सरिस्का के साये में जमीन का शिकार, अफसरों की मिलीभगत से किसानों के बिक रहे पुश्तैनी खेत
The Sootr | Jun 05, 2026, 15:03 IST
Photograph: (the sootr)
राजस्थान में सरिस्का के आसपास जमीनों का अलग ही तरह का खेल चल रहा है। राजस्व अधिकारियों की मिलीभगत से ऐसे मामले सामने आ रहे हैं, जिनमें पहले विवाद पैदा किया जाता है और बाद में उन्हीं जमीनों का सौदा हो जाता है।
सुनील जैन@अलवर
राजस्थान की मशहूर सरिस्का टाइगर रिजर्व के आसपास इन दिनों एक अलग ही तरह का शिकार चल रहा है। यह शिकार किसी वन्यजीव का नहीं, बल्कि सीधे-साधे किसानों की जमीनों का है। सरिस्का से सटे टहला क्षेत्र में एक ऐसा जमीन सिंडिकेट काम कर रहा है, जिसने प्रशासनिक व्यवस्था, कानून और नैतिकता की धज्जियां उड़ाकर रख दी हैं।
अदालत के आदेश के बाद अब टहला के तहसीलदार प्रवीण दहिया, इलाके के कानूनगो और पटवारी सहित कई रसूखदारों के खिलाफ धोखाधड़ी, पद के दुरुपयोग और आपराधिक साजिश की एफआईआर दर्ज हो चुकी है। राजगढ़ के वरिष्ठ अधिवक्ता कैलाश चंद्र भारद्वाज द्वारा उजागर यह मामला किसानों को डराकर उनकी पुश्तैनी जमीन छीनने और उसे दिल्ली-हरियाणा के उद्योगपतियों को परोसने का खेल है।
टहला क्षेत्र में जमीनों के इस मायाजाल को समझने के लिए दर्ज एफआईआर में शामिल एक बानगी ही काफी है:
26 नवंबर 2025: तहसीलदार द्वारा खसरा नंबर 1739, 1745, 1771 और 1772 का एक पुराना आवंटन अचानक निरस्त कर दिया जाता है। जमीन सरकारी खाते में आते ही सिंडिकेट सक्रिय होता है।
01 दिसंबर 2025 (मात्र 5 दिन बाद): इस बेशकीमती जमीन की रजिस्ट्री आनन-फानन में एक मामूली सुरक्षा गार्ड (Security Guard) के नाम कर दी जाती है।
04 दिसंबर 2025 (मात्र 3 दिन बाद): वह सुरक्षा गार्ड इस जमीन को हरियाणा के एक बड़े रसूखदार कारोबारी गौरव को करोड़ों रुपये में बेच देता है।
सवाल यह है कि जिस गरीब सुरक्षा गार्ड के पास दो वक्त की रोटी का जुगाड़ बमुश्किल होता है, उसने करोड़ों की जमीन कैसे खरीदी? और महज तीन दिन में हरियाणा के बड़े कारोबारी से उसका संपर्क किसने कराया?
साफ है कि सुरक्षा गार्ड महज एक मुखौटा था, जिसके पीछे असली चेहरा खुद तंत्र के रखवालों का था। ऐसे सैकड़ों मामले इस इलाके की फाइलों में दफन हैं।
सिंडिकेट की मनमानी की पराकाष्ठा ग्राम रूपबास (तहसील टहला) के एक अन्य मामले में देखने को मिलती है।
राजस्व रिकॉर्ड के अनुसार टहला तहसीलदार और पटवारी लोसल ने 10 जनवरी 2025 को खुद एक लिखित रिपोर्ट एसडीएम कोर्ट में पेश की थी। इसमें स्पष्ट था कि विवादित भूमि पर संबंधित खातेदार का कोई कब्जा नहीं है।
नियमानुसार जब कब्जा ही नहीं था, तो प्रार्थी को धारा 183 के तहत बेदखली का दावा करना चाहिए था। सारे कायदे दरकिनार कर 9 फरवरी 2026 को एसडीएम कोर्ट राजगढ़ (सीमा मीना) और तहसीलदार टहला द्वारा पत्थरगढ़ी का मामला दर्ज कराया गया।
