राजस्थान में जननी एक्सप्रेस की खुली पोल, 600 एंबुलेंस फिर भी सिर्फ 12% हाई रिस्क गर्भवती महिलाओं को फायदा
Jageshwar prasad | Oct 19, 2026, 14:58 IST
राजस्थान में जननी एक्सप्रेस की 600 एंबुलेंस होने के बावजूद सिर्फ 12.6% हाई रिस्क गर्भवती महिलाओं को फायदा मिला
कोटा के न्यू मेडिकल कॉलेज में गर्भवती महिलाओं की मौत के बाद राजस्थान में मेटरनल हेल्थ सर्विसेस को लेकर सवाल उठ रहे। राजस्थान सरकार की समीक्षा में ही ये पता चला है कि सूबे में सिर्फ 12 फीसदी हाई रिस्क प्रेग्नेंसी वाली महिलाओं को 104 जननी एक्सप्रेस की सुविधा मिली। पूरे प्रदेश में 600 एंबुलेंस हैं, लेकिन अलग-अलग वजहों से ये सुविधा गर्भवतियों को नहीं मिल पाई।
कोटा के न्यू मेडिकल कॉलेज अस्पताल में दो गर्भवती महिलाओं की मौत ने राजस्थान की स्वास्थ्य सेवाओं की खामियों को फिर सामने ला दिया। सवाल सिर्फ अस्पताल में इलाज का नहीं, बल्कि गर्भवती महिलाओं को सही वक्त पर इलाज मिलने का भी है। खासकर उन महिलाओं का, जिनकी प्रेग्नेंसी में मां या बच्चे की जान को ज्यादा खतरा रहता है।
ऐसी महिलाओं को तुरंत अस्पताल पहुंचाने के लिए सरकार ने 104 जननी एक्सप्रेस (Janani Express) एंबुलेंस सेवा शुरू की थी, लेकिन सरकार की हालिया समीक्षा में ही यह पता चला है कि सिर्फ 12 फीसदी हाई रिस्क प्रेग्नेंसी वाली महिलाओं ने इस सुविधा का इस्तेमाल किया। प्रदेश में 600 एंबुलेंस होने के बावजूद जरूरतमंद महिलाओं तक सेवा नहीं पहुंच पा रही।
कोटा के न्यू मेडिकल कॉलेज अस्पताल में 40 साल की रेशमा की बीते बुधवार को सिजेरियन डिलीवरी हुई थी। इसके बाद उनकी तबीयत बिगड़ गई। किडनी में खराबी की वजह से उनकी मौत हो गई। इसके अगले दिन बारां की रोशन बैरवा ने भी इसी अस्पताल में दम तोड़ दिया था। रोशन के शरीर में खून की भारी कमी थी। डिलीवरी के बाद ज्यादा खून बहने से उनकी जान चली गई।
इस अस्पताल में पहले भी गर्भवती महिलाओं की मौत के मामले सामने आ चुके। इसी साल मई में कोटा के न्यू मेडिकल कॉलेज अस्पताल में सिजेरियन डिलीवरी के बाद 12 महिलाओं की किडनी खराब होने का मामला सामने आया था। इनमें से पांच महिलाओं को मौत हो गई थी। लगातार सामने आ रहे ऐसे मामलों ने अस्पतालों में इलाज, मरीजों की निगरानी और समय पर जरूरी सुविधाएं मिलने को लेकर सवाल खड़े कर दिए हैं।
हालांकि, इन मौतों का जननी एक्सप्रेस की खामियों से सीधा कोई संबंध नहीं है, लेकिन हालिया घटनाएं बताती हैं कि हाई रिस्क प्रेग्नेंसी वाली महिलाओं के लिए अस्पताल पहुंचने से लेकर इलाज मिलने तक पूरी व्यवस्था का मजबूत होना कितना जरूरी है।
हाई रिस्क प्रेग्नेंसी (High Risk Pregnancy) में समय की अहमियत सबसे ज्यादा होती है। ज्यादा खून बहना, गंभीर एनीमिया, हाई ब्लड प्रेशर या दूसरी परेशानी होने पर महिला को तुरंत अस्पताल पहुंचाना पड़ सकता है। इसी काम के लिए जननी एक्सप्रेस है, लेकिन स्वास्थ्य विभाग की समीक्षा में इस सेवा की कमजोरियां सामने आई हैं। प्रदेश की सिर्फ 12 फीसदी हाई रिस्क गर्भवती महिलाओं ने अस्पताल पहुंचने के लिए जननी एक्सप्रेस का इस्तेमाल किया।
