कहां-कहां से दौड़ेगी बुलेट ट्रेन? 508 किमी लंबे रूट की धमाकेदार फोटो सिर्फ thesootr पर
भारत में पहली बार 320 kmph की रफ्तार से बुलेट ट्रेन दौड़ेगी। यह बुलेट ट्रेन कॉरिडोर मुंबई-अहमदाबाद तक तैयार किया जा रहा है। 508 किमी लंबे इस प्रोजेक्ट में जापानी तकनीक, समुद्र के नीचे सुरंग और 23 मीटर ऊंचे वायडक्ट शामिल हैं।
मुंबई-अहमदाबाद हाई स्पीड कॉरिडोर पर काम अब उस मोड़ पर आ गया है, जहां भारत के रफ्तार के सपने हकीकत में बदलते दिख रहे हैं। 508 किलोमीटर लंबे इस रूट पर तकनीक और इंजीनियरिंग का ऐसा मेल देखने को मिल रहा है, जो इससे पहले देश में कभी नहीं देखा गया।
thesootr की इस विशेष रिपोर्ट में जानिए उस सीक्रेट मटेरियल के बारे में जिससे ट्रेन 320 किमी/घंटा की रफ्तार पकड़ेगी। साथ ही, देखिए कैसे समुद्र के नीचे और पहाड़ों के बीच से रास्ता बनाया जा रहा है।
बुलेट ट्रेन का सपना अब जमीन पर
सितंबर 2017 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इस प्रोजेक्ट का शिलान्यास किया था। करीब एक दशक बाद यह सपना अब सच होता दिख रहा है। सूरत के पास वक्ताना गांव में 23 मीटर ऊंचे वायडक्ट पर खड़े होकर देखें तो एहसास होता है कि भारत की रेल जगत एक बड़ी छलांग लगाने की तैयारी में है।
जापानी तकनीक की रफ्तार का रहस्य
सूरत के पास वक्ताना गांव में 23 मीटर की ऊंचाई पर एक निर्माणाधीन पुल पर इंजीनियरों के बीच एक रहस्य पर चर्चा गर्म है। बुलेट ट्रेन की पटरियों के स्लैब और बेस के बीच एक खास सामग्री का इस्तेमाल हो रहा है। इसे सीमेंट एस्फाल्ट मोर्टार (CAM) कहा जाता है।
साइट इंस्पेक्टर अनंत गुरु बताते हैं कि इस मिश्रण में नौ तत्व हैं। इनमें से तीन सीमेंट, रेत और पानी भारत के हैं, लेकिन बाकी छह जापान से आते हैं। इसमें एक ऐसा सीक्रेट एलिमेंट है जो केवल जापानियों को पता है। यह मोर्टार 40-100 मिमी की परत बनाता है, जो 320 किमी/घंटा की गति पर पैदा होने वाले कंपन को सोख लेता है।
साबरमती के ऊपर आसमान में उड़ती पटरियां
अहमदाबाद में साबरमती नदी के ऊपर 480 मीटर लंबा एक विशाल वायडक्ट (ऊंचा पुल) तैयार हो रहा है। दिलचस्प बात यह है कि पूरे 508 किमी के कॉरिडोर का 90% हिस्सा (लगभग 465 किमी) जमीन से 20 मीटर की ऊंचाई पर होगा।
पुल के निर्माण में शामिल एक स्ट्रैडल कैरियर नेशनल हाई स्पीड रेल कॉर्पोरेशन लिमिटेड (NHSRCL) के अधिकारियों का कहना है कि सुरक्षा के लिहाज से इसे जमीन पर नहीं चलाया जा सकता था। इसलिए, क्योंकि 300 किमी/घंटा से ज्यादा की रफ्तार पर जानवर या इंसान का पटरी पर आना घातक हो सकता है।
साबरमती पर बन रहे पुल के सात खंभों को सहारा देने के लिए नदी के नीचे 16 गहरे पाइल्सयानी नींव के खंभे डाले गए हैं।
सूरत की स्लैब फैक्ट्री में सटीकता का इम्तिहान
सूरत के किम (Kim) में 14 एकड़ में फैली एक हाई-टेक फैक्ट्री में दिन-रात काम चल रहा है। यहां ट्रैक स्लैब (Track Slab) तैयार किए जा रहे हैं। एक मामूली सी मिलीमीटर की गलती भी स्लैब को बेकार कर सकती है। इस कारखाने की क्षमता जापान की फैक्ट्रियों से भी ज्यादा है, जो प्रतिदिन 120 स्लैब बना सकता है।
वापी-वडोदरा खंड के लिए कुल 96 हजार स्लैब की जरूरत है। जापानी विशेषज्ञों की देखरेख में भारतीय इंजीनियरों को व्हील लेथ मशीनचलाने की ट्रेनिंग दी जा रही है, जो घिसे हुए पहियों को फिर से सही आकार देती है।
मुंबई के शिलफाटा में बनी सुरंग
सह्याद्री की चुनौतियों और समुद्र के नीचे सुरंग का रोमांच
जैसे ही यह प्रोजेक्ट महाराष्ट्र के पालघर जिले में प्रवेश करता है, इंजीनियरिंग और भी जटिल हो जाती है। यहां सह्याद्री पर्वतमाला के बीच सुरंगें (Tunnels) बनाई जा रही हैं। पूरे रूट का करीब 26 किमी हिस्सा सुरंगों से गुजरेगा। इसमें मुंबई की 21 किमी लंबी सुरंग और ठाणे खाड़ी के नीचे सात किमी लंबी समुद्री सुरंग शामिल है।
बसंतवाड़ी में पहाड़ी सुरंग बनाते समय रियल टाइम मॉनिटरिंग सिस्टम का इस्तेमाल किया गया है ताकि चट्टान धंसने का खतरा न रहे। सुरंग के मुहाने पर खास कवर लगाए जा रहे हैं ताकि तेज रफ्तार ट्रेन के प्रवेश करते समय होने वाले धमाके जैसी आवाज को कम किया जा सके।
बुलेट ट्रेन परियोजना में बन रहे पिलर
मुंबई का बीकेसी: जहां पूरा होगा रफ्तार का सफर
यह महापरियोजना मुंबई के बांद्रा कुर्ला कॉम्प्लेक्स (BKC) पर जाकर समाप्त होती है, जो इस रूट का एकमात्र भूमिगत स्टेशन (Underground station) है। मुंबई के शिलफाटा में सुरंग बनाना सबसे बड़ी चुनौती थी, क्योंकि वहां जमीन के नीचे गैस और पानी की पाइपलाइनें थीं।
परियोजना बांद्रा कुर्ला कॉम्प्लेक्स (बीकेसी) पर समाप्त सुरक्षा के लिए 600 इमारतों की मैपिंग की गई और कंपन मापने के लिए सिस्मोमीटर (Seismometer) लगाए गए। यह वही शहर है जहां 1853 में भारत की पहली यात्री ट्रेन बोरी बंदर यानी आज के छत्रपति शिवाजी महाराज टर्मिनस से ठाणे के बीच चली थी।
अब 2029 तक उसी मुंबई में देश की पहली बुलेट ट्रेन का टर्मिनस बनेगा। भारत की रेल कहानी एक पूरे चक्र में वापस उसी जगह आ रही है जहां से शुरू हुई थी।
Sources: The Indian Express
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