महज एक हफ्ते के भीतर (16 फरवरी 2026 को) एसडीएम ने इसके आदेश भी जारी कर दिए। न तो आसपास के खातेदारों को नोटिस देकर पार्टी बनाया गया और न ही मौके की हकीकत देखी गई।
हद तो तब हो गई जब 15 मई 2026 को तहसीलदार प्रवीण दहिया खुद अमले-जमले, ट्रैक्टर और जेसीबी लेकर मौके पर पहुंच गए। पत्थरगढ़ी के नियमों में कहीं भी जेसीबी से तोड़फोड़ का प्रावधान नहीं है, लेकिन वहां गेट तोड़े गए और जबरन कब्जा दिलाया गया।
शिकायतकर्ता का आरोप है कि इसके बाद तहसीलदार ने पीड़ित पक्ष को सीधे शब्दों में धमकी दी कि शिकायतें वापस ले लो और मेरे पास आ जाओ, तुम्हें कुछ सेटलमेंट करवा दूंगा। इस जमीन का
सौदा 38 लाख रुपये प्रति बीघा में हो चुका है।
सरिस्का का यह इलाका इको-सेंसिटिव जोन और क्रिटिकल टाइगर हैबिटेट (CTH) के अंतर्गत आता है। सुप्रीम कोर्ट और एनजीटी के सख्त निर्देश हैं कि यहां किसी भी प्रकार का व्यावसायिक निर्माण या जमीनों की अनियंत्रित खरीद-फरोख्त नहीं हो सकती। लेकिन इस सिंडिकेट ने पर्यावरण के नियमों को भी म्यूट मोड पर डाल दिया।
अधिवक्ता कैलाश भारद्वाज का सीधा आरोप है कि इस खेल में केवल राजस्व विभाग ही नहीं, बल्कि सरिस्का के कई बड़े व रसूखदार अधिकारी भी शामिल हैं। सरिस्का में जितने भी बड़े पदों पर अधिकारी तैनात होकर आए, उनमें से कई ने अपने रसूख का इस्तेमाल कर अपने परिवार जनों, रिश्तेदारों और बेनामी नामों से यहां जमीनें खरीदीं।
आज इस प्रतिबंधित क्षेत्र में जो चमचमाती फाइव स्टार होटलें, लग्जरी रिसॉर्ट और बड़े-बड़े फार्म हाउस दिख रहे हैं, उनके पीछे अधिकारियों की मिलीभगत से एक गठजोड़ काम कर रहा है।
टहला में जमीनों की लूट का यह कोई पहला मामला नहीं है। इस इलाके का इतिहास ऐसे घोटालों से भरा पड़ा है।
2021 प्रशासन गांवों के संग नदी, नाले, पहाड़ और सिवायचक (सरकारी) जैसी 2500 बीघा जमीन 803 रसूखदारों व अन्य के नाम आवंटित कर दी गई।
मामला खुलने पर तत्कालीन जिला कलेक्टर ने 470 बीघा का आवंटन और 35 खातेदारियां रद्द कीं। 25 अधिकारियों-कर्मचारियों को चार्जशीट दी गई।
2025-26 वर्तमान सिंडिकेट किसानों को डराना, सुरक्षा गार्ड्स के नाम पर फर्जी रजिस्ट्रियां करना और जेसीबी से जबरन कब्जे दिलवाना।
अदालत के आदेश पर तहसीलदार, कानूनगो और पटवारी पर FIR दर्ज, लेकिन ठोस विभागीय कार्रवाई का अब भी इंतजार।
इस पूरे मामले का सबसे स्याह पहलू यह है कि यह एफआईआर किसी शुरुआती शिकायत पर नहीं, बल्कि बाकायदा कोर्ट द्वारा करवाई गई जांच में अधिकारियों को दोषी पाए जाने के बाद दर्ज हुई है।
जब अदालत की जांच में यह साबित हो चुका है कि अफसर कमर्शियल एजेंट की तरह काम कर रहे थे, तो फिर अब तक सरकार या जिला प्रशासन ने इन्हें सस्पेंड क्यों नहीं किया?
