चंबल का बजरी माफिया सुप्रीम कोर्ट के राडार पर, बेबस सरकार और प्रशासनिक मिलीभगत का पूरा सच

Mukesh Sharma | Jun 03, 2026, 12:59 IST
Photograph: (the sootr)
अवैध बजरी खनन पर सुप्रीम कोर्ट ने सख्त रुख किया है। उच्च न्यायलय ने राजस्थान सरकार से पूछा है कि आखिर सरकार चंबल को क्यों नहीं बचा पा रही है।

News In Short

  • सुप्रीम कोर्ट ने चंबल अभयारण्य में अवैध बजरी खनन पर अपनाया सख्त रुख।
  • अदालत ने राजस्थान सरकार को खनन रोकने में विफल रहने पर लगाई फटकार।
  • कोर्ट ने खनन माफिया को "आधुनिक डकैत" बताते हुए कानून व्यवस्था पर चिंता जताई।
  • चंबल अभयारण्य के 732 हेक्टेयर क्षेत्र को डी-नोटीफाई करने के फैसले पर भी उठाए सवाल।
  • सुप्रीम कोर्ट ने राज्यों को अवैध बजरी खनन के खिलाफ सख्त और लगातार कार्रवाई के दिए निर्देश।

News In Detail

राजस्थान में अवैध बजरी खनन की समस्या नई नहीं है। किसी भी पार्टी की सरकार हो,कोई मुख्यमंत्री हो बजरी माफिया पर किसी का कोई नियंत्रण नहीं है। अदालतों के दखल के बावजूद सरकार अवैध खनन रोकने में पूरी तरह विफल हो रही हैं।



हाल ही में राष्ट्रीय चंबल घड़ियाल अभयारण्य में बड़े पैमाने अवैध बजरी खनन को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने कड़ा रुख अपनाया है। कोर्ट ने मामले का स्वतः संज्ञान लेकर राजस्थान, मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश की सरकारों को आड़े हाथों लिया है। इसमें भी सबसे कड़ी फटकार राजस्थान सरकार को लगाई है।



आइये समझते हैं कि आखिर पिछले एक दशक से ज्यादा समय से बजरी खनन को लेकर इतना हल्ला क्यों है और अवैध बजरी खनन के कारण क्या हैं। सुप्रीम कोर्ट की नाराजगी के कारण क्या हैं ? वह राजस्थान के उपायों से वह संतुष्ट क्यों नहीं है और चंबल में खनन माफिया का यह जाल कितना पुराना है।



बजरी खनन का इतिहास

वर्ष 2012 से पहले राजस्थान में बजरी खनन की प्रक्रिया बहुत ही अनौपचारिक और स्थानीय स्तर पर होती थी। राजस्थान अप्रधान खनिज रियायत नियम, 1986 के तहत सरकार खुली छूट के साथ लघु अवधि के परमिट (STP) जारी होते थे। रास्तों पर रॉयल्टी नाके (चेक पोस्ट) थे। जहां कोई भी ट्रैक्टर या ट्रक निर्धारित टैक्स चुकाकर आसानी से बजरी ले जा सकता था।



तब 5 हेक्टेयर से छोटे खनन क्षेत्रों के लिए किसी भी तरह की पर्यावरण मंजूरी की आवश्यकता नहीं होती थी। इस कारण राज्य की बनास, लूणी और चंबल जैसी प्रमुख नदियों का बिना किसी वैज्ञानिक आकलन के अंधाधुंध दोहन किया गया।



इस अनियंत्रित व्यवस्था को रोकने के लिए सुप्रीम कोर्ट ने 27 फरवरी 2012 को दीपक कुमार बनाम हरियाणा राज्य मामले में एक फैसला दिया। इस फैसले के बाद से पहली बार बजरी खनन की पुरानी परमिट व्यवस्था को खत्म कर पारदर्शी ई-नीलामी की शुरुआत हुई। कोर्ट ने आदेश दिया कि खदान चाहे कितनी भी छोटी (5 हेक्टेयर से कम) क्यों न हो, बिना पर्यावरण प्रभाव आकलन (EIA) और जिला सर्वेक्षण रिपोर्ट (DSR) के उसकी नीलामी या खनन की अनुमति नहीं दी जा सकती। इसी फैसले के बाद ही देश भर में बजरी खनन के लिए नीलामी व्यवस्था लागू हुई।



