क्या खुद को सीएम का साला बताने वाला प्रमोद शर्मा गिरफ्तार होगा या सरकार की छवि चमकाने का इवेंट?

Jinesh Jain | Apr 18, 2026, 13:55 IST
Photograph: (the sootr)
खुद का सीएम भजनलाल का साला बताने वाला प्रमोद शर्मा क्या गिरफ्तार होगा या फिर पूरी कवायद सरकार की छवि चमकाने का ड्रामा बन जाएगी। यह सवाल इन दिनों राजस्थान के सियासी गलियारों में तैर रहा है।

Jaipur: राजस्थान की राजनीति में इन दिनों एक नाम सबसे ज्यादा चर्चा में है- प्रमोद शर्मा। खुद को मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा का साला बताकर सत्ता के गलियारों में हनक पैदा करने वाला यह शख्स आज पुलिस की फाइलों में फरार है।


सवाल यह नहीं है कि वह कहां है, सवाल यह है कि क्या जयपुर पुलिस वाकई उसे सलाखों के पीछे भेजेगी या यह पूरी कवायद सिर्फ सरकार की जीरो टॉलरेंस वाली छवि को चमकाने के लिए बुना गया एक सियासी ड्रामा है।



​साले का टैग और बल्ले-बल्ले

प्रमोद शर्मा की कहानी किसी फिल्मी स्क्रिप्ट से कम नहीं है। भजनलाल शर्मा के मुख्यमंत्री बनते ही प्रमोद ने सार्वजनिक रूप से खुद को उनका साला घोषित कर दिया। देखते ही देखते उसके घर पर सुबह से शाम तक अधिकारियों, नेताओं और ठेकेदारों का मजमा लगने लगा। हालांकि, जांच में सामने आया कि वह मुख्यमंत्री का सगा साला नहीं, बल्कि दूर—दराज का रिश्तेदार है। लेकिन सत्ता की चाशनी ऐसी थी कि इस दूर के रिश्ते ने ही उसे जयपुर का अघोषित पावर सेंटर बना दिया।





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​पुलिस की अचानक आई फुर्ती का रहस्य

फिलहाल ​प्रमोद शर्मा का यह पूरा मामला जुलाई 2025 में जयपुर के मानसरोवर इलाके में बदरवास की एक जमीन पर कब्जे से जुड़ा है। पीड़ित घनश्याम शर्मा ने प्रमोद सहित 9 लोगों पर मामला दर्ज कराया था। जानकारों का कहना है कि पुलिस इस मामले में फाइनल रिपोर्ट (FR) लगाकर इसे बंद करने की तैयारी में थी।



9 महीने तक सुस्त पड़ी यह फाइल अचानक खुल उठी। पुलिस ने गिरफ्तारी के बजाय 17 अप्रैल को पेश होने का नोटिस दिया। अधिकारी खुद इसे सामान्य प्रक्रिया बता रहे हैं। क्या यह प्रमोद को भागने के लिए दिया गया एक विंडो था?



सूत्रों का कहना है कि पुलिस ने अन्य आरोपियों के साथ ही प्रमोद शर्मा को भी नोटिस दिया था। अंडरग्राउंड होने की स्थिति में यह नोटिस उनके पुत्र को दिया गया। हैरानी वाली बात यह है कि प्रमोद शर्मा नोटिस में दर्शाई निर्धारित तारीख 17 अप्रैल को पुलिस के समक्ष पेश नहीं हुए।



एक पुलिस अधिकारी ने बताया कि ऐसा नोटिस जांच की सामान्य प्रक्रिया का एक हिस्सा होता है। इसमें गिरफ्तारी जैसी कोई बात नहीं है। नोटिस में केस से संबंधित आरोपित पक्षकार से अपने पक्ष के दस्तावेज पेश करने का जिक्र था।



अधिकारी ने इस बात पर हैरानी जताई कि करीब 9 महीने से जमीन कब्जे के इस मामले की केवल जांच ही चल रही है। इसमें एफआर लगाने का प्रस्ताव तैयार हो चुका था, लेकिन अचानक ही इस मामले में तेजी आ गई। क्योंकि, पहले भी इस मामले में सभी 9 आरोपियों को नोटिस दिया जा चुका है। एक वरिष्ठ अधिकारी का कहना है कि यह समझ से परे हैं कि नौ महीने बाद पुलिस इस मामले को क्यों खोल रही है।





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एसीबी का दाग और रसूख का बचाव

प्रमोद शर्मा के लिए विवाद नए नहीं हैं। उसे वर्ष 2020 में एसीबी (ACB) ने 5 लाख की रिश्वत लेते रंगे हाथों पकड़ा था। तब वह तत्कालीन भरतपुर डीआईजी के नाम पर वसूली कर रहा था। भाजपा की सत्ता आते ही वह सक्रिय हुआ और इस बार सीधा मुख्यमंत्री का साला बन बैठा। सूत्रों की मानें तो उसके संबंध सिर्फ भाजपा तक सीमित नहीं हैं, वह कांग्रेस के नेताओं में भी अपनी पहुंच रखता है।



