आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस ...भारत सिर्फ यूजर रहेगा या दुनिया का निर्माता बनेगा
भारत में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस यानी एआई को लेकर जो चर्चा कुछ साल पहले तक केवल टेक कंपनियों और इंजीनियरों तक सीमित थी, अब वह देश की अर्थव्यवस्था, नौकरियों, राजनीति, शिक्षा और राष्ट्रीय सुरक्षा तक पहुंच चुकी है। हर तरफ एआई की बातें हैं। चैट जीपीटी, जेमिनी, डीपसिक, कोपाइलट, एआई वीडियो, एआई कॉल सेंटर, एआई एजेंट, एआई डॉक्टर, एआई टीचर यानी सब उपलब्ध है। इसी शोर के बीच एक बड़ी और असहज सच्चाई सामने आई है। आईबीएम और भारत सरकार के इंडियन एआई मिशन की संयुक्त रिपोर्ट कहती है कि भारत एआई की दौड़ में बहुत तेज़ी से भाग तो रहा है, लेकिन अभी भी ज़्यादातर भारतीय कंपनियां बड़े स्तर पर एआई का उपयोग कैसे किया जा सकता है वहां तक नहीं पहुंच पाई हैं। यानी एआई का इस्तेमाल अभी प्रयोग और पायलट प्रोजेक्ट तक ही सीमित है। असली चुनौती है इसे बड़े स्तर पर लागू करना।
रिपोर्ट का सबसे बड़ा दावा यह है कि अगर भारत एआई को सही तरीके से अपनाता है, तो 2030 तक यह भारतीय अर्थव्यवस्था में 500 बिलियन डॉलर से अधिक का योगदान दे सकता है। यह रकम कई देशों की पूरी जीडीपी से भी ज्यादा है। वहीं इसी रिपोर्ट में चेतावनी भी छिपी हैभा रत अभी एआई का उपभोक्ता ज्यादा है, निर्माता कम। यानी सवाल सिर्फ इतना नहीं है कि भारत एआई का इस्तेमाल करेगा या नहीं। असली सवाल यह है कि भारत एआई का मालिक बनेगा या सिर्फ विदेशी एआई टूल्स का ग्राहक बनकर रह जाएगा।
एआई का सपना और हकीकत
रिपोर्ट के मुताबिक भारत में केवल 15 फीसदी संस्थान ही एआई को बड़े स्तर पर लागू कर पाई हैं। बाकी 85 फीसदी कंपनियां अभी भी पायलट प्रोजेक्ट्स, टेस्टिंग और छोटे प्रयोगों में फंसी हुई हैं। यह आंकड़ा बहुत कुछ कहता है। पिछले दो वर्षों में भारत में एआई को लेकर जिस तरह का उत्साह देखा गया, उससे लगता था कि लगभग हर बड़ी कंपनी एआई आधारित बन चुकी होगी। बैंकिंग से लेकर ई-कॉमर्स, अस्पतालों से लेकर सरकारी दफ्तरों तक हर जगह एआई का नाम लिया जा रहा है, लेकिन हकीकत यह है कि ज्यादातर जगह एआई केवल प्रेजेंटेशन और कॉन्फ्रेंस तक ही सीमित है। कई कंपनियां एआई का इस्तेमाल केवल चैटबॉट लगाने या डेटा एनालिटिक्स तक कर रही हैं। जब बात पूरे बिजनेस मॉडल को एआई आधारित बनाने की आती है, तब असली कठिनाइयां सामने आने लगती हैं। रिपोर्ट कहती है कि केवल 27 फीसदी भारतीय अधिकारियों को भरोसा है कि उनके पास एआई लागू करने के लिए पर्याप्त और सुरक्षित आधारभूत ढांचा मौजूद है। इसका मतलब यह हुआ कि तीन-चौथाई से ज्यादा कंपनियों को खुद अपनी तैयारी पर भरोसा नहीं है।
सबसे बड़ी समस्या प्रोडक्शन कम
रिपोर्ट का शायद सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा वह है जहां भारतीय एआई स्टार्टअप्स की वास्तविक स्थिति सामने आती है। भारत में 83 फीसदी एआई स्टार्टअप्स मौजूदा एआई मॉडल्स का इस्तेमाल करके स्थानीय समस्याओं का समाधान बना रहे हैं। यानी वे ओपन एआई, मेटा और गूगल या अन्य विदेशी मॉडल्स के ऊपर अपनी सेवाएं तैयार कर रहे हैं। केवल 21 फीसदी स्टार्टअप्स ऐसे हैं जो खुद नए एआई मॉडल विकसित कर रहे हैं। यही वह जगह है जहां भारत और अमेरिका-चीन जैसे देशों के बीच सबसे बड़ा अंतर दिखाई देता है। अमेरिका और चीन केवल एआई एप्लिकेशन नहीं बना रहे, वे मूल तकनीक पर नियंत्रण स्थापित कर रहे हैं। उनके पास अपने बड़े भाषा मॉडल, एआई चिप्स, क्लाउड इंफ्रास्ट्रचर और डाटा सिस्टम हैं। भारत में अभी ज्यादातर कंपनियां एआई की दुकान चला रही हैं, एआई की फैक्ट्री नहीं बनी हैं। यह स्थिति वैसी ही है जैसे मोबाइल क्रांति के दौर में भारत दुनिया का सबसे बड़ा स्मार्टफोन बाजार तो बन गया, लेकिन एप्पल या सैमसंग जैसी वैश्विक टेक कंपनियां भारत से नहीं निकलीं। खतरा यही है कि एआई में भी भारत केवल विशाल ग्राहक बाजार बनकर न रह जाए।