सुप्रीम कोर्ट क्यों हो रहा नाराज

सुप्रीम कोर्ट की नाराजगी की सबसे बड़ा कारण अवैध बजरी खनन को रोकने में प्रशासनिक उदासीनता और सरकार का ढुलमुल रवैया है। कोर्ट ने कहा है कि पर्यावरण कानून और अदालती आदेशों के बावजूद माफिया बेखौफ होकर नदियों का सीना चीर रहे हैं।



अवैध खनन के किंगपिन पकड़ से बाहर

कोर्ट का कहना है राज्य की पुलिस और प्रशासन केवल बजरी ले जाने वाले ड्राइवर और मजदूरों को पकड़कर औपचारिकता पूरी कर रहे हैं। इस अवैध धंधे के मुख्य फाइनेंसर, ठेकेदार,ऑपरेटर और माफिया किंगपिन तक पुलिस कभी पहुंच ही नहीं पाती है।



प्रशासनिक मिलीभगत का अंदेशा

कोर्ट का कहना है कि जांच का यह लापरवाह पैटर्न प्रशासनिक और प्रवर्तन तंत्र के विभिन्न स्तरों पर माफिया किंगपिन के साथ संभावित मिलीभगत की ओर इशारा करता है।



कानून के शासन का खत्म होना

सुप्रीम कोर्ट ने इस साल चंबल नदी क्षेत्र में दो वन रक्षकों (Forest Guards) की सरेआम हत्या का हवाला दिया है। इनमें से एक रक्षक की हत्या इसी साल जनवरी में राजस्थान के धौलपुर में हुई थी। कोर्ट ने कहा कि यह स्थिति क्षेत्र में कानून के शासन के गंभीर गिरावट का नमूना है।





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बेबसी का रोना नहीं रो सकती सरकार

26 मई के आदेश में सुप्रीम कोर्ट ने राजस्थान सरकार के अवैध खनन को रोकने में सरकारी कार्रवाई को पूरी तरह आकस्मिक,उदासीन और आलसी करार दिया है।



राजस्थान व अन्य राज्य सरकारों ने कोर्ट को बताया था कि उनके वन विभाग के पास खनन माफिया से मुकाबले के लिए पर्याप्त साधन व ह​थियार नहीं है। जबकि माफिया आधुनिक हथियारों व संसाधनों से लैस हैं। हालांकि कोर्ट ने राज्य सरकारों की इस दलील को नहीं माना था और कहा कि राज्य सरकारों को अपने बेबसी का रोना रोने की अनुमति नहीं दी जा सकती। कोर्ट का कहना है कि सरकारें केवल कोर्ट के डंडा चलने पर ही जागती हैं। जबकि पर्यावरण की रक्षा कोर्ट आदेशों के भरोसे नहीं हो सकती। इसके लिए राज्यों को खुद सतत और सक्रिय रुप से काम करना होगा।



राजस्थान सरकार से नाराजगी के कारण

राजस्थान सरकार खनन रोकने के कड़े उपाय करने की बजाय अजीब फैसले ले रही है। दिसंबर 2025 में राजस्थान सरकार ने 23 दिसंबर 2025 को शहरीकरण और खनन गतिविधियों को आसान बनाने के लिए चंबल अभयारण्य के 732 हेक्टेयर क्षेत्र को डी-नोटीफाई (संरक्षित दायरे से बाहर) कर दिया था। 9 मार्च,2026 को अधिसूचना जारी की थी। इस फैसले पर ही सुप्रीम कोर्ट ने स्वतः संज्ञान लिया है।



आधुनिक डकैत हैं खनन माफिया

कोर्ट ने कहा कि राज्य सरकार अपनी मर्जी से ऐसा नहीं कर सकती थी। इसके लिए आवश्यक वैधानिक मंजूरियां और सुप्रीम कोर्ट की पूर्व अनुमति अनिवार्य है सरकार इस संरक्षित भूमि को दायरे से बाहर करके सरकार वन्यजीवों की रक्षा करने के स्थान पर अवैध खनन माफियाओं को बढ़ावा दे रही है।



सुनवाई के दौरान कोर्ट ने कहा कि पुराने दौर के डकैतों की जगह अब इन आधुनिक खनन माफियाओं ने ले ली है। जो इतने बेखौफ हैं कि वे रास्ते में आने वाले पुलिसकर्मियों और प्रशासनिक अधिकारियों तक की हत्या कर देते हैं। 732 हेक्टेयर के संरक्षित क्षेत्र किसी भी प्रकार के शहरीकरण या नए खनन पट्टों को मंजूरी देने पर पूरी तरह से पाबंदी है।



क्या है चंबल का इतिहास?

