पहले धर्म परिवर्तन कराया, फिर सीलिंग से बचाया, अब कर दिया एससी की जमीन का सौदा
सरकारी अफसरों की मिलीभगत किस सीमा तक हो सकती है, इसका एक बड़ा उदाहरण जयपुर में आया है। इस मामले में एक अनुसूचित जाति के व्यक्ति का धर्म परिवर्तन करवाकर जमीन खरीद ली गई। जमीन को एक ट्रस्ट में दे दिया।
रेवेन्यू बोर्ड ने इस जमीन को सीलिंग होने से इस शर्त पर बचाया कि जमीन का उपयोग चैरिटेबल कार्यों के लिए होगा। यदि ट्रस्ट या ट्रस्टी इसके इतर जमीन का उपयोग करें तो सरकार कानूनी कार्रवाई को स्वतंत्र होगी। इसके बावजूद सरकार सोती रही और ट्रस्ट से जमीन को मोटे दामों में बेच दिया गया है।
आइए समझते हैं पूरे खेल को
राजधानी जयपुर में सांगानेर तहसील के दुर्गापुरा गांव में खसरा नंबर 286, 281/308 और 285/309 की 9,358 वर्ग मीटर जमीन है।
राजस्व रिकॉर्ड के अनुसार यह जमीन मूल रूप से अनुसूचित जाति के खातेदार नंगा बलाई के नाम पर दर्ज थी। नंगा की मृत्यु के बाद यह जमीन उसके बेटों के नाम हस्तांतरित हुई। अंततः 28 अगस्त 1967 को केवल पूरन बलाई (पुत्र नंगा) के नाम पर दर्ज हुआ।
राजस्थान काश्तकारी अधिनियम-1955 की धारा 42(बी) के तहत एससी व एसटी की कृषि भूमि सवर्ण जातियों के व्यक्तियों को नहीं बेची जा सकती और न ही उनके नाम से दर्ज हो सकती है।
इससे बचने के लिए नया खेल रचा गया। काश्तकार पूरण बलाई का धर्म परिवर्तन करवाकर उसे ईसाई बनाने का दावा किया गया। सबूत के तौर पर पूरण का ईसाई बनने का प्रमाण पत्र जोधपुर के एक चर्च से बनवाया गया।
इसके बाद एक सितंबर, 1967 को म्यूटेशन मंजूर करते हुए काश्तकार का नाम पूरन बलाई पुत्र नंगा से बदलकर पूरन सिमेन पुत्र नंगा राम जाति ईसाई (क्रिश्चियन) कर दिया गया।
इस बदलाव के ठीक दो दिन बाद जमीन सवर्ण समुदाय की महिला कमला देवी अग्रवाल को ट्रांसफर कर दी गई। राजस्व विशेषज्ञों का कहना है कि कानूनी रुप से धर्म बदलने से अनुसूचित जाति या जनजाति नहीं बदलती है। इसलिए ईसाई बनने के बाद पूरण की कृषि भूमि कमला अग्रवाल के नाम ट्रांसफर करना गैर-कानूनी है।
चैरिटेबल ट्रस्ट तक कैसे पहुंची जमीन?
बाद में यह जमीन कमला देवी अग्रवाल से होते हुए कई अन्य खरीदारों प्रेमलता, विजय कुमार और कुमारी मन्नू के पास पहुंची। इन लोगों ने आगे चलकर 8 मई 1975 को एक रजिस्टर्ड डीड (दानपत्र) के जरिए यह जमीन राज वेलफेयर ट्रस्ट को दान कर दी।
इस ट्रस्ट की स्थापना 29 मार्च 1973 को चेयरमैन मानक राज, रामचंद्र सक्सेना और प्रेमलता जैन ने की थी। इसका उद्देश्य गरीब छात्रों को ट्यूशन फीस, किताबें देना और अस्पतालों व जरूरतमंदों को चिकित्सा सहायता प्रदान करना बताया था।
सीलिंग एक्ट को लेकर कानूनी लड़ाई...
