RGHS में 'बीमा मॉडल' की तैयारी, 14 लाख कर्मचारियों और पेंशनर्स के इलाज का बदलेगा तरीका, फर्जीवाड़े पर लगेगी लगाम

Ashish Bhardwaj | Apr 02, 2026, 13:27 IST
Photograph: (the sootr)
राजस्थान में कर्मचारियों और पेंशनरों की योजना आरजीएचएस को 'कैशलेस मॉडल' से 'बीमा मॉडल' में बदलने की तैयारी हो रही है। इससे न केवल भुगतान सिस्टम बदलेगा, बल्कि फर्जीवाड़े पर रोक लगेगी।

News In Short

  • राजस्थान सरकार की RGHS योजना को कैशलेस से बीमा मॉडल में बदलने की तैयारी।
  • योजना में बदलाव से फर्जीवाड़े पर नियंत्रण और सरकारी खजाने पर कम दबाव का अनुमान।
  • बीमा मॉडल से अस्पतालों का भुगतान और इलाज में रुकावट नहीं आने का दावा ।
  • पहले पेंशनर्स को बीमा मॉडल में लाया जाएगा, फिर कर्मचारियों को जोड़ा जाएगा।
  • कर्मचारी संगठनों ने इस बदलाव का विरोध करते हुए क्लेम रिव्यु और प्रक्रिया की जताई चिंता।

News In Detail

जयपुर। राजस्थान में सरकारी कर्मचारियों और पेंशनर्स कीकैशलेस उपचार योजना आरजीएचएस (राजस्थान गवर्नमेंट हेल्थ स्कीम) अब एक बड़े बदलाव की दहलीज पर है। राज्य सरकार इस योजना को वर्तमान 'कैशलेस मॉडल' से शिफ्ट करके 'बीमा (इंश्योरेंस) मॉडल' पर लाने की तैयारी कर रही है।



चिकित्सा मंत्री गजेंद्र सिंह खींवसर ने कहा कि हमने RGHS का घाटा 700 करोड़ रुपए कम कर दिया है। अब इसे इंश्योरेंस मोड पर लाएंगे ताकि फर्जीवाड़ा पूरी तरह बंद हो और अगले 6-8 महीनों में घाटा शून्य हो जाए।



क्यों पड़ रही है बदलाव की जरूरत?

वर्तमान में सरकार अस्पतालों और मेडिकल स्टोर्स को सीधे भुगतान करती है, लेकिन इसमें दो बड़ी चुनौतियां सामने आ रही हैं। पहला योजना में फर्जी बिलिंग और अनियमितताओं के कारण सरकारी खजाने पर अतिरिक्त बोझ पड़ रहा है। दूसरा निजी अस्पतालों का करोड़ों रुपया पिछले 8-9 महीनों से बकाया है, जिससे वे कैशलेस इलाज देने में मना करने लगे हैं।



क्या है सरकार तर्क?

सरकार का तर्क है कि बीमा कंपनी को बीच में लाने से व्यवस्था पारदर्शी और तेज होगी। बीमा कंपनी सीधे अस्पतालों के क्लेम सेटल करेगी, जिससे इलाज में रुकावट नहीं आएगी। वहीं इंश्योरेंस कंपनियों का अपना ऑडिट सिस्टम होता है, जिससे फर्जी बिलिंग पकड़ना आसान होगा। इसके साथ ही गंभीर बीमारियों के लिए क्लेम प्रोसेस तेज होगा और अधिक निजी अस्पतालों को योजना से जोड़ा जा सकेगा।



दो चरणों में लागू होगा 'न्यू मॉडल'

सरकार इस बदलाव को एक साथ लागू करने के बजाय सावधानी से दो चरणों में आगे बढ़ाएगी। प्रथम चरण में पेंशनर्स को इस बीमा मॉडल के दायरे में लाया जाएगा। द्वितीय चरण में पेंशनर्स की व्यवस्था सफल रहने के बाद ही सेवारत कर्मचारियों को इसमें जोड़ा जाएगा।



कर्मचारियों की सुविधा या दुविधा?

भले ही सरकार इसे राहत बता रही है, लेकिन कर्मचारी संगठनों ने इसका विरोध जताया है। उनको इस मॉडल में आशंकाएं प्रतीत हो रहीं हैं। कर्मचारयों को डर है कि बीमा कंपनियां 'नियम और शर्तों' का हवाला देकर जायज क्लेम भी रिजेक्ट कर सकती हैं। इसके अलावा कागजी जाल बढ़ जाने से अप्रूवल की लंबी प्रक्रिया से मरीज की जान जोखिम में पड़ सकती है। इलाज के खर्च पर कोई कैपिंग (सीमा) तय कर दी जा सकती है।



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