अक्टूबर तक टल सकते हैं पंचायत और निकाय चुनाव, कोर्ट डेडलाइन छूटने की संभावना बढ़ी

Mukesh Sharma | Apr 01, 2026, 12:38 IST
Photograph: (the sootr)
राजस्थान में पंचायत और निकाय चुनाव अक्टूबर तक टाले जा सकते हैं। इससे चुनाव के लिए 15 अप्रैल की कोर्ट डेडलाइन छूटने के पूरे आसार हैं। ऐसे में सरकार अब डेडलाइन को पार करने के कानूनी विकल्पों पर विचार कर रही है।

News In Short

  • पंचायत और निकाय चुनाव अक्टूबर तक टलने की संभावना।
  • सरकार ने ओबीसी आयोग का कार्यकाल सितंबर तक बढ़ाया।
  • ओबीसी आंकड़ों के बगैर नहीं कराए जा सकते हैं चुनाव।
  • चुनाव के लिए 15 अप्रैल की कोर्ट डेडलाइन के छूटने के आसार।
  • सरकार कर रही अवमानना से बचने के लिए कानूनी विकल्पों पर विचार।

News In Detail

Jaipur: राजस्थान में पंचायत और नगरीय निकाय चुनाव अक्टूबर तक टाले जा सकते हैं। यह संभावना राजस्थान राज्य पिछड़ा वर्ग आयोग का कार्यकाल फिर बढ़ाए जाने के कारण दिखाई दे रही है। अब यह आयोग 30 सितंबर 2026 तक कार्य करेगा। कार्यकाल में हुई इस वृद्धि के बाद अब यह लगभग तय हो गया है कि प्रदेश में स्थानीय निकायों और पंचायतों के चुनाव इस साल सितंबर के बाद ही हो सकेंगे।



कोर्ट डेडलाइन पर असर

अगर चुनाव अक्टूबर तक टलते हैं तो सरकार के पास 15 अप्रैल तक चुनाव कराने की कोर्ट डेडलाइन पार करनी होगी। ऐसे में सरकार को कोर्ट की अवमानना का भी सामना करना पड़ सकता है। इसी मामले में पूर्व विधायक संयम लोढ़ा ने सरकार के खिलाफ अवमानना की याचिका भी हाई कोर्ट में दाखिल कर रखी है। बताया जाता है कि इस याचिका पर दो अप्रैल को सुनवाई संभावित है। सरकार कोर्ट डेडलाइन से बचने के लिए कानूनी विकल्पों पर विचार कर रही है।



​तीसरी बार बढ़ाया गया कार्यकाल

​यह तीसरी बार है जब राज्य ओबीसी आयोग के कार्यकाल में विस्तार किया गया है। आयोग का गठन मूल रूप से स्थानीय निकायों और पंचायती राज संस्थाओं में ओबीसी वर्ग को उचित आरक्षण (राजनीतिक प्रतिनिधित्व) तय करने के लिए किया गया था। नियमानुसार जब तक आयोग अपनी अंतिम रिपोर्ट सरकार को नहीं सौंप देता, तब तक चुनावों की प्रक्रिया को आगे बढ़ाना मुश्किल है। रिपोर्ट में देरी के चलते ही चुनाव कार्यक्रम लगातार खिसकता जा रहा है।



आयोग के सामने 'डेटा' का पेंच

चुनाव टलने का मुख्य कारण डेटा की उपलब्धता न होना है। सूत्रों के अनुसार ओबीसी आयोग ने पंचायत राज विभाग से प्रदेश की ग्राम पंचायतों का विस्तृत डेटा मांगा था। इस पर विभाग ने स्पष्ट किया है कि उनके पास लगभग 400 से ज्यादा ग्राम पंचायतों का आवश्यक डेटा उपलब्ध नहीं है। विभाग का कहना है कि जो डेटा उनके पास था, वह पहले ही आयोजना विभाग से लेकर आयोग को भेजा जा चुका है।



अब ​सर्वे का विकल्प

विभाग से डेटा नहीं मिला तो आयोग ने पिछले वर्ष खुद ही सर्वे कराने की प्रक्रिया शुरू की थी। हालांकि, आयोग ने इस कार्य के लिए बीएलओ की सेवाएं मांगी थीं, जिसे केंद्रीय निर्वाचन आयोग ने देने से इनकार कर दिया। अब आयोग के पास डेटा जुटाने के लिए कोई वैकल्पिक ठोस स्रोत नहीं बचा है।



​क्या है पूरा मामला?

