफ दिखा। अजमेर में भाजपा के 32 पार्षद थे, लेकिन उसकी प्रत्याशी अनामिका शर्मा को 43 वोट मिले। कांग्रेस के 37 पार्षद थे और उसके प्रत्याशी को 37 ही वोट मिले। यानी भाजपा ने अपने संख्या बल से 11 ज्यादा वोट जुटाए। अलवर में भी निर्दलीयों की भूमिका अहम रही। BJP प्रत्याशी को 42 वोट मिले और पार्टी मेयर बनाने में सफल रही।



कांग्रेस के बड़े चेहरे प्रचार में कहां थे?

यहीं राजस्थान कांग्रेस की रणनीति पर सवाल उठते हैं। चुनाव में पार्टी का कोई ऐसा प्रदेशव्यापी प्रचार अभियान नहीं दिखा, जिसमें सभी बड़े नेता एक साथ अलग-अलग जिलों में लगातार सक्रिय रहे हों। कांग्रेस के शीर्ष नेता प्रचार से काफी हद तक दूर रहे। पीसीसी चीफगोविंद सिंह डोटासरा और नेता प्रतिपक्ष टीकाराम जूली भी अपने विधानसभा क्षेत्र में ही फंसकर रह गए थे।



पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने नतीजों के बाद खुद कांग्रेस की रणनीति पर सवाल उठाए। उनका कहना था कि बेहतर प्लानिंग और ज्यादा आक्रामक अभियान होता तो नतीजे अलग हो सकते थे। यानी सवाल सिर्फ यह नहीं है कि कांग्रेस को कितने वोट मिले। सवाल यह भी है कि पार्टी उन वोटों को बोर्ड की सत्ता में क्यों नहीं बदल सकी?



कांग्रेस में टिकटों की लड़ाई भी पड़ी भारी

राजस्थान निकाय चुनाव में टिकट वितरण दोनों पार्टियों के लिए चुनौती रहा। कई जगह टिकट नहीं मिलने पर नेता बागी होकर मैदान में उतरे। निर्दलीयों की बड़ी जीत के पीछे यह भी एक वजह रही। कांग्रेस के लिए यह परेशानी ज्यादा तब बनी, जब कई निकायों में वही निर्दलीय बोर्ड गठन के समय निर्णायक हो गए। पार्टी को पहले अपने पार्षदों को साथ रखना था और फिर बहुमत के लिए निर्दलीयों का समर्थन जुटाना था। यहीं भाजपा का पोस्ट-पोल मैनेजमेंट कई जगह ज्यादा असरदार दिखा।



पाली में 29 सीट कांग्रेस की, मेयर BJP का

पाली नगर निगम इसका सबसे दिलचस्प उदाहरण है। 65 वार्डों में कांग्रेस ने सबसे ज्यादा 29 सीटें जीतीं। भाजपा के 21 और निर्दलीय 15 पार्षद थे। यानी निगम चुनाव में कांग्रेस सबसे बड़ी पार्टी थी, लेकिन मेयर चुनाव में पूरा गणित बदल गया।



भाजपा की नमिता बुबकिया को 33 वोट मिले। कांग्रेस की बागी राजबाला हिंगड़ 29 वोट लेकर दूसरे स्थान पर रहीं। कांग्रेस की अधिकृत प्रत्याशी सुमित्रा जैन को सिर्फ तीन वोट मिले। यानी टिकट से शुरू हुआ अंदरूनी विवाद मेयर चुनाव तक कांग्रेस के लिए बड़ी परेशानी बन गया।



अजमेर में निर्दलीयों ने बदला गणित

अजमेर में भी कांग्रेस के पास भाजपा से ज्यादा पार्षद थे। कांग्रेस के 37 और भाजपा के 32 पार्षद जीते थे। 11 निर्दलीय थे। मेयर चुनाव में भाजपा की अनामिका शर्मा को 43 वोट मिले, जबकि कांग्रेस की किरण गढ़वाल को 37 वोट मिले। यहां भाजपा अपने 32 के आंकड़े को 43 तक ले गई। कांग्रेस अपने 37 से आगे नहीं बढ़ सकी।



