छात्र आंदोलन में अमित शाह या राजनाथ नहीं, क्यों बने जेपी नड्डा सरकार का चेहरा

Jinesh Jain | Jul 23, 2026, 17:36 IST
क्यों बने जेपी नड्डा सरकार का चेहरा
सत्ता की बिसात पर मोहरों की चाल अहम होती है। इससे भी कहीं अधिक महत्वपूर्ण यह होता है कि किस मोहरे को किस वक्त चला जा रहा है। आइए यहां समझते हैं कि दिल्ली के छात्र आंदोलन में जेपी नड्डा किस तरह सरकार का चेहरा बनकर उभरे हैं:

New Delhi: भाजपा अध्यक्ष पद छोड़ने के बाद केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री जेपी नड्डा राजनीतिक सुर्खियों से थोड़ा दूर दिख रहे थे। लेकिन, देश में भड़के छात्र प्रदर्शन ने उन्हें फिर सरकार के मास्टर ट्रबलशूटर के रूप में ला खड़ा किया है।



सवाल उठता है कि जब सरकार के पास संकटमोचक राजनाथ सिंह और केंद्रीय मंत्री अमित शाह जैसे भारी-भरकम नाम मौजूद थे तो फिर इस बड़े आंदोलन को शांत करने की जिम्मेदारी नड्डा के कंधों पर ही क्यों डाली गई?



सड़कों पर लाठियां, बैकस्टेज पर हॉस्पिटल डिप्लोमेसी

घटनाक्रम इस हफ्ते सोमवार को तेज़ी से बदला। केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग को लेकर हजारों छात्र संसद घेरने निकले।



छात्रों के संसद मार्च के दौरान जब पुलिस और रैपिड एक्शन फोर्स ने आंसू गैस के गोले छोड़े और लाठियां भांजीं तो माहौल बेहद तनावपूर्ण हो गया।


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सरकार पर संवेदनहीन होने के आरोप लगने लगे। ऐसे मोड़ पर नड्डा ने चीफ़ नेगोशिएटर (मुख्य वार्ताकार) की भूमिका संभाली।



​टेबल टॉक्स: उन्होंने विरोध कर रही कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) के प्रतिनिधियों से मुलाकात कर गतिरोध तोड़ने की कोशिश की।



​ग्राउंड ज़ीरो पर मौजूदगी: अगले ही दिन वे आरएमएल और लेडी हार्डिंग अस्पताल पहुंचे। घायलों में छात्र भी थे और पुलिसकर्मी भी। नड्डा ने दोनों का हालचाल पूछकर सबका ख्याल रखने वाली सरकार की छवि पेश की।


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मिडनाइट मिशन: मंगलवार देर रात नड्डा और पीएमओ के राज्य मंत्री जितेंद्र सिंह गुरुग्राम के अस्पताल पहुंचे, जहां वे भूख हड़ताल पर बैठे एक्टिविस्ट सोनम वांगचुक से मिले।



कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) के प्रतिनिधियों से मुलाकात


जेपी नड्डा ही क्यों?

भाजपा के शीर्ष सूत्रों और रणनीतिकारों की मानें तो नड्डा का चयन कोई इत्तेफाक नहीं, बल्कि सुलझे हुए राजनीतिक कैलकुलेशन का नतीजा था:



छात्र राजनीति की पुरानी नींव

नड्डा खुद एबीवीपी (ABVP) के ज़माने से छात्र राजनीति की नस-नस पहचानते हैं। उनका अंदाज आक्रामक न होकर संवाद कायम करने वाला रहा है। हाल ही में उत्तराखंड में भाजपा के भीतर गुटबाज़ी शांत कराने में उनका यह हुनर दिखा था।



हेल्थ मिनिस्टर होने का परफेक्ट कवर

स्वास्थ्य मंत्री के तौर पर अस्पताल जाकर घायलों से मिलना प्रशासनिक और नैतिक कर्तव्य जैसा लगता है। इससे सरकार पर यह आरोप नहीं लगा कि वह महज़ राजनीति कर रही है, बल्कि एक संवेदनशील संदेश गया। इसे लुटियंस की भाषा में परफेक्ट ऑप्टिक्स कहते हैं।