29 जून, 1982 को सक्षम अधिकारी-द्वितीय ने एक आदेश जारी कर इस जमीन में से 5,183.68 वर्ग मीटर हिस्से को सरकारी अधिग्रहण के योग्य घोषित कर दिया।
राज्य सरकार का कहना था कि जमीन पर एक नर्सरी, लाइब्रेरी रूम और कुआं बना हुआ था। ट्रस्ट यह साबित नहीं कर पाया कि इस जमीन से होने वाली आय पूरी तरह से धर्मार्थ कार्यों के लिए इस्तेमाल हो रही है।
दूसरी ओर, ट्रस्ट का कहना था कि एक रजिस्टर्ड पब्लिक चैरिटी होने के नाते ULCAR अधिनियम की धारा 19(iv) के तहत जमीन को सीलिंग अधिग्रहण से छूट प्राप्त है।
राजस्व मंडल ने किया खेल का खुलासा
ट्रस्ट ने 29 जून, 1982 को सक्षम अधिकारी-द्वितीय (Jaipur Urban Agglomeration) के आदेश को राजस्व मंडल में चुनौती दी।
राजस्व मंडल ने राज वेलफेयर ट्रस्ट की दायर अपील को स्वीकार कर लिया। उसने शहरी भूमि (सीलिंग और विनियमन) अधिनियम, 1976 (ULCAR Act) के तहत चल रही सभी कार्यवाहियों को खत्म कर दिया। उसने माना कि यह जमीन धर्मार्थ (charitable) उद्देश्यों के लिए उपयोग की जा रही है, इसलिए इसे छूट प्राप्त है।
इसके साथ ही मंडल ने राजस्थान काश्तकारी अधिनियम (Rajasthan Tenancy Act) से बचने के लिए किए गए एक पेचीदा खेल का भी खुलासा किया। इस खेल में जमीन को गैर-एसटी-एससी व्यक्ति को ट्रांसफर करने के लिए बीच में मूल काश्तकार का धर्म परिवर्तन करा दिया था।
फैसले में इस बात पर गंभीर टिप्पणी की गई कि कैसे मूल रूप से अनुसूचित जाति के खातेदार की जमीन एक गैर-एससी खरीदार के पास चली गई।
राजस्व मंडल ने माना कि ईसाई धर्म में यह अंतरिम परिवर्तन कमला के पक्ष में किए गए ट्रांसफर को राजस्थान काश्तकारी अधिनियम-1955 की धारा 42(बी) के उल्लंघन से बचाने के लिए किया था।
उल्लेखनीय है कि धारा 42(बी) के तहत अनुसूचित जाति (SC) के व्यक्ति की जमीन गैर-एससी व्यक्ति को ट्रांसफर करने पर पाबंदी है।
मंडल ने फैसले में लिखा है कि जमीन का ट्रस्ट को दान और सीलिंग की कार्यवाही लगभग आस-पास के वर्षों में ही हुई थी। इसलिए तुरंत बहुत पुराने उपयोग के इतिहास की मांग नहीं की जा सकती।
धमार्थ काम होने तक ही मिलेगी छूट
राजस्व मंडल ने फैसले में स्पष्ट लिखा है कि शहरी भूमि (सीलिंग और विनियमन) अधिनियम, 1976 (ULCAR Act) की धारा 19(iv) के तहत यह छूट तब तक रहेगी, जब तक कि जमीन का उपयोग ट्रस्ट द्वारा धर्मार्थ उद्देश्यों के लिए किया जाता रहेगा।
राजस्व मंडल ने राज्य सरकार को इस संपत्ति पर नजर रखने के निर्देश दिए। साथ ही कहा था कि यदि भविष्य में राज्य सरकार को यह पता चलता है कि यह दान सिर्फ एक फर्जी या दिखावटी लेनदेन था तो सरकार नए सिरे से कार्यवाही शुरू करने के लिए स्वतंत्र होगी।
इसके बाद भी नहीं जागी सरकार
सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि राजस्व मंडलने माना कि भले ही रिकॉर्ड पर 1967 का वह संदिग्ध म्यूटेशन (बलाई से ईसाई बनना) दिखाई दे रहा है। लेकिन ULCAR एक्ट के तहत सीलिंग के इस मामले में यह तय करने का सही कानूनी मंच नहीं है।
जेडीए ने इस जमीन का भू-रुपांतरण का नोटिस जारी कर आमजन से आपत्ति मांगी। इस पर सामाजिक कार्यकर्ता विनीत सांखला ने आपत्ति तो दर्ज करवाई। साथ में भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो में भी शिकायत दी है।
सांखला का कहना है कि जमीन मूलत: एससी की थी। उसका फर्जी धर्म परिवर्तन करवाया था। धर्म बदलने के बाद भी एससी का दर्जा खत्म नहीं होता। इसलिए उक्त जमीन का बेचान व ट्रांसफर सिरे से ही गैर-कानूनी है।
यह राजस्व मंडल राजस्थान के आदेश से स्पष्ट है। राजस्व मंडल के निर्देश के बावजूद सरकार जमीन वापस लेने के स्थान पर चुप बैठी है।
राज वैलफेयर ट्रस्ट के कर्ताधर्ता देवस्थान विभाग की अनुमति के बिना ही सरकार की मिलीभगत से जमीन को बेच रहे हैं। सांखला की शिकायत पर एसीबी ने राजस्व विभाग से मामले की जानकारी मांगी है।
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