क्यों हल्की आंधियां भी दिल्ली-एनसीआर तक ले जा रही हैं राजस्थान की धूल, जानिए पूरा कारण
Jaipur: राजस्थान के चूरू जिले में दो दिन पहले आई भयावह धूल भरी आंधी के वीडियो सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो रहे हैं। आसमान में तैरते रेत के विशाल गुबार को देखकर लोग सहम गए। इस बवंडर ने चूरू के साथ ही हनुमानगढ़, श्रीगंगानगर, बीकानेर, नागौर, डीडवाना-कुचामन, अलवर और सीकर जैसे जिलों को भी अपनी चपेट में ले लिया।
राजस्थान में गर्मियों के समय ऐसी आंधियां आना कोई नई बात नहीं है। जब मध्य पूर्व और थार रेगिस्तान से बेहद गर्म और शुष्क हवाएं चलती हैं तो वे अपने साथ भारी मात्रा में रेत उड़ाकर लाती हैं। लेकिन इस बार वैज्ञानिकों ने एक बेहद चिंताजनक बदलाव की ओर इशारा किया है।
वैज्ञानिकों का कहना है कि जो धूल पहले केवल बड़े तूफानों में ही दिल्ली और उत्तरी मैदानों तक पहुंचती थी, वह अब मामूली हवा चलने पर भी वहां पहुंच रही है। इसके पीछे सबसे बड़ी वजह है- अरावली पर्वतमाला का लगातार कमजोर होना।
अरावली कैसे बचाती है हमें?
अरावली पर्वतमाला थार रेगिस्तान से उड़ कर आने वाली धूल को गंगा बेसिन के मैदानी इलाकों तक आने से रोकता है। यह पर्वतमाला दोनों के बीच एक मजबूत दीवार की तरह खड़ी है।
जब रेगिस्तान से आने वाली धूल भरी हवाएं अरावली की पहाड़ियों से टकराती हैं तो उनकी गति धीमी हो जाती हैं। गति धीमी होने से हवाएं अपने साथ लाई गई रेत को पहाड़ियों के ढलानों पर ही छोड़ देती हैं।
पर्यावरण शोधकर्ता और सेंटर फॉर इकोलॉजी डेवलपमेंट एंड रिसर्च (सीईडीएआर) के सीनियर फेलो चेतन अग्रवाल कहते हैं कि इन पहाड़ियों के पश्चिमी ढलानों पर रेत के बड़े-बड़े टीले बन जाते हैं। इन्हें अवरोधक टीले (Obstacle Dunes) कहा जाता है। इन टीलों पर उगने वाली खास वनस्पति रेगिस्तानी पौधों जैसी होती है।
अगर इन पहाड़ियों पर पेड़ों का अच्छा आवरण हो तो हवा छनकर बाहर निकलती है। इससे कुदरती सफाई (Natural Cleaning) होती है और धूल आगे नहीं बढ़ पाती। ये टीले इस बात का सबूत हैं कि अरावली सदियों से उत्तर भारत को रेगिस्तान बनने से बचा रही है।
टूट रही है अरावली की दीवार
दुर्भाग्य से, यह प्राकृतिक सुरक्षा कवच अब खुद बड़े संकट में है। लालच, अवैध खनन और पेड़ों की अंधाधुंध कटाई ने अरावली को खोखला कर दिया है।
भारतीय वन सर्वेक्षण (FSI) के 2018 के चौंकाने वाले आकलन के अनुसार राजस्थान में अरावली की 128 में से 31 पहाड़ियां पूरी तरह गायब हो चुकी हैं।
नारायणा, कलवाड़, कोटपुतली, झालाना और सरिस्का जैसी जगहों पर 200 से 600 मीटर तक की ऊंचाई वाली पहाड़ियों को भारी नुकसान पहुंचा है।
पर्यावरण मंत्रालय के अनुसार इस तबाही के पीछे मुख्य कारण हैं:
- लाल सिलिका, ग्रेनाइट और अन्य सूक्ष्म खनिजों का अनियंत्रित खनन।
- तेजी से होता शहरीकरण और अवैध निर्माण कार्य।
- जंगलों की कटाई और पशुओं द्वारा अत्यधिक चराई।
- जमीन के इस्तेमाल में मनमाना बदलाव और अतिक्रमण।
भारतीय वन्यजीव संस्थान (WII) के 2009 के एक अध्ययन में अरावली की 12 ऐसी दरारों (Gaps) की पहचान की गई थी, जो जंगलों के घटने से बड़े हो गए हैं। अब इन रास्तों से रेगिस्तान की रेत बिना किसी रुकावट के आगे बढ़ रही है।
अब हल्की हवा भी बनी आफत
अरावली की पहाड़ियां नीची और वनस्पति विहीन होने का सीधा असर अब मौसम पर दिखने लगा है। स्काईमेट वेदर सर्विसेज के उपाध्यक्ष महेश पलावत के अनुसार पहले जब राजस्थान में कोई बहुत भीषण आंधी आती थी, तभी धूल दिल्ली की तरफ बढ़ती थी। लेकिन अब स्थिति बदल चुकी है।
