मौत, यादें और लाइक्स... डिजिटल दुनिया में बदलता इंसानी दुख
कभी किसी की मौत की खबर घर-घर तक धीरे-धीरे पहुंचती थी। मोहल्ले में फुसफुसाहट होती थी। फोन जाते थे। रिश्तेदार इकट्ठा होते थे और फिर शोक एक निजी भावना की तरह बहता था। अब दौर बदल चुका है। अब किसी बड़े अभिनेता, गायक या नेता की मौत होते ही सोशल मीडिया पर सिर्फ श्रद्धांजलि नहीं उमड़ती, बल्कि एक अजीब-सी डिजिटल उपस्थिति भी दिखाई देने लगती है। जैसे लोग सिर्फ दिवंगत व्यक्ति को याद नहीं कर रहे होते, बल्कि यह भी बता रहे होते हैं कि देखिए, मैं उनसे कितना करीब था।
आशा भोसले के निधन के बाद यही दृश्य फिर सामने आया। इंस्टाग्राम, एक्स और फेसबुक पर श्रद्धांजलियों की बाढ़ आ गई। किसी ने पुरानी तस्वीर पोस्ट की, किसी ने वीडियो, किसी ने निजी बातचीत का किस्सा सुनाया। कई पोस्ट ऐसी थीं जिनमें दिवंगत कलाकार से ज्यादा पोस्ट करने वाला केंद्र में नजर आया। तस्वीरों में गले मिलते चेहरे, मंच साझा करते पल और लंबे कैप्शन। सब मिलकर जैसे एक नया संदेश दे रहे थे...मैं सिर्फ प्रशंसक नहीं था, मैं उनके करीब था।
सोशल मीडिया ने शोक को सार्वजनिक मंच बना दिया है। पहले दुख भीतर महसूस होता था, अब उसे पोस्ट किया जाता है। पोस्ट भी ऐसे कि उसमें भावनाओं के साथ-साथ पहचान की राजनीति भी छिपी होती है। कौन सबसे पहले श्रद्धांजलि देता है। किसके पास सबसे दुर्लभ तस्वीर है। किसने दिवंगत व्यक्ति के साथ सबसे निजी पल साझा किए। यह सब अब डिजिटल प्रतिस्पर्धा का हिस्सा बन गया है।
दुख से ज्यादा कनेक्शन दिखाने की होड़
यह सिर्फ सेलिब्रिटीज तक सीमित नहीं है। आम लोग भी अब किसी के निधन पर सीधे रेस्ट इन पीस लिखने से संतुष्ट नहीं होते। वे पुरानी चैट के स्क्रीनशॉट डालते हैं। फोटो कोलाज बनाते हैं। वीडियो एडिट करते हैं और बताते हैं कि उनका रिश्ता कितना गहरा था। मानो शोक अब भावना कम और सामाजिक प्रमाण ज्यादा बन गया हो।असल में सोशल मीडिया की पूरी संरचना ही ऐसी है। यहां हर भावना को दृश्य बनाना पड़ता है। अगर आप दुखी हैं तो उसे दिखाना होगा। अगर आप किसी के करीब थे तो उसका सबूत देना होगा। और यही कारण है कि अब शोक भी कंटेंट में बदलता जा रहा है। पहले किसी महान कलाकार की मृत्यु पर अखबारों में अगले दिन श्रद्धांजलि छपती थी। अब मिनटों में इंस्टाग्राम स्टोरी तैयार हो जाती है। पहले लोग चुपचाप रोते थे, अब लोग कैप्शन लिखते हैं...दिल टूट गया...विश्वास नहीं हो रहा...आप हमेशा याद आएंगे। दुख निजी कमरे से निकलकर सार्वजनिक टाइमलाइन पर आ गया है।
एल्गोरिदम का शोक
सोशल मीडिया सिर्फ भावनाओं का मंच नहीं है, वह एल्गोरिदम का भी खेल है। जो पोस्ट ज्यादा भावुक होती है, ज्यादा निजी लगती है या जिसमें कोई बड़ी हस्ती नजर आती है, उसे ज्यादा लाइक्स और शेयर मिलते हैं। ऐसे में श्रद्धांजलि भी अनजाने में परफॉर्मेंस बन जाती है।कई बार लोग सचमुच दुखी होते हैं, लेकिन प्लेटफॉर्म उस दुख को भी प्रदर्शन में बदल देता है। किसी की मौत पर पोस्ट डालना अब सिर्फ संवेदना नहीं, बल्कि सामाजिक उपस्थिति दर्ज कराने का तरीका भी बन गया है। यह बताने का माध्यम कि....मैं भी उस कहानी का हिस्सा था। यही वजह है कि कई बार श्रद्धांजलियों में दिवंगत व्यक्ति पीछे छूट जाता है और पोस्ट करने वाला आगे आ जाता है। फोटो में कैमरे की तरफ मुस्कुराता चेहरा, लंबा भावुक कैप्शन और अंत में टूटा हुआ दिल वाला इमोजी। यह आधुनिक डिजिटल शोक का नया व्याकरण है।
शोक अब निजी नहीं रहा
इस बदलाव का एक मनोवैज्ञानिक पक्ष भी है। इंसान स्वभाव से सामाजिक प्राणी है। वह दुख को साझा करके हल्का महसूस करता है। सोशल मीडिया ने उस साझा करने को हजारों लोगों तक पहुंचा दिया। अब लोग अकेले नहीं रोते, वे ऑनलाइन कम्युनिटी के साथ शोक मनाते हैं। इसका दूसरा पहलू भी है। जब दुख सार्वजनिक हो जाता है तो उस पर प्रतिक्रिया की उम्मीद भी जुड़ जाती है। कितने लाइक्स आए? किसने कमेंट किया? किसने श्रद्धांजलि शेयर की? यानी दुख भी अब डिजिटल प्रतिक्रिया पर निर्भर होने लगा है। धीरे-धीरे यह संस्कृति ऐसी बन रही है जिसमें शोक भी दिखाई देने की चीज हो गया है। अगर आपने पोस्ट नहीं किया तो मानो आपने दुख व्यक्त ही नहीं किया। यही सोशल मीडिया की सबसे बड़ी विडंबना है। यह भावनाओं को अभिव्यक्ति देता है, लेकिन उसी अभिव्यक्ति को प्रदर्शन में भी बदल देता है।
मौत, यादें और डिजिटल विरासत
आज किसी व्यक्ति की मृत्यु सिर्फ वास्तविक दुनिया में नहीं होती, उसकी डिजिटल दुनिया (Digital World) भी पीछे छूट जाती है। इंस्टाग्राम प्रोफाइल, पुरानी पोस्ट, वीडियो, इंटरव्यू, ट्वीट सब एक डिजिटल स्मारक की तरह जीवित रहते हैं। लोग वहां जाकर कमेंट करते हैं, पुरानी तस्वीरें साझा करते हैं और मृत व्यक्ति को मानो ऑनलाइन जिंदा बनाए रखते हैं। यही कारण है कि अब शोक का स्वरूप पूरी तरह बदल चुका है। यह सिर्फ आंसुओं का मामला नहीं रहा। यह यादों, दृश्यता, पहचान और सोशल मीडिया संस्कृति का मिश्रण बन गया है। शायद आने वाले समय में यह और बढ़ेगा। क्योंकि सोशल मीडिया की दुनिया में हर भावना को जगह चाहिए। यहां तक कि दुख को भी।
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