यानी अजमेर में अंतर साफ था कि कांग्रेस ने जितने पार्षद जिताए, उतने ही वोट मेयर प्रत्याशी को मिले। भाजपा ने अपने आंकड़े से बाहर समर्थन जुटा लिया।



भरतपुर में 36 निर्दलीय बने निर्णायक

भरतपुर की कहानी इससे भी अलग रही। यहां किसी बड़ी पार्टी को बहुमत नहीं मिला। 65 वार्डों में निर्दलीयों ने 36 सीटें जीतकर BJP और कांग्रेस दोनों को पीछे छोड़ दिया। BJP के 20 और कांग्रेस के सात पार्षद जीते। इसके बावजूद मेयर पद BJP के खाते में गया और पार्टी की प्रत्याशी निर्विरोध चुनी गई।



भरतपुर का नतीजा बताता है कि इस चुनाव में सिर्फ पार्टी के टिकट पर जीते पार्षदों की संख्या मायने नहीं रखती थी। नतीजों के बाद निर्दलीयों को अपने साथ जोड़ना उतना ही जरूरी था।



कांग्रेस की सबसे बड़ी कमजोरी कहां?

निकाय चुनाव में कांग्रेस की परेशानी को सिर्फ जनता ने कांग्रेस को वोट दिया और भाजपा ने बोर्ड छीन लिया कहने से पूरी तस्वीर सामने नहीं आती। भाजपा ने वार्ड स्तर पर भी कांग्रेस से ज्यादा सीटें जीतीं और वोट शेयर में भी मामूली बढ़त हासिल की, लेकिन कांग्रेस के लिए चिंता की बात दूसरी है।



जहां पार्टी मजबूत स्थिति में थी, वहां भी कई जगह वह अपने नंबर को सत्ता में नहीं बदल सकी। पाली में अंदरूनी बगावत भारी पड़ी। अजमेर में निर्दलीय उसके साथ नहीं आए। भरतपुर में निर्दलीयों की बड़ी संख्या के बावजूद भाजपा बोर्ड बनाने में आगे निकल गई। दूसरी तरफ भाजपा ने कमजोर संख्या वाले कई निकायों में भी बोर्ड बनाने के लिए नतीजों के बाद तेजी से राजनीतिक गणित साधा।



पंचायत चुनाव से पहले बड़ा सबक

निकाय चुनाव का यह फर्क आगामी पंचायत चुनाव से पहले दोनों पार्टियों के लिए अहम है। भाजपा के लिए संदेश है कि कम वोट अंतर के बावजूद मजबूत संगठन और पोस्ट-पोल मैनेजमेंट बोर्ड तक पहुंचा सकता है।



कांग्रेस के लिए चुनौती ज्यादा साफ है। उसे टिकट बंटवारे से लेकर बागियों को मनाने, बड़े नेताओं को मैदान में उतारने और नतीजों के बाद निर्दलीयों को साथ लाने तक एक साथ काम करना होगा।



2028 के विधानसभा चुनाव अभी दूर हैं और निकाय चुनाव के आधार पर उसका नतीजा तय नहीं किया जा सकता। लेकिन निकाय चुनाव ने कांग्रेस के सामने एक संगठनात्मक सवाल जरूर रख दिया है- करीबी जनसमर्थन को चुनावी जीत और फिर सत्ता में बदलने का मैनेजमेंट पार्टी कैसे मजबूत करेगी?



यह खबरें भी पढ़ें...



राजस्थान निकाय चुनाव में धनबल का खेल, गहलोत बोले- भाजपा नहीं लक्ष्मी जी के मेयर बन रहे



अजमेर में निर्दलीयों ने बदला गणित, भाजपा का 36 साल का रिकॉर्ड कायम; अनामिका बनीं मेयर



पाली में उलटफेर, कांग्रेस 29 सीट जीतकर भी हारी, मेयर को क्यों मिले सिर्फ 3 वोट?



अशोक गहलोत का भाजपा पर आरोप, बोले- पुलिस के जरिए पार्षदों को डराया-धमकाया जा रहा



Tags:
  • राजस्थान
  • राजस्थान कांग्रेस
  • गोविंद सिंह डोटासरा
  • अशोक गहलोत
  • निगम चुनाव