सिनेमा के लिए मिला भूखंड, जेडीए ने रद्ध किया आवंटन, 30 साल बाद आया कोर्ट में
Mukesh Sharma | Jul 20, 2026, 20:05 IST
30 साल पहले JDA ने रद्द किया सिनेमा भूखंड, कोर्ट ने फैसले को सही माना
जयपुर की एक अदालत ने जेडीए द्वारा सिनेमा भूखंड आवंटन निरस्त करने के खिलाफ 30 साल बाद दायर याचिका खारिज कर दी। कोर्ट ने कहा कि देर से पता चलने का आधार कानूनी रूप से सही नहीं माना जा सकता है।
समझें क्या है पूरा मामला
- कोर्ट ने 30 साल पहले जेडीए की नीलामी व भूखंड आवंटन रद्ध करने का फैसला सही माना।
- जेडीए ने तय समय पर निर्माण न करने पर 1988 में निरस्त किया था सिनेमा भूखंड का आवंटन।
- जयपुर की कोर्ट ने कहा, 30 साल बाद देर से पता चलने का आधार कानूनी रूप से सही नहीं।
- निरस्तीकरण के खिलाफ चुनौती केवल जानकारी मिलने के 3 साल के भीतर ही दी जा सकती है।
- कोर्ट ने स्पष्ट किया कि JDA के मामलों की सुनवाई केवल JDA ट्रिब्यूनल ही कर सकता है।
जयपुर की एडीजे क्रम-04 नीतू भारद्वाज ने कहा है कि इतने दशकों बाद पुराने फैसलों को दूरी से सूचना मिलने के आधार पर चुनौती नहीं दी जा सकती। कोर्ट ने याचिका को समय सीमा और क्षेत्राधिकार से बाहर मानते हुए खारिज कर दिया है।
क्या है 30 साल पुराना मामला?
1988 में रद्द: बकाया शहरी जमाबंदी व किराया जमा नहीं कराने और निर्धारित दो साल में निर्माण नहीं करने पर जेडीए ने 30 अगस्त 1988 को नीलामी व आवंटन निरस्त कर दिया। साथ ही जमा राशि जब्त कर ली गई।
30 साल बाद चुनौती: मूल आवंटी की मृत्यु के बाद उनके वारिस अहमदाबाद निवासी पत्नी तारा बैन व पुत्रों ने सिविल कोर्ट में शरण ली। इसमें 1988 के निरस्तीकरण आदेश और 1987 के मांग पत्र को चुनौती दी गई। साथ ही भूखण्ड का कब्जा दिलाने और जेडीए द्वारा पुनः नीलामी की कार्यवाही रोकने की मांग की।
2017 में हुई जानकारी
सुनवाई के बाद कोर्ट ने कहा है कि आवंटी के पिता ने 1988 में ही एक मुकदमा किया था। इसमें जेडीए की कार्यवाही का जिक्र था। ऐसे में यह कहना कि 30 साल बाद वर्ष 2017 में उन्हें जानकारी मिली सही नहीं है।
कानूनन किसी आदेश के निरस्तीकरण का दावा जानकारी मिलने की तिथि से 3 वर्ष के भीतर ही लाया जा सकता है। मुकदमा करने से पहले जेडीए केा नोटिस नहीं दिया, जबकि पहले नोटिस देना अनिवार्य है।
जेडीए के आदेश व नोटिस के खिलाफ सिर्फ जेडीए ट्रिब्यूनल ही सुनवाई कर सकता है। सिविल कोर्ट को जेडीए मामले सुनने का अधिकार नहीं है।
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