2004 में शून्य हुए थे बाघ, अब बढ़ी आबादी, लेकिन नहीं हट पा रहे जंगल से गांव

Jageshwar prasad | Jun 30, 2026, 15:00 IST
बाघों की बढ़ती संख्या के साथ बढ़ रहा मानव-वन्यजीव टकराव का खतरा
राजस्थान के सरिस्का टाइगर रिजर्व में गांवों का विस्थापन नहीं हो पा रहा है। यहां से ​24 में से प्राथमिकता वाले 11 गांवों को हटाने का लक्ष्य था। अब तक केवल 5 गांव विस्थापित हो पाए।

समझें क्या है पूरा मामला

  • सरिस्का टाइगर रिजर्व में गांवों का विस्थापन नहीं हो पा रहा है।
  • ​24 में से प्राथमिकता वाले 11 गांवों को पहले हटाने का लक्ष्य था।
  • सरिस्का में अब तक केवल 5 गांव ही विस्थापित हो पाए।
  • शेष 6 गांवों की विस्थापन प्रक्रिया लंबे समय से अधर में लटकी हुई है।

राजस्थान के सरिस्का टाइगर रिजर्व से गांवों के विस्थापन की योजना फिलहाल जमीन की भारी कमी के कारण सुस्त पड़ गई है।



इस विस्थापन योजना के तहत कोर एरिया में बसे 24 गांवों में से 11 गांवों को पहले बाहर बसाना था, लेकिन भूमि संबंधी अड़चनों के कारण केवल 5 गांव ही पूरी तरह विस्थापित हो पाए हैं। शेष 6 गांवों की विस्थापन प्रक्रिया लंबे समय से अधर में लटकी हुई है।



​अंतिम चरण में सुकोला, क्रास्का और देवरी का सर्वे पूरा

​सरिस्का के क्षेत्रीय निदेशक संग्राम सिंह कटियार ने बताया कि विस्थापन का कार्य लगातार जारी है। सबसे बड़ी चुनौती विस्थापित परिवारों को बसाने के लिए उपयुक्त सरकारी भूमि की उपलब्धता तय करना है।



​अधिकारियों के अनुसार सुकोला गांव का विस्थापन अब अपने अंतिम चरण में पहुंच चुका है। यहां शुरुआत में 48 परिवारों को चिन्हित किया गया था। इनमें से 47 परिवारों का पुनर्वास किया जा चुका है। अब महज एक परिवार का विस्थापन शेष है।



क्रास्का गांव का सर्वे भी पूरी तरह संपन्न हो चुका है। इसके पुनर्वास के लिए मलियारजट क्षेत्र में पर्याप्त भूमि चिन्हित की गई है। वहीं, देवरी गांव के विस्थापन के लिए लक्ष्मणगढ़ तहसील में 202 हेक्टेयर सरकारी भूमि की पहचान की गई है।



इस भूमि के डायवर्सन (वन भूमि परिवर्तन) का प्रस्ताव राज्य सरकार को भेजा गया है। इसकी मंजूरी मिलते ही देवरी गांव के ग्रामीणों को शिफ्ट करने का रास्ता साफ हो जाएगा।



​सरकार की हरी झंडी का इंतजार

बाकी बचे गांवों के पुनर्वास के लिए वन विभाग ने खैरथल-तिजारा क्षेत्र में लगभग 1200 हेक्टेयर सरकारी भूमि की पहचान की है।



इस संबंध में संबंधित जिला कलेक्टर को जमीन आवंटन के लिए विधिवत प्रस्ताव भेजा गया है। जैसे ही सरकार से इस भूमि के आवंटन और डायवर्सन को अंतिम स्वीकृति मिलेगी, विस्थापित परिवारों को जमीनें आवंटित कर दी जाएंगी। इससे पहले विभाग पांच गांवों का सफल विस्थापन कर उन्हें बहरोड़ और मौजपुर रुंध क्षेत्र में सुरक्षित रूप से बसा चुका है।



​2004 का वो काला दौर, जब शून्य हो गए थे बाघ

​सरिस्का में गांवों के विस्थापन की यह कवायद बेहद कड़वे इतिहास से जुड़ी है। वर्ष 2004 में अत्यधिक मानवीय गतिविधियों, मवेशियों के दबाव और शिकारियों की बेखौफ घुसपैठ के कारण बाघों की आबादी शून्य हो गई थी।



​इसके बाद 2008 में रणथंभौर नेशनल पार्क से बाघों को लाकर सरिस्का में उनका पुनर्वास किया गया। बाघों को दोबारा बसाने के साथ ही सुरक्षा व्यवस्था को पूरी तरह से बदल दिया गया।



वन विभाग ने अभ्यारण्य में गश्त बढ़ाई, शिकारियों पर कड़ा शिकंजा कसा और आधुनिक मॉनिटरिंग सिस्टम लागू किया। इसी दौरान एनटीसीए ने कड़े निर्देश दिए थे कि अभ्यारण्य के भीतर बसे सभी गांवों को चरणबद्ध तरीके से बाहर शिफ्ट किया जाए।



​देरी से बढ़ रहा है टकराव का खतरा

​वर्तमान में सरिस्का में बाघों का कुनबा लगातार बढ़ रहा है। लेकिन जैसे-जैसे बाघों की संख्या बढ़ रही है, कोर एरिया के गांवों का विस्थापन न होने से मानव-वन्यजीव टकराव का खतरा भी बढ़ता जा रहा है।



वन विभाग का मानना है कि विस्थापन में हो रही देरी बाघ संरक्षण की दीर्घकालिक योजना को प्रभावित कर रही है। अब पूरी उम्मीद राज्य सरकार की ओर से मिलने वाली भूमि आवंटन की मंजूरी पर टिकी है, जिसके बाद इस प्रक्रिया में तेजी लाई जा सकेगी।



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