आजकल जब भी हवा की गति थोड़ी सी बढ़कर 35 से 40 किलोमीटर प्रति घंटा होती है, तो राजस्थान की धूल उड़कर सीधे दिल्ली समेत उत्तरी मैदानों तक पहुंच जाती है। यह इस बात का साफ संकेत है कि अरावली अब धूल को रोकने में असमर्थ होती जा रही है।
मैदानी इलाकों पर मंडराता खतरा
उत्तरी भारत में अप्रैल से जून के महीनों के दौरान धूल भरी आंधियां आना आम बात है। भीषण गर्मी और सूखा इस स्थिति को और गंभीर बना देते हैं। दक्षिण-पश्चिमी हवाएं इस धूल को पूरे उत्तर भारत में फैला देती हैं।
मौसम विभाग (IMD) के जलवायु खतरा और भेद्यता एटलस (1981-2010 के आंकड़ों पर आधारित) के अनुसार उत्तर-पश्चिमी भारत का एक बड़ा हिस्सा धूल भरी आंधियों के सबसे खतरनाक जोन में आता है। यहां औसतन साल में करीब 1 दिन (0.89 से 1.55 दिन) भीषण आंधी का सामना करना पड़ता है।
दीर्घकालिक आंकड़े बताते हैं कि दिल्ली और उसके आसपास के इलाके पहले से ही हाई-रिस्क जोन में हैं। जून के महीने में दिल्ली-NCR में तूफानी गतिविधियां सबसे ज्यादा होती हैं। यहां रोजाना औसतन 2.5 बार छोटे-बड़े तूफान दर्ज किए जाते हैं, जो इस महीने में पूरे देश में सबसे अधिक है। ऐसे में अरावली का कमजोर होना दिल्ली की हवा को और ज्यादा दमघोंटू बना देगा।
मौसम और तापमान पर असर
हवा में उड़ती यह धूल न सिर्फ सांस की बीमारियां बढ़ा रही है, बल्कि यह हमारे मौसम चक्र को भी प्रभावित कर रही है। लगातार धूल की चादर बने रहने से जमीन तक पहुंचने वाली धूप की मात्रा बदल जाती है।
धूल के कण सूरज की रोशनी को बिखेर देते हैं, जिससे अस्थायी रूप से सतह का तापमान थोड़ा कम तो हो जाता है, लेकिन यह पर्यावरण के संतुलन को बिगाड़ देता है। इससे बारिश के पैटर्न (Monsoon) पर भी बुरा असर पड़ने की आशंका है।
नासा (NASA) के वरिष्ठ वैज्ञानिक हिरेन जेठवा का कहना है कि उत्तरी भारत में अरावली के खत्म होने और धूल के इस फैलाव को पूरी तरह समझने के लिए अभी और गहरे और दीर्घकालिक वैज्ञानिक विश्लेषण की जरूरत है।
FAQ
- क्या अरावली रेगिस्तान की धूल को मैदानी इलाकों में आने से रोकती है?
अरावली पर्वतमाला थार रेगिस्तान से उड़ कर आने वाली धूल को गंगा बेसिन के मैदानी इलाकों तक पहुंचने से रोकता है। यह पर्वतमाला दोनों के बीच एक मजबूत दीवार की तरह है। जब रेगिस्तान से आने वाली धूल भरी हवाएं अरावली की पहाड़ियों से टकराती हैं तो उनकी गति धीमी हो जाती है। - क्या अरावली पर्वतमाला खतरे में है?
अरावली पर्वतमाला अब बड़े संकट में है। इंसानी लालच, अवैध खनन और पेड़ों की अंधाधुंध कटाई ने अरावली को खोखला कर दिया है। भारतीय वन सर्वेक्षण (FSI) के 2018 के चौंकाने वाले आकलन के अनुसार राजस्थान में अरावली की 128 में से 31 पहाड़ियां पूरी तरह गायब हो चुकी हैं। - क्या अब अरावली की पहाड़ियां आंधी को नहीं रोक पा रही हैं?
अरावली की पहाड़ियां नीची और वनस्पति विहीन होने का सीधा असर अब मौसम पर दिखने लगा है। पहले जब राजस्थान में कोई बहुत भीषण आंधी आती थी, तभी धूल दिल्ली की तरफ बढ़ती थी। आजकल जब भी हवा की गति थोड़ी सी बढ़कर 35 से 40 किलोमीटर प्रति घंटा होती है तो रेगिस्तान की धूल उड़कर सीधे उत्तरी मैदानों तक पहुंच जाती है। यह इस बात का साफ संकेत है कि अरावली अब धूल को रोकने में असमर्थ होती जा रही है।
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