शिक्षा सर्वे का बड़ा खुलासा: अमीर हों या गरीब, बेटियों के साथ भेदभाव एक जैसा
Kaushiki | Aug 25, 2026, 16:50 IST
Gender gap in education
नए सरकारी सर्वे में खुलासा हुआ है कि प्राइवेट स्कूल और ट्यूशन में बेटा बेटी का फासला अमीर हो या गरीब हर जगह लगभग बराबर रहता है। जाति और पैसे से यह गैप नहीं बदलता।
समझें क्या है मामला
एक अमीर परिवार की बेटी।
Gender gap in education: दोनों के साथ स्कूल के दरवाजे पर लगभग एक जैसा बर्ताव होता है। यह किसी अनुमान की बात नहीं है। यह ताजा सरकारी आंकड़ों में दर्ज है।
देश के नए शिक्षा सर्वे में जाति, आय और लिंग तीनों आधार पर भेदभाव की जांच हुई। जाति और आय का असर पैसे से घटता पाया गया। लेकिन बेटा बेटी का फासला हर आय वर्ग में लगभग बराबर निकला।
सबसे अमीर 20% परिवारों में भी बेटियां बेटों से करीब दो में पीछे रहीं। सबसे गरीब 20% परिवारों में भी यही फासला मिला। यह पैटर्न स्कूल की हर स्टेज पर एक जैसा बना रहा।
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यह आपसे क्यों जुड़ा है
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पहले क्या था
पुराने सर्वे भी बेटा बेटी के बीच खर्च का अंतर दिखाते रहे हैं, लेकिन इस बार सर्वे ने जाति, आय और लिंग को अलग अलग करके देखा है। यही इस अध्ययन को खास बनाता है।
लड़कियों को अभी भी शिक्षा तक समान पहुंच क्यों नहीं है?
क्या हुआ और क्यों
लेकिन जब समान खर्च वाले परिवारों की तुलना एक ही राज्य में की गई, तो दलित बच्चे फिर भी 15 में और आदिवासी बच्चे 13 में पीछे मिले। दो परिवार, एक जैसा खर्च, एक जैसा राज्य, फिर भी एक बच्चे को प्राइवेट स्कूल का दरवाजा आसानी से नहीं मिलता।
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अलग तरीके से चलता है कोचिंग का बाजार
लेकिन सवाल यह है, बेटा बेटी का फासला किस चीज से चलता है? जवाब चौंकाने वाला है। राष्ट्रीय स्तर पर हर सौ लड़कों में से करीब 28 प्राइवेट कोचिंग लेते हैं, लड़कियों में यह आंकड़ा 26 है।
प्राइवेट स्कूल में भी 35 लड़कों के मुकाबले 30 लड़कियां मिलती हैं। यह फासला सबसे अमीर और सबसे गरीब परिवारों में करीब करीब बराबर रहता है। दलित हो, आदिवासी हो या सामान्य वर्ग, फासला हर जगह करीब एक से दो के बीच अटका रहता है।
यही वो जगह है जहां चीजें इंटरेस्टिंग होती हैं। इसे एक उदाहरण से समझें। मान लीजिए एक परिवार के पास हर महीने तीन हजार रुपए ट्यूशन पर खर्च करने की क्षमता है।
ऐसे परिवार में भी बेटे को कोचिंग भेजने की संभावना बेटी से थोड़ी ज्यादा ही रहती है, भले ही पैसे की कोई कमी न हो। ये फैसला बजट का नहीं, प्राथमिकता का है।
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कौन कौन इसमें शामिल है
तीसरा, सरकार और नीति निर्माता, जो फीस माफी जैसी योजनाओं से जाति का गैप कम करने की कोशिश करते हैं, लेकिन लिंग के गैप पर उनकी योजनाएं सीधे असर नहीं डालतीं।
About 79% of the funds of 'Beti Bachao, Beti Padhao' were spent only on advertisements, the girls were saved but education was stopped.
दोनों पक्षों की बात
दूसरा तर्क यह है कि आर्थिक हालात अब पहले जैसे नहीं रहे, महिलाएं भी बड़ी संख्या में कमाई कर रही हैं, इसलिए यह प्राथमिकता अब तर्कसंगत नहीं मानी जा सकती। सर्वे खुद किसी एक पक्ष का समर्थन नहीं करता, वह सिर्फ आंकड़े दिखाता है।
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मध्य प्रदेश, राजस्थान, छत्तीसगढ़ कनेक्शन
दिलचस्प बात यह है कि छत्तीसगढ़ उन गिने चुने राज्यों में है जहां परिवार बेटियों की शिक्षा पर बेटों से ज्यादा खर्च करते पाए गए हैं, केरल और अरुणाचल प्रदेश के साथ।
आगे क्या होगा
Out of 5726 Kasturba Gandhi Balika Vidyalaya approved in the country, 849 schools are not operational yet । देश में स्वीकृत 5726 कस्तूरबा गांधी बालिका विद्यालयों में 849 विद्यालय अभी तक ...
एक बात जो आप नहीं जानते थे
अब आप क्या करें
- अब आप क्या करें: अपने आसपास के स्कूल दाखिले के आंकड़ों पर ध्यान दें और बेटा बेटी के अनुपात पर सवाल पूछें
- क्यों अभी: सरकार अगली शिक्षा नीति समीक्षा में इसी सर्वे के आंकड़े इस्तेमाल कर सकती है
- आगे देखें: शिक्षा मंत्रालय की अगली रिपोर्ट, जिसमें राज्यवार पूरा ब्यौरा आ सकता है
यह खबर क्यों जरूरी है
Source:
- The Hindu: India's gender gap in private education defies caste and class
- Comprehensive Modular Survey: Education (CMS:E) 2025, NSS 80th Round, MoSPI
- Careers360, CMS Education Survey 2025
FAQ
- क्या अमीर परिवारों में बेटा बेटी का भेदभाव कम होता है?
नहीं। सर्वे के मुताबिक सबसे अमीर 20% परिवारों में भी बेटियां प्राइवेट कोचिंग और स्कूल में बेटों से लगभग उतनी ही पीछे हैं जितनी सबसे गरीब परिवारों में। - क्या जाति का असर पैसे से कम हो जाता है?
काफी हद तक हां, खासकर ओबीसी वर्ग में। लेकिन दलित और आदिवासी बच्चों के लिए फासला पैसा बराबर करने के बाद भी बना रहता है। - छत्तीसगढ़ में क्या अलग पैटर्न है?
छत्तीसगढ़ उन कुछ राज्यों में है जहां परिवार बेटियों की शिक्षा पर बेटों से ज्यादा खर्च करते पाए गए हैं, हालांकि वहां प्राइवेट कोचिंग का इस्तेमाल देश में सबसे कम माना जाता है।
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