क्या लौट रहा 1991 जैसा दौर? जानिए हमारे सामने कैसी होगी आगे की आर्थिक राह
New Delhi: अगर आप सोचते हैं कि 1991 के आर्थिक संकट की बातें इतिहास में दफन हो चुकी हैं तो जरा ठहरिए। साल 2026 में भारत एक बार फिर ठीक वैसे ही चौराहे पर आ खड़ा हुआ है, जहां 35 साल पहले खड़ा था।
हाल ही में इंडिया इंटरनेशनल सेंटर (IIC) में एक व्याख्यान में विशेषज्ञों ने भारत की आर्थिक और भू-राजनीतिक स्थिति की तुलना 1991 के संकट से की।
हालांकि आज भारत की आर्थिक स्थिति 1991 जितनी लाचार नहीं है। हमारा विदेशी मुद्रा भंडार मजबूत है। हम दुनिया की तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्थाओं में से एक हैं। लेकिन पर्दे के पीछे की चुनौतियां 1991 के मुकाबले कहीं अधिक पेचीदा और गंभीर हो चुकी हैं।
1991 में क्या हुआ था?
बात 1991 की है। भारत अपनी आजादी के बाद के सबसे बड़े आर्थिक संकट से जूझ रहा था।
1990-91 के खाड़ी युद्ध की वजह से तेल की कीमतें आसमान छूने लगीं।
भारत का आयात बिल इतना बढ़ गया कि देश के पास सिर्फ 2-3 हफ्तों का सामान खरीदने के पैसे बचे थे। स्थिति यह हो गई कि भारत को अपना सोना गिरवी रखने के लिए स्विट्जरलैंड, यूके और जापान भेजना पड़ा।
उसी साल सोवियत संघ (USSR) बिखर गया। भारत के लिए यह दोहरा झटका था, क्योंकि अमेरिका और चीन के खिलाफ हमारा सबसे बड़ा मददगार सोवियत संघ नक्शे से गायब हो चुका था।
अमेरिका उस समय भारत पर परमाणु कार्यक्रम बंद करने, कश्मीर-पंजाब में मानवाधिकारों और भारत के बंद बाजारों को खोलने को लेकर भारी दबाव बना रहा था।
1979 में अपने आर्थिक सुधार शुरू करने के बाद चीन 9% की रफ्तार से बढ़ रहा था। साल 1991 तक उसकी जीडीपी 380 अरब डॉलर तक पहुंच गई थी, जबकि भारत की जीडीपी महज 270 अरब डॉलर थी।
उस समय भारत ने हिम्मत दिखाई। उदारीकरण, निजीकरण और वैश्वीकरण (LPG) के सुधार लागू किए। संकट से बाहर निकल आया। लेकिन सवाल यह है कि 2026 में हम फिर उसी मोड़ पर कैसे आ गए?