स्थानीय ग्रामीणों का आरोप है कि इन अधिकारियों को जयपुर में बैठे कुछ नेताओं का राजनीतिक संरक्षण प्राप्त है। जब तक यह सियासी कवच नहीं टूटेगा, तब तक पुलिसिया कार्रवाई महज कागजी खानापूर्ति बनकर रह जाएगी।
आज सरिस्का के आसपास खासकर टहला में जमीनों के दाम आज करोड़ों रुपए प्रति बीघा तक पहुंच चुके हैं। दिल्ली, गुरुग्राम, नोएडा और हरियाणा के बड़े-बड़े बिल्डर्स और होटल चेन यहां हर कीमत पर जमीन हथियाना चाहते हैं।
जमीन की इसी बेलगाम कीमत ने स्थानीय भू-माफियाओं और भ्रष्ट तंत्र की भूख को सातवें आसमान पर पहुंचा दिया है। सीधे-साधे स्थानीय किसानों को मुकदमों का डर दिखाया जाता है, पुलिस और लाठी का खौफ दिया जाता है, और फिर औने-पौने दामों में उनकी जमीनें लिखवा ली जाती हैं।
ग्रामीणों का कहना है कि यदि इस पूरे सिंडिकेट की निष्पक्ष जांच नहीं कराई गई तो आने वाले कुछ ही सालों में टहला का पूरा भूगोल बदल जाएगा।
50 से अधिक संस्थानों को नोटिस, पर अफसरों से सांठ-गांठ के खेल में दांव पर हजारों जिंदगी
5 जिलाध्यक्षों ने कांग्रेस हाईकमान को भेजी चिट्टी, जानें नीरज डांगी का क्यों हो रहा है विरोध
मजिस्ट्रेटों के लिए खरीदे 70 एसी, चलाने के लिए बिजली का पूरा लोड ही नहीं
भिवाड़ी में ऑयल टैंक ब्लास्ट से दो फैक्ट्रियां खाक, 5 कर्मचारी झुलसे; 3 दिल्ली रेफर
राजस्थान की मशहूर सरिस्का टाइगर रिजर्व के आसपास इन दिनों एक अलग ही तरह का शिकार चल रहा है। यह शिकार किसी वन्यजीव का नहीं, बल्कि सीधे-साधे किसानों की जमीनों का है। सरिस्का से सटे टहला क्षेत्र में एक ऐसा जमीन सिंडिकेट काम कर रहा है, जिसने प्रशासनिक व्यवस्था, कानून और नैतिकता की धज्जियां उड़ाकर रख दी हैं।
अदालत के आदेश के बाद अब टहला के तहसीलदार प्रवीण दहिया, इलाके के कानूनगो और पटवारी सहित कई रसूखदारों के खिलाफ धोखाधड़ी, पद के दुरुपयोग और आपराधिक साजिश की एफआईआर दर्ज हो चुकी है। राजगढ़ के वरिष्ठ अधिवक्ता कैलाश चंद्र भारद्वाज द्वारा उजागर यह मामला किसानों को डराकर उनकी पुश्तैनी जमीन छीनने और उसे दिल्ली-हरियाणा के उद्योगपतियों को परोसने का खेल है।
3 दिन में सुरक्षा गार्ड से करोड़पति कारोबारी तक पहुंची जमीन
26 नवंबर 2025: तहसीलदार द्वारा खसरा नंबर 1739, 1745, 1771 और 1772 का एक पुराना आवंटन अचानक निरस्त कर दिया जाता है। जमीन सरकारी खाते में आते ही सिंडिकेट सक्रिय होता है।
01 दिसंबर 2025 (मात्र 5 दिन बाद): इस बेशकीमती जमीन की रजिस्ट्री आनन-फानन में एक मामूली सुरक्षा गार्ड (Security Guard) के नाम कर दी जाती है।
04 दिसंबर 2025 (मात्र 3 दिन बाद): वह सुरक्षा गार्ड इस जमीन को हरियाणा के एक बड़े रसूखदार कारोबारी गौरव को करोड़ों रुपये में बेच देता है।
सवाल यह है कि जिस गरीब सुरक्षा गार्ड के पास दो वक्त की रोटी का जुगाड़ बमुश्किल होता है, उसने करोड़ों की जमीन कैसे खरीदी? और महज तीन दिन में हरियाणा के बड़े कारोबारी से उसका संपर्क किसने कराया?