डेटा और कंप्यूटिंग पावर
एआई केवल सॉफ्टवेयर नहीं है। इसके पीछे भारी मात्रा में डेटा, महंगे जीपीयू , विशाल सर्वर और शक्तिशाली क्लाउड इंफ्रास्ट्रक्चर की जरूरत होती है। रिपोर्ट में भारतीय कंपनियों ने जिन सबसे बड़ी बाधाओं का जिक्र किया, उनमें सस्ती और सुलभ क्लाउड सुविधाओं की कमी, एआई स्किल्स की कमी, विदेशी एआई तकनीकों पर निर्भरता और सीमित कंप्यूटिंग संसाधन शामिल हैं। दुनिया की सबसे बड़ी एआई कंपनियां लाखों करोड़ रुपए के सर्वर नेटवर्क पर काम कर रही हैं। एनवीडिया जैसी कंपनियों के जीपीयू आज डिजिटल सोना बन चुके हैं। एआई मॉडल ट्रेन करने के लिए हजारों जीपीयू की जरूरत पड़ती है। भारत सरकार ने इसी चुनौती को समझते हुए इंडिया एआई मिशन शुरू किया है। मार्च 2024 में लांच हुए इस मिशन के लिए 10,372 करोड़ का बजट तय किया गया। सरकार का दावा है कि 38,000 से ज्यादा जीपीयू इस मिशन के तहत उपलब्ध कराए जा रहे हैं और स्टार्टअप्स को सब्सिडी दरों पर कंप्यूटिंग पावर मिलेगी। यह कदम महत्वपूर्ण है, क्योंकि बिना कंप्यूटिंग क्षमता के एआई विकास संभव नहीं। आज एआई की दुनिया में वही देश आगे बढ़ रहे हैं जिनके पास डेटा सेंटर शक्ति है।
एआई की दुनिया में अवसर भी, संकट भी
एआई को लेकर सबसे बड़ा डर नौकरी का है। दुनिया भर में यह बहस तेज़ है कि एआई इंसानों की नौकरियां खा जाएगा या नई नौकरियां पैदा करेगा। भारत के लिए यह सवाल और भी बड़ा है, क्योंकि यहाँ हर साल लाखों युवा नौकरी में आते हैं। रिपोर्ट कहती है कि 2030 तक भारत को 350 मिलियन यानी 35 करोड़ एआई साक्षर कर्मचारियों की जरूरत पड़ेगी। यह संख्या चौंकाने वाली है। वर्तमान में भारत में एआई लिटरेसी लगभग 30 फीसदी मानी जा रही है, जिसे अगले पांच वर्षों में 57 फीसदी तक ले जाने की जरूरत होगी। इसका मतलब साफ है। भविष्य की नौकरियां केवल डिग्री से नहीं चलेंगी। एआई समझना अब वैकल्पिक स्किल नहीं, बुनियादी आवश्यकता बनने जा रहा है। कॉल सेंटर, डेटा एंट्री, बेसिक कोडिंग, कंटेंट मॉडरेशन, अकाउंटिंग जैसे कई क्षेत्रों में एआई तेजी से मानव श्रम की जगह ले रहा है। लेकिन दूसरी ओर एआई ट्रेनर, प्रोम्पट इंजिनीयर, एआई ऑडिटर, एआई सिक्योरिटी एक्सपर्ट और एआई एथिक्स कंसल्टेंट जैसी नई नौकरियां भी पैदा हो रही हैं। जो लोग एआई को अपनाएंगे, वे आगे बढ़ेंगे। जो इससे डरकर दूर भागेंगे, वे धीरे-धीरे बाजार से बाहर होते जाएंगे।
भारतीय भाषाओं के लिए एआई की चुनौती
भारत की सबसे बड़ी ताकत उसकी भाषाई विविधता है, लेकिन एआई की दुनिया में यही उसकी कमजोरी भी बन सकती है। अंग्रेज़ी भाषा में एआई मॉडल सबसे अधिक प्रशिक्षित हैं। लेकिन भारत की वास्तविक आबादी हिंदी, तमिल, बंगाली, मराठी, तेलुगु, छत्तीसगढ़ी, भोजपुरी और सैकड़ों क्षेत्रीय भाषाओं में संवाद करती है। यदि एआई केवल अंग्रेजी केंद्रित रहा तो डिजिटल असमानता और बढ़ सकती है। ग्रामीण भारत एआई क्रांति से बाहर छूट सकता है। यही कारण है कि भारतीय भाषाओं के लिए डेटा सेट तैयार करना बेहद जरूरी हो गया है। सरकार का एआईकोश प्लेटफॉर्म इसी दिशा में एक प्रयास माना जा रहा है, जहां शोधकर्ताओं और स्टार्टअप्स को उच्च गुणवत्ता वाले डटसेट्स उपलब्ध कराए जाएंगे। यहां भी चुनौती छोटी नहीं है। भारतीय भाषाओं में गुणवत्तापूर्ण डेटा की कमी, अलग-अलग बोलियों का जटिल ढांचा और कम डिजिटल सामग्री एआई प्रशिक्षण को कठिन बनाते हैं।