भौगोलिक और ऐतिहासिक रूप से चंबल का इलाका हमेशा से अलग रहा है। चंबल नदी के आस-पास के विशाल बीहड़ (Ravines) और कटाव वाले रास्ते ऐतिहासिक रूप से बेहद दुर्गम हैं। इस भौगोलिक अलगाव के कारण यहाँ कभी बड़े शहर या तीर्थ स्थल विकसित नहीं हो सके।



बागियों का गढ़

इसी अलगाव का फायदा उठाकर इतिहास में बागियों व बाद के दौर में कुख्यात डकैतों ने इन बीहड़ों को अपनी शरणस्थली बनाया। आज डकैतों का वह दौर भले ही खत्म हो गया हो, लेकिन उनकी जगह आधुनिक हथियारों से लैस बजरी माफिया ने ले ली है। इन्हें ही कोर्ट ने आधुनिक डकैत कहा है।



पारिस्थितिक महत्व

चंबल नदी तीन राज्यों (राजस्थान, मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश) के मिलन बिंदु पर स्थित है। यह रणथंभौर, केलादेवी, कुनो-पालपुर और माधव जैसे एक दर्जन से अधिक राष्ट्रीय उद्यानों के बीच वन्यजीवों के आने-जाने के लिए एक महत्वपूर्ण प्राकृतिक गलियारा है। 1979 में यहाँ राष्ट्रीय चंबल घड़ियाल अभयारण्य बनाया गया था। यह गंभीर रूप से संकटग्रस्त घड़ियाल, गंगा डॉल्फिन और दुर्लभ कछुओं का अंतिम सुरक्षित ठिकाना है।



मिल क्यों नहीं रहा खनन माफिया से छुटकारा

राष्ट्रीय चंबल अभयारण्य में बजरी खनन पर पूर्ण प्रतिबंध है। लेकिन इसके बावजूद यह अवैध धंधा लगातार फल-फूल रहा है। नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (NGT) की स्वीकृत एक रिपोर्ट में साफ कहा है कि यह माफिया अंदरूनी रास्तों का इस्तेमाल करता है। इन्हें राजनीतिक समर्थन है और ये आधुनिक हथियारों से लैस हैं।



मांग और आपूर्ति का भारी अंतर

रियल एस्टेट और निर्माण कार्यों के लिए नदियों की बजरी की मांग बहुत है। इस अत्यधिक मांग के कारण मिलने वाला भारी मुनाफा माफिया को हर जोखिम लेने पर मजबूर करता है।



अंतर-राज्यीय सीमा का फायदा

चंबल नदी राजस्थान, मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश की सीमाओं को छूती है। जब एक राज्य की पुलिस कार्रवाई करती है तो माफिया अवैध बजरी लेकर दूसरे राज्य की सीमा में घुस जाते हैं। तीनों राज्यों के बीच आपसी समन्वय की भारी कमी का फायदा सीधे तौर पर इन माफिया को मिलता है।



FAQ

  1. चंबल अभयारण्य में अवैध बजरी खनन पर सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा है?
    सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि अवैध बजरी खनन रोकने में राज्य सरकारें प्रभावी कार्रवाई नहीं कर रही हैं। अदालत ने प्रशासनिक उदासीनता और खनन माफिया के बढ़ते प्रभाव पर चिंता जताई है।
  2. चंबल अभयारण्य अवैध बजरी खनन के लिए इतना संवेदनशील क्यों है?
    चंबल अभयारण्य घड़ियाल, गंगा डॉल्फिन और अन्य दुर्लभ जीवों का आवास है। यहां खनन से नदी पारिस्थितिकी, वन्यजीव और जैव विविधता पर सीधा असर पड़ता है।
  3. राजस्थान में अवैध बजरी खनन रुक क्यों नहीं रहा?
    विशेषज्ञों के अनुसार बजरी की भारी मांग, माफिया नेटवर्क, अंतरराज्यीय सीमाओं का फायदा और प्रवर्तन एजेंसियों के बीच समन्वय की कमी इसके प्रमुख कारण हैं।

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