साल 2026, एक नया दौर, नई मुश्किलें
आज 35 साल बाद 2026 में हम खुद को फिर से एक हैरान कर देने वाले मोड़ पर पाते हैं। ट्रम्प
के दूसरे कार्यकाल में अमेरिका की विदेश नीति बेहद स्वार्थी और लेन-देन वाली हो गई हैं।
अमेरिका अब भारत को अपना स्वाभाविक रणनीतिक साझेदार नहीं, बल्कि सिर्फ एक कारोबारी मौका समझता है।
दूसरी तरफ, मध्य-पूर्व में जारी ईरान युद्ध और खाड़ी के तनाव ने फिर भारत के लिए ऊर्जा संकट और महंगाई की समस्या खड़ी कर दी है।
रुपए का मूल्य गिरा है। विदेशी निवेशकों (FIIs) ने भारतीय शेयर बाजार से पैसे निकालने शुरू कर दिए हैं।
हालांकि भारत की विकास दर 6% के आसपास बनी हुई है। जानकारों का मानना है कि भारत को विकसित देश बनने के लिए कम से कम 8% प्रति वर्ष की रफ्तार से बढ़ना होगा।
असली सिरदर्द, 4C का महा-संकट
1991 में सिर्फ नियमों में बदलाव करके अर्थव्यवस्था को खोलना आसान था। लेकिन 2026 में असली चुनौती देश की व्यापक अर्थव्यवस्था में नहीं, बल्कि 4C के संकट में छिपी है।
यह 4C क्या हैं? आइए समझें:
कॉमर्स और मैन्युफैक्चरिंग: पिछले 30 सालों की तमाम सरकारी योजनाओं और प्रोत्साहनों के बावजूद भारत का विनिर्माण क्षेत्र आज भी सुस्त पड़ा है। हम दुनिया का कारखाना बनने का सपना देख रहे हैं, लेकिन जमीनी हकीकत में हम काफी पीछे हैं।
क्रिटिकल मिनरल्स: स्मार्टफोन, इलेक्ट्रिक गाड़ियां (EVs) और सौर ऊर्जा प्लेटें बनाने के लिए जिन रेयर अर्थ मिनरल्स (जैसे लिथियम, कोबाल्ट) की जरूरत होती है। भारत में उनके सही नक्शे और खनन की भारी कमी है। सबसे डरावनी बात यह है कि इन खनिजों और धातुओं के लिए भारत की चीन पर निर्भरता 50% से लेकर 100% तक है।
कंप्यूटर चिप्स: आज की दुनिया चिप्स पर चलती है। कार से लेकर मिसाइल तक, सब जगह सेमीकंडक्टर चिप्स की जरूरत है। नीति आयोग का अनुमान है कि साल 2035 तक भारत को अपनी जरूरत की 90% से 95% चिप्स विदेशों से ही आयात करनी पड़ेंगी।
कंप्यूटर सॉफ्टवेयर और AI इंफ्रास्ट्रक्चर: आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) की दुनिया में भारत के पास कोडिंग करने वाले युवाओं की कमी नहीं है। लेकिन एआई की मुख्य तकनीक, डेटा सेंटर और सुपरकंप्यूटिंग इंफ्रास्ट्रक्चर में भारत की उपस्थिति न के बराबर है।
विशेषज्ञों का कहना है कि इन 4C के मोर्चे पर अगर भारत पिछड़ता है तो 6% की विकास दर पर टिके रहना भी मुश्किल हो जाएगा। विशेषज्ञों का कहना है कि भारत को इन क्षेत्रों के लिए अमरीका के 'मैनहटन प्रोजेक्ट' जैसी किसी महा-योजना की तत्काल आवश्यकता है।
दोस्त कम, चुनौतियां ज्यादा
भू-राजनीतिक मोर्चे पर आज भारत के लिए रास्ते 1991 से भी ज्यादा पथरीले दिखाई दे रहे हैं:
अमेरिका का बदला रुख: अब अमेरिका भारत के साथ केवल अपने मतलब की बात करता है। 1991 में अमेरिका परमाणु नीति पर दबाव बनाता था तो 2026 में वह भारतीय सामानों पर भारी टैक्स, व्यापारिक मानकों और रूस से तेल खरीदने पर भारत को घेर रहा है।
सबसे चिंताजनक बात यह है कि वाशिंगटन अब बीजिंग (चीन) के साथ मिलकर दुनिया को चलाने (G-2 समझौते) की फिराक में है। इससे चीन के खिलाफ भारत का अमेरिकी सुरक्षा कवच पूरी तरह खत्म हो सकता है।
चीन के साथ चौड़ा होता फासला: 1991 में चीन की जीडीपी ($380 बिलियन) भारत की जीडीपी ($270 बिलियन) से थोड़ी ही बड़ी थी।
2026 में चीन की अर्थव्यवस्था $20 ट्रिलियन (20,000 अरब डॉलर) की हो चुकी है, जबकि भारत $4 ट्रिलियन पर है।
2050 का अनुमान: यदि चीन 3% और भारत 6% की दर से भी बढ़े, तब भी 2050 तक चीन $40 ट्रिलियन और भारत $16 ट्रिलियन पर होगा। यानी दोनों देशों का आर्थिक फासला घटने के बजाय $16 ट्रिलियन से बढ़कर $24 ट्रिलियन हो जाएगा।
पाकिस्तान की नई चालबाजी: 1991 की तरह पाकिस्तान एक बार फिर खुद को मजबूत स्थिति में महसूस कर रहा है।
2025-26 के घटनाक्रमों के बाद पाकिस्तान की सेना चीनी सेना के साथ बहुत गहराई से जुड़ चुकी है। वह चीन, अमेरिका और रूस तीनों के साथ तालमेल बिठाकर चल रहा है।
2025 में उसने सऊदी अरब के साथ बड़ा रक्षा समझौता किया और 2026 में अमेरिका-ईरान तनाव के बीच एक प्रमुख मध्यस्थ बनकर उभरा है।
अब भारत के पास क्या विकल्प हैं?