एआई और राष्ट्रीय सुरक्षा
एआई केवल बिजनेस का मामला नहीं रहा। यह अब राष्ट्रीय सुरक्षा का मुद्दा भी बन चुका है। ड्रोन युद्ध, साइबर हमले, निगरानी प्रणाली, फेक वीडियो, डीपफेक प्रचार और डिजिटल जासूसी एआई का इस्तेमाल अब युद्ध और राजनीति में खुलकर हो रहा है। अगर भारत पूरी तरह विदेशी एआई मॉडल्स पर निर्भर रहता है, तो भविष्य में डेटा सुरक्षा और रणनीतिक नियंत्रण का खतरा बढ़ सकता है। यही वजह है कि सॉवरेन एआई यानी देश के अपने एआई इंफ्रास्ट्रक्चर पर अब जोर दिया जा रहा है। रिपोर्ट में 77 प्रतिशत अधिकारियों ने माना कि भारत आधारित क्लाउड क्षमता भरोसेमंद एआई सिस्टम के लिए जरूरी है। वहीं 74 प्रतिशत अधिकारियों ने कहा कि डेटा कहां स्टोर हो रहा है, यह आने वाले समय में बेहद महत्वपूर्ण सवाल होगा। सरल भाषा में कहें तो भविष्य का डेटा ही शक्ति है। जो देश डेटा तथा एआई इंफ्रास्ट्रक्चर नियंत्रित करेगा, वही डिजिटल दुनिया में नेतृत्व करेगा।
क्या भारत के पास मौका अभी भी है
एआई की वैश्विक दौड़ में अमेरिका और चीन बहुत आगे दिखाई देते हैं। लेकिन भारत के पास कुछ ऐसी ताकतें हैं जिन्हें नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। भारत दुनिया का सबसे बड़ा डिजिटल उपभोक्ता बाजार है। यहां करोड़ों इंटरनेट यूज़र्स हैं। यूपीआई जैसी प्रणालियों ने दिखाया है कि भारत बड़े स्तर पर टेक्नोलॉजी लागू कर सकता है। भारत के पास विशाल इंजीनियरिंग प्रतिभा भी है। सबसे बड़ा फायदा यह है कि भारत अभी शुरुआती चरण में है। यानी सही नीतियां और निवेश आने पर वह तेजी से छलांग लगा सकता है। इसके लिए केवल सरकारी घोषणाएं काफी नहीं होंगी। विश्वविद्यालयों में एआई रिसर्च बढ़ानी होगी। निजी कंपनियों को केवल विदेशी मॉडल्स पर निर्भर रहने के बजाय मूल तकनीक विकसित करनी होगी। स्कूल स्तर से एआई शिक्षा शुरू करनी होगी। सबसे महत्वपूर्ण भारत को कम लागत वाले आईटी सर्विस मॉडल से आगे बढ़ना होगा। क्योंकि एआई का दौर केवल आउटसोर्सिंग से नहीं जीता जाएगा। इसे नवाचार से जीता जाएगा।
आने वाले दशक का निर्णायक मोड़
भारत आज बिल्कुल उसी मोड़ पर खड़ा है जहां 1990 के दशक में इंटरनेट क्रांति के समय खड़ा था। फर्क सिर्फ इतना है कि इस बार दांव कहीं बड़ा है। एआई केवल एक तकनीक नहीं है। यह आने वाले समय की अर्थव्यवस्था, राजनीति, शिक्षा, मीडिया और समाज की दिशा तय करेगा। यह तय करेगा कि कौन-सा देश भविष्य का नेतृत्व करेगा और कौन पीछे छूट जाएगा। आईबीएम और इंडियन एआई मिशन की रिपोर्ट एक तरह से चेतावनी भी है और अवसर भी। चेतावनी इस बात की कि भारत अभी एआई के असली खेल में शुरुआती स्तर पर है। अवसर इस बात का कि अभी भी समय हाथ से पूरी तरह निकला नहीं है। अगर भारत केवल विदेशी एआई टूल्स का ग्राहक बनकर रह गया, तो वह दुनिया का सबसे बड़ा डिजिटल बाजार तो होगा, लेकिन टेक्नोलॉजी का मालिक नहीं। लेकिन अगर भारत ने अपने मॉडल, अपना डेटा इंफ्रास्ट्रक्चर और अपनी एआई प्रतिभा विकसित कर ली, तो वह दुनिया की अगली टेक महाशक्ति भी बन सकता है। आने वाले वर्षों में यह तय होगा कि भारत एआई युग में बैक ऑफिस रहेगा या ब्रेन सेंटर बनेगा।
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