हाल ही में प्रमोद शर्मा नेता प्रतिपक्ष टीकाराम जूली के एक पारिवरिक विवाह समरोह में विपक्षी नेताओं के साथ घुलते-मिलते दिखाई दिया। बताया जाता है कि कांग्रेस के एक पराजित नेता के साथ उनकी प्रॉपर्टी बिजनेस में पार्टनरशिप है। इन्हीं आरोपों के चलते इन्हें यूथ कांग्रेस में अध्यक्ष पद की दावेदारी खत्म हो गई।



​गैंगस्टर जैसा साम्राज्य

जानकारों के अनुसार प्रमोद शर्मा ने सीएम का साला होने का भरपूर फायदा उठाया है। उसका प्रभाव एक सफेदपोश गैंगस्टर जैसा हो गया था। वह विवादित संपत्तियों के सौदों में हस्तक्षेप करता और अधिकारियों को सीएम का करीबी होने का डर दिखाकर अपने काम करवाता था। अफसरों ने कई बार दबी जुबान में इसकी शिकायत भी की, लेकिन उसके इस कथित रिश्ते के आगे सब मौन थे।



बताते हैं कि प्रमोद के घर पर रोजाना सुबह से ट्रांसफर, पोस्टिंग और ठेकों में सिफारिश कराने वाले लोगों की भीड़ उमड़ती थी। उसने राजधानी में जवाहर सर्किल के पास एक रिटायर्ड पुलिस अधिकारी के गेस्ट हाउस को अपना अड्डा बना रखा था। यही से सरकार में पूरा खेल चलाया जाता था। इसकी शिकायत पीएमओ तक भी जा चुकी है।





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30 करोड़ में पूनम टॉकीज का सौदा

प्रमोद शर्मा ने 2020 में दौसा के पूनम टॉकीज का सौदा किया था। जानकारों के अनुसार बंशीवाल परिवार से उनकी यह डील 30 करोड़ रुपए के आसपास की थी। दिलचस्प बात यह रही कि प्रमोद ने टॉकीज का सौदा तो कर लिया था, लेकिन कभी उसका कोई कमर्शियल यूज नहीं किया। यह बात जरूर है कि सिनेमाहॉल खरीदने के बाद प्रमोद शर्मा चर्चा में आ गए।



प्रमोद कुछ आगे बढ़ते, इससे पहले वह तीन लाख रुपए के रिश्वत कांड में गिरफ्तार हो गए। कुछ साल ठंडे रहने के बाद वे भजनलाल के सीएम बनने के बाद सुर्खियों में आए। बताते हैं कि प्रमोद शर्मा की जयपुर के अलावा सुमेरपुर और बंसी पहाड़पुर की खदानों में भी प्रभावशाली लोगों के साथ पार्टनरशिप है।



​आधी रात का 'फरार' संदेश

बीते गुरुवार को प्रमोद शर्मा अपना जन्मदिन एक शक्ति प्रदर्शन के रूप में मनाने की तैयारी में था। टेंट लग चुके थे, पकवान बन रहे थे और रसूखदारों की लिस्ट तैयार थी। लेकिन जैसे ही पुलिस के आने की आहट मिली, जन्मदिन का जश्न अंडरग्राउंड होने के खेल में बदल गया। आधी रात को सोशल मीडिया पर कार्यक्रम स्थगित करने की पोस्ट डाली गई और प्रमोद गायब हो गया। पुलिस ने मौके पर पहुँचकर टेंट तो उखाड़ दिए, लेकिन आरोपी का हाथ न आना कई संदेह पैदा करता है।



गिरफ्तारी या सिर्फ दिखावा?

​मानसरोवर पुलिस कह रही है कि साक्ष्य पर्याप्त हैं और मुखबिर तंत्र सक्रिय है। लेकिन जयपुर के गलियारों में चर्चा आम है कि यह कार्रवाई सिर्फ प्रमोद को जयपुर की सीमाओं से बाहर रखने तक सीमित रह सकती है। सवाल यह है कि जब पुलिस को पता था कि आरोपी रसूखदार है तो उसे गिरफ्तारी के बजाय पेश होने का लचीला नोटिस क्यों दिया गया?



वरिष्ठ अधिकारियों का मानना है कि पुलिस ने अभी तक केस डायरी को इतना 'परिपक्व' नहीं किया है कि कोर्ट में यह टिक सके। क्या जानबूझकर कानूनी कमियां छोड़ी जा रही हैं? क्या पुलिस उन अफसरों पर हाथ डालेगी, जिन्होंने 9 महीने तक प्रमोद को संरक्षण दिया।





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अब सरकार की परीक्षा

​प्रमोद शर्मा का मामला अब केवल एक जमीन विवाद तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि यह सरकार के इकबाल की परीक्षा है। यदि गिरफ्तारी होती है तो यह संदेश जाएगा कि मुख्यमंत्री के नाम का दुरुपयोग करने वालों की जगह जेल है।


लेकिन यदि यह मामला ठंडा पड़ गया तो यह मान लिया जाएगा कि पुलिसिया कार्रवाई सिर्फ जनता की आंखों में धूल झोंकने और सरकार की छवि को डैमेज कंट्रोल देने के लिए की गई एक कवायद थी। ​फिलहाल, पुलिस फाइल में प्रमोद शर्मा फरार है।



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