स्वास्थ्य मंत्री होने के कारण अस्पताल जाकर घायलों से मिलना


शाह और राजनाथ को न उतारने का सियासी गणित

अमित शाह क्यों नहीं: दिल्ली पुलिस सीधे गृह मंत्रालय को रिपोर्ट करती है। लाठीचार्ज के बाद गृह मंत्री का खुद बातचीत की मेज पर आना प्रदर्शनकारियों को और भड़का सकता था।


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राजनाथ सिंह क्यों नहीं: राजनाथ सिंह का आना यह संदेश देता कि सरकार घबरा गई है, उसने इसे राष्ट्रीय आपातकाल मान लिया है।


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नितिन नबीन (भाजपा अध्यक्ष) क्यों नहीं: अगर संगठन का प्रमुख बातचीत करता तो मामला सरकारी के बजाय विशुद्ध राजनीतिक हो जाता। सरकार यह दिखाना चाहती थी कि वह प्रशासनिक स्तर पर समाधान निकाल रही है।



भाजपा के अंदरूनी सूत्रों ने कहा कि बहुत वरिष्ठ नेता को मैदान में उतारने से यह संकेत जाता कि सरकार घबरा गई है। प्रदर्शनकारियों को बहुत अधिक महत्व दे रही है। उनके अनुसार नड्डा का कद इतना है जो यह दर्शाता है कि सरकार संवेदनहीन नहीं है।



अमित शाह, राजनाथ सिंह, जेपी नड्डा


नड्डा का डिप्लॉयमेंट पूरा हुआ

सिर्फ बैकचैनल बातचीत ही नहीं, नड्डा ने बुधवार को मोर्चा संभालते हुए प्रेस कॉन्फ्रेंस की। उन्होंने विपक्ष के नेता राहुल गांधी पर तीखा हमला बोला।



उन्होंने डेटा के साथ पलटवार करते हुए कहा कि पेपर लीक सिर्फ भाजपा शासित राज्यों की समस्या नहीं है, बल्कि विपक्षी दलों के राज्यों में भी ऐसी घटनाएं हुई हैं। नड्डा ने 48 घंटे के भीतर सरकार के लिए फायरवॉल का काम किया।



आखिर क्या दिया संदेश

​सियासत में कभी-कभी सबसे बड़ी ताकत आक्रामकता नहीं, बल्कि सौम्यता होती है। संकट के इस दौर में जेपी नड्डा को आगे करके सरकार ने कई निशाने साधे हैं।



भाजपा सूत्रों का कहना है कि नड्डा के माध्यम से आंदोलनकारियों की हवा भी निकाली। सरकार ने अपनी छवि भी बचाई। साथ ही अपने सबसे बड़े रणनीतिकारों को पर्दे के पीछे सुरक्षित भी रखा।



FAQ

  1. सरकार ने दिल्ली के छात्र आंदोलनकारियों से बातचीत के लिए राजनाथ सिंह या अमित शाह के बजाय जेपी नड्डा को ही क्यों चुना?
    अमित शाह या राजनाथ सिंह जैसे अति-वरिष्ठ मंत्रियों को उतारने से यह संदेश जाता कि सरकार घबरा गई है। प्रदर्शनकारियों को बहुत अधिक तवज्जो दे रही है। ऐसे में जेपी नड्डा को कमान दी गई। उनका कद इतना बड़ा है कि सरकार गंभीर दिखे, लेकिन इतना आक्रामक भी नहीं कि बातचीत का रास्ता बंद हो।
  2. जेपी नड्डा के स्वास्थ्य मंत्री पद ने इस पूरे मामले में कैसे मदद की?
    स्वास्थ्य मंत्री होना उनके लिए परफेक्ट कवर बन गया। लाठीचार्ज में घायल छात्रों और पुलिसकर्मियों का हाल जानने के लिए उनका अस्पताल जाना प्रशासनिक और नैतिक जिम्मेदारी लगा। इससे सरकार आम जनता के बीच संवेदनशीलता का संदेश देने में सफल रही।
  3. छात्र आंदोलन को सुलझाने के लिए जेपी नड्डा में कौन-कौन से गुण देखे गए?
    नड्डा खुद एबीवीपी (ABVP) के ज़माने से छात्र आंदोलन और युवाओं की मानसिकता को बेहतर समझते हैं। वे एक सौम्य और शांत वार्ताकार माने जाते हैं, जो तनावपूर्ण स्थिति में भी बातचीत का माहौल बना सकते हैं। पूर्व भाजपा अध्यक्ष के रूप में उनके पास राजनीतिक विवादों को सुलझाने का लंबा अनुभव है।

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