साफ है कि सुरक्षा गार्ड महज एक मुखौटा था, जिसके पीछे असली चेहरा खुद तंत्र के रखवालों का था। ऐसे सैकड़ों मामले इस इलाके की फाइलों में दफन हैं।
कानून की धज्जियां उड़ाकर जेसीबी से दिलाया कब्जा
राजस्व रिकॉर्ड के अनुसार टहला तहसीलदार और पटवारी लोसल ने 10 जनवरी 2025 को खुद एक लिखित रिपोर्ट एसडीएम कोर्ट में पेश की थी। इसमें स्पष्ट था कि विवादित भूमि पर संबंधित खातेदार का कोई कब्जा नहीं है।
नियमानुसार जब कब्जा ही नहीं था, तो प्रार्थी को धारा 183 के तहत बेदखली का दावा करना चाहिए था। सारे कायदे दरकिनार कर 9 फरवरी 2026 को एसडीएम कोर्ट राजगढ़ (सीमा मीना) और तहसीलदार टहला द्वारा पत्थरगढ़ी का मामला दर्ज कराया गया।
महज एक हफ्ते के भीतर (16 फरवरी 2026 को) एसडीएम ने इसके आदेश भी जारी कर दिए। न तो आसपास के खातेदारों को नोटिस देकर पार्टी बनाया गया और न ही मौके की हकीकत देखी गई।
हद तो तब हो गई जब 15 मई 2026 को तहसीलदार प्रवीण दहिया खुद अमले-जमले, ट्रैक्टर और जेसीबी लेकर मौके पर पहुंच गए। पत्थरगढ़ी के नियमों में कहीं भी जेसीबी से तोड़फोड़ का प्रावधान नहीं है, लेकिन वहां गेट तोड़े गए और जबरन कब्जा दिलाया गया।
शिकायतकर्ता का आरोप है कि इसके बाद तहसीलदार ने पीड़ित पक्ष को सीधे शब्दों में धमकी दी कि शिकायतें वापस ले लो और मेरे पास आ जाओ, तुम्हें कुछ सेटलमेंट करवा दूंगा। इस जमीन का
सौदा 38 लाख रुपये प्रति बीघा में हो चुका है।
सीटीएच नियमों को ठेंगा, अफसरों ने बनाए रिसॉर्ट
अधिवक्ता कैलाश भारद्वाज का सीधा आरोप है कि इस खेल में केवल राजस्व विभाग ही नहीं, बल्कि सरिस्का के कई बड़े व रसूखदार अधिकारी भी शामिल हैं। सरिस्का में जितने भी बड़े पदों पर अधिकारी तैनात होकर आए, उनमें से कई ने अपने रसूख का इस्तेमाल कर अपने परिवार जनों, रिश्तेदारों और बेनामी नामों से यहां जमीनें खरीदीं।
आज इस प्रतिबंधित क्षेत्र में जो चमचमाती फाइव स्टार होटलें, लग्जरी रिसॉर्ट और बड़े-बड़े फार्म हाउस दिख रहे हैं, उनके पीछे अधिकारियों की मिलीभगत से एक गठजोड़ काम कर रहा है।
पहले भी हुआ था 2500 बीघा का महा-घोटाला
वर्ष अभियान / घटना घोटाले का स्वरूप प्रशासनिक कार्रवाई
मामला खुलने पर तत्कालीन जिला कलेक्टर ने 470 बीघा का आवंटन और 35 खातेदारियां रद्द कीं। 25 अधिकारियों-कर्मचारियों को चार्जशीट दी गई।
2025-26 वर्तमान सिंडिकेट किसानों को डराना, सुरक्षा गार्ड्स के नाम पर फर्जी रजिस्ट्रियां करना और जेसीबी से जबरन कब्जे दिलवाना।
अदालत के आदेश पर तहसीलदार, कानूनगो और पटवारी पर FIR दर्ज, लेकिन ठोस विभागीय कार्रवाई का अब भी इंतजार।
अदालत ने माना दोषी
जब अदालत की जांच में यह साबित हो चुका है कि अफसर कमर्शियल एजेंट की तरह काम कर रहे थे, तो फिर अब तक सरकार या जिला प्रशासन ने इन्हें सस्पेंड क्यों नहीं किया?
स्थानीय ग्रामीणों का आरोप है कि इन अधिकारियों को जयपुर में बैठे कुछ नेताओं का राजनीतिक संरक्षण प्राप्त है। जब तक यह सियासी कवच नहीं टूटेगा, तब तक पुलिसिया कार्रवाई महज कागजी खानापूर्ति बनकर रह जाएगी।
आसमान छूती जमीनों की कीमतें
जमीन की इसी बेलगाम कीमत ने स्थानीय भू-माफियाओं और भ्रष्ट तंत्र की भूख को सातवें आसमान पर पहुंचा दिया है। सीधे-साधे स्थानीय किसानों को मुकदमों का डर दिखाया जाता है, पुलिस और लाठी का खौफ दिया जाता है, और फिर औने-पौने दामों में उनकी जमीनें लिखवा ली जाती हैं।
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