इस दोराहे पर खड़े भारत को अपनी विदेश नीति और आर्थिक रणनीति पर नए सिरे से सोचना होगा। जानकारों के अनुसार भारत के सामने कुछ कड़े सवाल हैं:
हाइड-एंड-बाइड नीति: क्या भारत को अमेरिका और चीन दोनों महाशक्तियों के झगड़ों से दूर रहकर सिर्फ अपने घरेलू सुधारों पर ध्यान देना चाहिए?
क्या चीन का तरीका चीन पर ही आजमाएं? जैसे 1972 के बाद चीन ने अमेरिका के पैसों, निवेश और तकनीक का इस्तेमाल करके खुद को मजबूत बनाया। क्या भारत को भी चीनी निवेश और तकनीक का इस्तेमाल करके अपनी अर्थव्यवस्था को रफ्तार देनी चाहिए?
क्या चीन के साथ रिश्ते रीसेट होंगे? लेकिन क्या बीजिंग (चीन) भारत को इतनी छूट देगा, जितनी कभी अमेरिका ने चीन को दी थी?
आम जनता के लिए इसका क्या मतलब है?
जब देश में 1991 जैसे संकट की सुगबुगाहट होती है तो इसका सीधा असर आम नागरिक की जेब पर पड़ता है:
महंगाई और ईंधन: खाड़ी युद्ध और कच्चे तेल के दामों में उतार-चढ़ाव से देश में पेट्रोल-डीजल और रोजमर्रा की चीजें महंगी हो सकती हैं।
नौकरियां: यदि विनिर्माण और 4C क्षेत्रों में भारत आत्मनिर्भर नहीं बनता, तो हमारी युवा आबादी के लिए अच्छी नौकरियों के अवसर सीमित हो सकते हैं।
तकनीकी निर्भरता: चिप्स और एआई में पीछे रहने का मतलब है कि भविष्य में हम केवल विदेशी तकनीकों के उपभोक्ता बने रहेंगे, उनके मालिक नहीं।
असली परीक्षा अब
भारत ने अमेरिका-ईरान युद्ध के तात्कालिक असर और डोनाल्ड ट्रम्प की अनिश्चित विदेश नीति के शुरुआती झटकों को तो झेल लिया है। देश का ढांचा मजबूत है, लेकिन असली परीक्षा अब शुरू होती है।
अगर भारत को दुनिया की अगली महाशक्ति बनना है, तो उसे पुरानी नीतियों को छोड़कर 4C (कॉमर्स, क्रिटिकल मिनरल्स, चिप्स और एआई) पर काम करना होगा।
1991 में हमने आर्थिक संकट से निकलने के लिए जो साहस दिखाया था, 2026 में उससे भी बड़े साहस और सूझबूझ की दरकार है।
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