हालत यह है कि एक एंबुलेंस पर रोज औसतन सिर्फ 0.77 केस आए। यानी एक महिला ने भी इस सेवा का इस्तेमाल नहीं किया। वहीं, प्रदेश भर में कुल 114एंबुलेंस में एक भी मरीज दर्ज नहीं हुआ। यानी एक तरफ महिलाओं को समय पर अस्पताल पहुंचाने की जरूरत है, दूसरी तरफ बड़ी संख्या में सरकारी एंबुलेंस का इस्तेमाल ही नहीं हो रहा।
जननी एक्सप्रेस एंबुलेंस का इस्तेमाल इतना कम क्यों हुआ? इसका जवाब भी विभाग की समीक्षा में मिला है। मरीज ले जाने के लिए 82 एंबुलेंस के ड्राइवरों को फोन किया गया, लेकिन उन्होंने कॉल तक नहीं उठाया। वहीं, 90 गाड़ियों ने डीजल नहीं होने की वजह से मरीज ले जाने से मना कर दिया। इसके अलावा 167 एंबुलेंस में खराबी या सर्विसिंग की परेशानी सामने आई।
इन आंकड़ों से साफ है कि दिक्कत सिर्फ एंबुलेंस की संख्या की नहीं है। गाड़ियों में डीजल, समय पर मरम्मत और कॉल सेंटर से ड्राइवरों के तालमेल की व्यवस्था भी कमजोर है। ऐसी हालत में किसी गंभीर गर्भवती महिला को तुरंत अस्पताल पहुंचाना मुश्किल हो सकता है।
जननी एक्सप्रेस की मौजूदा हालत के पीछे पिछले साल से चल रही प्रशासनिक परेशानी भी है। इस सेवा का संचालन मॉडर्न इमरजेंसी सर्विसेज कंपनी कर रही थी। कंपनी का टेंडर 10 दिसंबर 2025 को खत्म हो गया था। राजस्थान एंबुलेंस कर्मचारी यूनियन के प्रदेशाध्यक्ष वीरेंद्र सिंह शेखावत के मुताबिक, विभाग को पहले से पता था कि दिसंबर में टेंडर खत्म हो जाएगा। इसके बावजूद नए टेंडर की प्रोसेस देरी से शुरू की गई थी। इसी वजह से पूरे प्रदेश में 600 एंबुलेंस का संचालन प्रभावित हुआ।
एंबुलेंस सेवा का नए टेंडर में देरी की वजह से कई महीनों तक सेवा पूरी तरह पटरी पर नहीं लौट सकी। इस दौरान गर्भवती महिलाओं को अस्पताल पहुंचाने के लिए 108 एंबुलेंस और दूसरी स्थानीय व्यवस्थाओं का सहारा लेना पड़ा।
टेंडर खत्म होने के बाद सरकार ने जननी एक्सप्रेस का संचालन राजस्थान मेडिकेयर रिलीफ सोसाइटी (RMRS) के जरिए कराने का फैसला किया। लेकिन गाड़ियों को अस्पतालों के जिम्मे सौंपने, ड्राइवरों की व्यवस्था करने और कॉल सेंटर से जोड़ने में समय लगा।
स्वास्थ्य विभाग ने जून के आखिरी सप्ताह में सभी 600 एंबुलेंस को 10 जुलाई तक चालू करने के निर्देश दिए थे। गाड़ियों की मरम्मत कराने, ड्राइवरों के मोबाइल नंबर अपडेट करने और डीजल की व्यवस्था पक्का करने को कहा गया था।
इसके बावजूद अक्टूबर की समीक्षा में वही परेशानियां फिर सामने आ गईं। यानी सेवा दोबारा शुरू करने के आदेश तो जारी हुए, लेकिन गाड़ियों को नियमित और भरोसेमंद तरीके से चलाने की व्यवस्था अब भी पूरी तरह ठीक नहीं हो सकी।
राजस्थान में जननी एक्सप्रेस सेवा की शुरुआत अक्टूबर 2012 में हुई थी। इसका मकसद गर्भवती महिलाओं को मुफ्त में अस्पताल पहुंचाना था, ताकि गाड़ी नहीं मिलने या किराए के पैसे नहीं होने से इलाज में देरी न हो।अक्टूबर 2021 में इस सेवा के तहत नई चिरंजीवी 104 जननी एक्सप्रेस एंबुलेंस भी शुरू की गई थीं।
राज्य सरकार की आर्थिक समीक्षा के मुताबिक, वित्त वर्ष 2025-26 में इस योजना के लिए 100.24 करोड़ रुपए का बजट मंजूर था। दिसंबर 2025 तक करीब 55.24 करोड़ रुपए खर्च हो चुके थे।इतना बजट और 600 एंबुलेंस होने के बावजूद हाई रिस्क गर्भवती महिलाओं तक सेवा की पहुंच कम रहना व्यवस्था पर बड़ा सवाल है।
राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन के स्टेट मिशन डायरेक्टर जोगाराम के मुताबिक, राजस्थान में जननी एक्सप्रेस की 600 एंबुलेंस हैं। जनवरी 2021 से 10 दिसंबर 2025 के बीच इस सेवा से करीब 18 लाख लोगों को फायदा मिला है। हालांकि, हकीकत तो कुछ और ही कहानी बयां कर रही।
अब स्वास्थ्य विभाग ने सभी मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारियों (CMHO) को व्यवस्था सुधारने के निर्देश दिए हैं। जिन एंबुलेंस में चार से कम केस आ रहे हैं, उन्हें उन ग्रामीण सरकारी अस्पतालों में भेजने को कहा गया है, जहां ज्यादा डिलीवरी होती हैं।इसके साथ ही ड्राइवरों और कॉल सेंटर के बीच तालमेल सुधारने, गाड़ियों की नियमित जांच कराने और डीजल की परेशानी दूर करने के निर्देश दिए गए हैं। आदेश नहीं मानने वाले अधिकारियों से तीन वर्किंग डे में जवाब मांगा जाएगा।
कोटा में गर्भवती महिलाओं की मौत ने अस्पतालों में इलाज की व्यवस्था पर सवाल खड़े किए हैं। वहीं, जननी एक्सप्रेस की समीक्षा ने अस्पताल पहुंचने से पहले की कमजोरियां उजागर की हैं। गर्भवती महिला की हालत गंभीर होने पर हर मिनट कीमती होता है। ऐसे में सिर्फ एंबुलेंस उपलब्ध होना काफी नहीं है। उसका समय पर पहुंचना, मरीज को सही अस्पताल ले जाना और वहां तुरंत इलाज मिलना भी उतना ही जरूरी है।
अब देखना यह है कि सरकार के नए निर्देशों के बाद जननी एक्सप्रेस की हालत कितनी सुधरती है। क्योंकि हाई रिस्क प्रेग्नेंसी वाली महिलाओं के लिए समय पर मिलने वाली एंबुलेंस सिर्फ एक सरकारी सुविधा नहीं, बल्कि जान बचाने का जरूरी जरिया है।
ऐसी महिलाओं को तुरंत अस्पताल पहुंचाने के लिए सरकार ने 104 जननी एक्सप्रेस (Janani Express) एंबुलेंस सेवा शुरू की थी, लेकिन सरकार की हालिया समीक्षा में ही यह पता चला है कि सिर्फ 12 फीसदी हाई रिस्क प्रेग्नेंसी वाली महिलाओं ने इस सुविधा का इस्तेमाल किया। प्रदेश में 600 एंबुलेंस होने के बावजूद जरूरतमंद महिलाओं तक सेवा नहीं पहुंच पा रही।
कोटा मेडिकल कॉलेज में गर्भवती की मौत से उठे सवाल
इस अस्पताल में पहले भी गर्भवती महिलाओं की मौत के मामले सामने आ चुके। इसी साल मई में कोटा के न्यू मेडिकल कॉलेज अस्पताल में सिजेरियन डिलीवरी के बाद 12 महिलाओं की किडनी खराब होने का मामला सामने आया था। इनमें से पांच महिलाओं को मौत हो गई थी। लगातार सामने आ रहे ऐसे मामलों ने अस्पतालों में इलाज, मरीजों की निगरानी और समय पर जरूरी सुविधाएं मिलने को लेकर सवाल खड़े कर दिए हैं।
हालांकि, इन मौतों का जननी एक्सप्रेस की खामियों से सीधा कोई संबंध नहीं है, लेकिन हालिया घटनाएं बताती हैं कि हाई रिस्क प्रेग्नेंसी वाली महिलाओं के लिए अस्पताल पहुंचने से लेकर इलाज मिलने तक पूरी व्यवस्था का मजबूत होना कितना जरूरी है।
600 एंबुलेंस पर 114 पर मरीज ही नहीं
हालत यह है कि एक एंबुलेंस पर रोज औसतन सिर्फ 0.77 केस आए। यानी एक महिला ने भी इस सेवा का इस्तेमाल नहीं किया। वहीं, प्रदेश भर में कुल 114एंबुलेंस में एक भी मरीज दर्ज नहीं हुआ। यानी एक तरफ महिलाओं को समय पर अस्पताल पहुंचाने की जरूरत है, दूसरी तरफ बड़ी संख्या में सरकारी एंबुलेंस का इस्तेमाल ही नहीं हो रहा।