प्रदेश में स्थानीय निकायों और पंचायती राज संस्थाओं में ओबीसी को आरक्षण देने के उद्देश्य से 9 मई 2025 को राजस्थान राज्य पिछड़ा वर्ग आयोग का गठन किया गया था। इस आयोग को सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता विभाग के अधीन रखा गया है। आयोग का मुख्य कार्य यह सुनिश्चित करना है कि ओबीसी वर्ग को उनकी जनसंख्या और स्थिति के आधार पर सही राजनीतिक प्रतिनिधित्व मिले। आयोग सूत्रों का कहना है कि बिना सटीक डेटा के आरक्षण की सीमा और वार्डों का निर्धारण संभव नहीं है। यही कारण है कि आयोग अब तक अपनी रिपोर्ट सरकार को नहीं दे पाया है।



हाई कोर्ट ने थी तल्ख टिप्पणियां

समय पर चुनाव नहीं होने और प्रशासक लगाने के खिलाफ राजस्थान हाई कोर्ट में कई याचिकाएं दायर हुईं थीं। जस्टिस अनूप ढंड ने इस पर तल्ख अंदाज में कहा था कि यदि सरकार चुनाव नहीं कराए तो राज्य निर्वाचन आयोग का दायित्व है कि वह लोकतांत्रिक स्थानीय शासन की बहाली के लिए दखल करे। क्योंकि, चुनाव नहीं होने से स्थानीय शासन में रिक्तता आती है। इसका सेवाओं की प्रदायगी पर विपरीत असर होता है।



कोर्ट ने कहा था कि समय सीमा तय होने के बावजूद उसकी पालना नहीं करना संविधान का प्रत्यक्ष उल्लंघन है। कोर्ट ने चुनाव आयोग और सरकार को याद दिलाया था कि यह चुनाव अधिकतम 6 महीने तक ही टाले जा सकते हैं। अदालत के सख्त रुख के चलते तत्कालीन राज्य चुनाव आयुक्त ने चुनावी प्रक्रिया शुरु करने की कोशिश भी की थी।



ठेंगे पर हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट

हाईकोर्ट की खंडपीठ ने 14 नवंबर, 2025 के अपने फैसले में सरकार को 15 अप्रैल, 2026 तक चुनाव करवाने के आदेश दिए थे। सरकार ने वार्ड पुनर्गठन करने और ओबीसी सीट तय नहीं होने के कारण बताए थे। कोर्ट ने इसी आधार पर यह आदेश दिया था।



संविधान के अनुसार पंचायतों और निकायों के चुनाव पांच साल में हो जाने चाहिएं। इसमें भी वार्डों के परिसीमन जैसे कार्यों के लिए अधिकतम 6 महीने की छूट है। इसलिए हाई कोर्ट ने सरकार को 15 अप्रेल,2026 तक चुनाव करवाने के आदेश दिए। सुप्रीम कोर्ट ने भी इस आदेश केा बहाल रखा। ऐसे में हाईकोर्ट का 15 अप्रेल तक चुनाव करवाने के आदेश की पालना करना सरकार के लिए बाध्यकारी हो गया था।



अवमानना याचिका पर गुरुवार को सुनवाई

हाई कोर्ट के 15 अप्रैल 2026 तक चुनाव करवाने के आदेश की पालना नहीं होने के खिलाफ हाई कोर्ट में पूर्व विधायक संयम लोढ़ा व अन्य की अवमानना याचिकाओं पर 2 अप्रेल केा सुनवाई होगी। ऐसे में सरकार विभिन्न कारणों का हवाला देकर चुनाव करवाने के लिए और समय मांग सकती है। कोर्ट भले ही सरकार की कार्यप्रणाली से कितनी भी नाराजगी ​दिखाए, लेकिन, विशेष परिस्थितियों को देखते हुए कोर्ट चुनाव करवाने के लिए सरकार को और समय दे सकता है।



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