जननी एक्सप्रेस एंबुलेंस का इस्तेमाल इतना कम क्यों हुआ? इसका जवाब भी विभाग की समीक्षा में मिला है। मरीज ले जाने के लिए 82 एंबुलेंस के ड्राइवरों को फोन किया गया, लेकिन उन्होंने कॉल तक नहीं उठाया। वहीं, 90 गाड़ियों ने डीजल नहीं होने की वजह से मरीज ले जाने से मना कर दिया। इसके अलावा 167 एंबुलेंस में खराबी या सर्विसिंग की परेशानी सामने आई।
इन आंकड़ों से साफ है कि दिक्कत सिर्फ एंबुलेंस की संख्या की नहीं है। गाड़ियों में डीजल, समय पर मरम्मत और कॉल सेंटर से ड्राइवरों के तालमेल की व्यवस्था भी कमजोर है। ऐसी हालत में किसी गंभीर गर्भवती महिला को तुरंत अस्पताल पहुंचाना मुश्किल हो सकता है।
दिसंबर में एंबुलेंस सेवा का टेंडर खत्म हो गया था
एंबुलेंस सेवा का नए टेंडर में देरी की वजह से कई महीनों तक सेवा पूरी तरह पटरी पर नहीं लौट सकी। इस दौरान गर्भवती महिलाओं को अस्पताल पहुंचाने के लिए 108 एंबुलेंस और दूसरी स्थानीय व्यवस्थाओं का सहारा लेना पड़ा।
जुलाई में दोबारा चालू करने के निर्देश, अक्टूबर में भी परेशानी
स्वास्थ्य विभाग ने जून के आखिरी सप्ताह में सभी 600 एंबुलेंस को 10 जुलाई तक चालू करने के निर्देश दिए थे। गाड़ियों की मरम्मत कराने, ड्राइवरों के मोबाइल नंबर अपडेट करने और डीजल की व्यवस्था पक्का करने को कहा गया था।
इसके बावजूद अक्टूबर की समीक्षा में वही परेशानियां फिर सामने आ गईं। यानी सेवा दोबारा शुरू करने के आदेश तो जारी हुए, लेकिन गाड़ियों को नियमित और भरोसेमंद तरीके से चलाने की व्यवस्था अब भी पूरी तरह ठीक नहीं हो सकी।
2012 में शुरू हुई थी जननी एक्सप्रेस सेवा
राज्य सरकार की आर्थिक समीक्षा के मुताबिक, वित्त वर्ष 2025-26 में इस योजना के लिए 100.24 करोड़ रुपए का बजट मंजूर था। दिसंबर 2025 तक करीब 55.24 करोड़ रुपए खर्च हो चुके थे।इतना बजट और 600 एंबुलेंस होने के बावजूद हाई रिस्क गर्भवती महिलाओं तक सेवा की पहुंच कम रहना व्यवस्था पर बड़ा सवाल है।
अब कम मरीजों वाली एंबुलेंस को दूसरी जगह भेजेगी सरकार
अब स्वास्थ्य विभाग ने सभी मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारियों (CMHO) को व्यवस्था सुधारने के निर्देश दिए हैं। जिन एंबुलेंस में चार से कम केस आ रहे हैं, उन्हें उन ग्रामीण सरकारी अस्पतालों में भेजने को कहा गया है, जहां ज्यादा डिलीवरी होती हैं।इसके साथ ही ड्राइवरों और कॉल सेंटर के बीच तालमेल सुधारने, गाड़ियों की नियमित जांच कराने और डीजल की परेशानी दूर करने के निर्देश दिए गए हैं। आदेश नहीं मानने वाले अधिकारियों से तीन वर्किंग डे में जवाब मांगा जाएगा।
कोटा में गर्भवती महिलाओं की मौत ने अस्पतालों में इलाज की व्यवस्था पर सवाल खड़े किए हैं। वहीं, जननी एक्सप्रेस की समीक्षा ने अस्पताल पहुंचने से पहले की कमजोरियां उजागर की हैं। गर्भवती महिला की हालत गंभीर होने पर हर मिनट कीमती होता है। ऐसे में सिर्फ एंबुलेंस उपलब्ध होना काफी नहीं है। उसका समय पर पहुंचना, मरीज को सही अस्पताल ले जाना और वहां तुरंत इलाज मिलना भी उतना ही जरूरी है।
अब देखना यह है कि सरकार के नए निर्देशों के बाद जननी एक्सप्रेस की हालत कितनी सुधरती है। क्योंकि हाई रिस्क प्रेग्नेंसी वाली महिलाओं के लिए समय पर मिलने वाली एंबुलेंस सिर्फ एक सरकारी सुविधा नहीं, बल्कि जान बचाने का जरूरी जरिया है।
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